चीन में नेतृत्व में जो बदलाव होने जा रहा है, उसमें शी जिनपिंग हू जिंताओ का स्थान लेंगे और ली केकियांग वेन जियाबाओ का। ऐसा लगता है कि इस नए नेतृत्व के साथ ही माओ चीन की राजनीति का एक प्रतीकात्मक चेहरा रह जाएंगे, जबकि वास्तविक व्यवस्था देंग श्याओ पिंग और जियांग जेमिन द्वारा तैयार किए गए रोडमैप पर चलेगी।
यह इसलिए भी तर्कसंगत लगता है, क्योंकि जिनपिंग जियांग जेमिन की पसंद हैं और ली हू जिंताओ की। लेकिन सवाल यह है कि नया नेतृत्व चीन के सामने उपज रही चुनौतियों को ठीक से देखने और उनसे निपटने के लिए पुराने ढर्रे का इस्तेमाल करेगा या कुछ नया करने की कोशिश होगी।
दरअसल 18वीं राष्ट्रीय कांग्रेस से पहले ही पार्टी के प्रमुख दस्तावेज से माओ की विचारधारा शब्द को हटा दिया गया। नए दस्तावेज में कहीं भी मार्क्सवादी, लेनिनवादी और माओवादी विचारधारा का जिक्र नहीं है। यानी चीनी लोक गणराज्य में अब लोक शब्द के लिए जगह नहीं रह गई है।
संभवतः इस लोक शब्द को पूंजी के जरिये विस्थापित कर दिया गया है। नया नेतृत्व इसी बदले हुए एजेंडे पर चीन को आगे बढ़ाएगा। दरअसल चीन इस समय दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और इस स्थिति को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि वह माओ की सांस्कृतिक क्रांति को दफन कर दे।
सामान्यतः माना जाता है कि चीन में यदि राजनीतिक सफलता प्राप्त करनी है, तो अपने संरक्षक का वरद हस्त हासिल करना होगा। जिनपिंग और केकियांग, दोनों को राजनीति विरासत में मिली है। वहां की राजनीति में आम जन के लिए कोई जगह नहीं है। माओ त्से तुंग और देंग श्याओ पिंग के समय तो शीर्ष नेताओं द्वारा अपने उत्तराधिकारियों के नाम स्वयं तय किए गए थे।
हालांकि लगता है कि चीन में अब ताकतवर नेताओं का दौर खत्म हो रहा है। लोकतंत्र न होने के कारण वहां दस साल के लिए नेतृत्व को सत्ता पर काबिज रहने की शक्ति प्राप्त हो जाती है और वह कमोबेश तानाशाह की तरह कार्य करता है। लेकिन अब जिस तरह से सामाजिक-आर्थिक असमानता वहां प्रतिरोधक शक्ति को जन्म दे रही है, उससे लगता है कि आगे का रास्ता आसान नहीं होगा।
हू जिंताओ ने विदाई भाषण में अपने कार्यकाल की उपलब्धियों के बखान के साथ पार्टी और देश के समक्ष मौजूद चुनौतियों के प्रति आगाह भी किया। उनकी दृष्टि में बढ़ रहा भ्रष्टाचार फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती है। अब तो शीर्ष नेतृत्व भी इस घेरे में आ चुका है। बो जिलाई और पूर्व रेल मंत्री लियु झियुआन को इसकी सजा भी मिल चुकी है। सत्ताधारियों के परिवारों की बढ़ती समृद्धि और तेज होती आर्थिक विषमता कहीं फिर लांग मार्च का विकल्प न तैयार कर दे।
राजनीतिक सुधार एक अन्य चुनौती होगी। चीनी अब सरकारी जानकारियों में पारदर्शिता चाहते हैं, जबकि वहां कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों के अतिरिक्त यह अधिकार किसी के पास नहीं है। जिंताओ ने तो भ्रष्टाचार से लड़ने के साथ राजनीतिक वफादारी को प्रमुख मुद्दा बनाया है। फिर राजनीतिक सुधार कैसे संभव होगा? अगली चुनौती अर्थव्यवस्था की रफ्तार की है, जो लगातार धीमी हो रही है।
दरअसल चीनी अर्थव्यवस्था निर्यात प्रधान है, जिसकी निर्भरता यूरोप और अमेरिकी अर्थव्यवस्थाओं की समृद्धि और तीव्र विकास पर है, जबकि दोनों अभी मंदी के असर में हैं। घरेलू मांग बढ़ाकर हालांकि इसकी भरपाई की जा सकती है, पर चीन की सामाजिक-आर्थिक विषमता घरेलू मांग बढ़ाने में असमर्थ है। चीन ने अपनी तरक्की के लिए ‘शांतिपूर्वक उत्थान’ शब्द का प्रयोग किया है, लेकिन भारत, जापान, फिलीपींस और वियतनाम जैसे पड़ोसियों तथा अमेरिका के साथ विवाद के कारण उसका यह नारा खोखला साबित हो रहा है।
बहरहाल चीन के नए नेतृत्व के समक्ष तमाम चुनौतियां और अवसर मौजूद हैं। उस पर दुनिया के विकास, दुनिया के साथ सामंजस्य और शांति को स्थापित करने का दायित्व है। देखना यह है कि नया नेतृत्व पुराने नेतृत्व की उंगली पकड़ने का प्रयास करेगा या फिर दुनिया में हो रहे परिवर्तनों के अनुरूप स्वयं को बदलते हुए कुछ नई नजीरें पेश करेगा।