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अमेरिका से तकरार चीन को चाहिए नए बाजार : अर्थव्यवस्था की सेहत दांव पर है

कीथ  ब्रैशर Published by: Avdhesh Kumar Updated Sun, 28 Jul 2019 12:57 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
चीन में असंख्य फैक्टरियां हैं, जो बेशुमार चीजें बनाती हैं। हालांकि अमेरिका के साथ छिड़े व्यापार युद्ध के कारण उसका सबसे बड़ा उपभोक्ता अब उससे पहले जैसी चीजें नहीं खरीदता। ऐसे में, चीन नए खरीदार ढूंढ रहा है। इसी सप्ताह उसने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त व्यापार क्षेत्र स्थापित करने की अपनी कोशिशें फिर शुरू कीं। अगर वह अपने उद्देश्य में सफल होता है, तो यह समझौता उसके लिए ऑस्ट्रेलिया से भारत तक मुक्त व्यापार क्षेत्र खोल देगा। वह चीन, जापान और दक्षिण कोरिया में व्यापार शुल्क कम करने के सिलसिले में भी बात कर रहा है।

चीनी अर्थव्यवस्था की सेहत दांव पर है। पिछले सप्ताह उसकी आर्थिक विकास दर पिछले तीन दशक में सबसे कम दर्ज की गई। इसकी एक वजह यह है कि ट्रंप प्रशासन के साथ चल रहे व्यापार युद्ध के कारण उसका निर्यात क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। इससे बचने के लिए चीन स्थित विदेशी कंपनियां अब दूसरे देशों में चले जाना चाहती हैं। चूंकि निकट भविष्य में इस समस्या का समाधान नहीं दिखता, ऐसे में चीन को हर हाल में अपनी उत्पादित वस्तुओं के लिए नया बाजार चाहिए। 


ग्वांग्झू स्थित जिनान यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशन्स के प्रोफेसर चेन डिंगडिंग कहते हैं, 'अमेरिका की जगह लेना मुश्किल है, पर आपको कोशिश करनी होगी और अपने में विविधता लानी होगी। हम हमेशा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहना नहीं चाहते।' पर चीन के लिए दूसरे देशों से व्यापारिक समझौता करना आसान काम नहीं है। वह जिन देशों के साथ नए कारोबारी रिश्ते बनाना चाहता है, वे देश चीन के इरादे के प्रति चिंतित हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर
चीन में असंख्य फैक्टरियां हैं, जो बेशुमार चीजें बनाती हैं। हालांकि अमेरिका के साथ छिड़े व्यापार युद्ध के कारण उसका सबसे बड़ा उपभोक्ता अब उससे पहले जैसी चीजें नहीं खरीदता। ऐसे में, चीन नए खरीदार ढूंढ रहा है। इसी सप्ताह उसने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त व्यापार क्षेत्र स्थापित करने की अपनी कोशिशें फिर शुरू कीं। अगर वह अपने उद्देश्य में सफल होता है, तो यह समझौता उसके लिए ऑस्ट्रेलिया से भारत तक मुक्त व्यापार क्षेत्र खोल देगा। वह चीन, जापान और दक्षिण कोरिया में व्यापार शुल्क कम करने के सिलसिले में भी बात कर रहा है।

चीनी अर्थव्यवस्था की सेहत दांव पर है। पिछले सप्ताह उसकी आर्थिक विकास दर पिछले तीन दशक में सबसे कम दर्ज की गई। इसकी एक वजह यह है कि ट्रंप प्रशासन के साथ चल रहे व्यापार युद्ध के कारण उसका निर्यात क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। इससे बचने के लिए चीन स्थित विदेशी कंपनियां अब दूसरे देशों में चले जाना चाहती हैं। चूंकि निकट भविष्य में इस समस्या का समाधान नहीं दिखता, ऐसे में चीन को हर हाल में अपनी उत्पादित वस्तुओं के लिए नया बाजार चाहिए। 

ग्वांग्झू स्थित जिनान यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशन्स के प्रोफेसर चेन डिंगडिंग कहते हैं, 'अमेरिका की जगह लेना मुश्किल है, पर आपको कोशिश करनी होगी और अपने में विविधता लानी होगी। हम हमेशा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहना नहीं चाहते।' पर चीन के लिए दूसरे देशों से व्यापारिक समझौता करना आसान काम नहीं है। वह जिन देशों के साथ नए कारोबारी रिश्ते बनाना चाहता है, वे देश चीन के इरादे के प्रति चिंतित हैं। 

अमेरिका जिस भारी मात्रा में चीनी वस्तुओं का आयात करता रहा है, उतना आयात कोई दूसरा देश नहीं कर सकता। चीन के पड़ोसी देश कई मामलों में उसके व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी हैं। और चीन अब तक अपने उद्योगों को बचाने के लिए ऊंची शुल्कों की दीवार खड़ी करता रहा है। अब उन्हीं पड़ोसियों के साथ कारोबारी समझौते पर उतरने के लिए चीन को अपने शुल्क घटाने पड़ेंगे।

अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक युद्ध ने विश्व व्यापार को भी असंतुलित कर दिया है। इस साल के शुरुआती छह महीनों में अमेरिका को होने वाले चीन के निर्यात में 8.5 प्रतिशत की कमी आई है। जबकि इस दौरान शेष विश्व में उसका निर्यात 2.1 फीसदी ही बढ़ पाया है। चूंकि अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के दो साल होने को हैं, ऐसे में, अगर अमेरिका चीन का माल नहीं खरीदता, तो उसका उत्पादित सामान कौन खरीदेगा? चीन के बाजार पहले ही इस्पात, कार और दूसरे सामान से अटे पड़े हैं। 

सामान नहीं बिकेगा, तो फैक्टरियों में काम मंदा होगा, फिर वे बंद हो जाएंगी। इससे बड़ी संख्या में नौकरियां जाएंगी, जिससे चीन की आर्थिक विकास दर कम हो जाएगी। इस समस्या से निपटने के लिए चीन ने पिछले दिनों रीजनल कॉम्प्रीहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप पर बातचीत की। इस समझौते में दक्षिण पूर्व एशिया के दस देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया, चीन भारत, जापान, न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया हैं। 
 

क्षेत्र के वरिष्ठ व्यापारिक अधिकारी इस सप्ताह ग्वांग्झू में मिल रहे हैं। उनके मंत्री आगामी अगस्त में बीजिंग में इस संबंध में विचार-विमर्श करेंगे। उसके बाद आगामी नवंबर में चीन में ही शिखर बैठक की योजना है। क्षेत्रीय साझेदारी का यह विचार अचानक नहीं आया है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप के जवाब में चीनी नेता 2012 से ही ऐसी एक क्षेत्रीय साझेदारी की बात करते आ रहे थे।

जापानी कंपनी संटोरी के मुख्य कार्यकारी और प्रधानमंत्री शिंजो अबे को आर्थिक मुद्दों पर सलाह देने वाली परिषद के सदस्य ताकेशी निनामी कहते हैं, 'मुझे उम्मीद नहीं है कि क्षेत्रीय साझेदारी से संबंधित समझौता आगामी नवंबर तक पूरा हो जाएगा। इसमें थोड़ा और समय लगेगा।' इस समझौते में सबसे बड़ी बाधा चीन का ऊंचा शुल्क है। लंबे समय से बीजिंग को यह आशंका सताती रही है कि अगर वह अपने उद्योगों को संरक्षण देने वाली ऊंचे शुल्क की दीवार गिरा देगा, तो अनेक निर्माता कंपनियां वियतनाम और बांग्लादेश जैसे कम शुल्क वाले देशों का रुख करेंगी। 

हालांकि अस्तित्व बचाने के लिए चीन ने शुल्क घटाने शुरू किए हैं। पर उसकी समस्याएं कम नहीं हो रहीं। अपने विशाल आकार और तेज विकास दर को देखते हुए भारत चीनी वस्तुओं का बड़ा खरीदार हो सकता है। लेकिन ऊंचे औसत शुल्क के जरिये भारत विकसित अर्थव्यवस्थाओं से अपने बाजार को बचाता आया है। उसे डर है कि सस्ते चीनी सामान उसकी अपनी अर्थव्यवस्था को तबाह कर देंगे। 

इसके बावजूद भारतीय फार्मास्यूटिकल कंपनियां चीन में अपनी जेनेरिक दवाओं का निर्यात करना चाहती हैं, तो भारतीय कंप्यूटर प्रोग्रामर चीन में अस्थायी वर्क वीजा की संभावनाएं तलाश रहे हैं। डालमिया ग्रुप होल्डिंग्स के चेयरमैन गौरव डालमिया कहते हैं, 'कई ऐसे क्षेत्र हैं, जो चीनी प्रतिद्वंद्विता में टिक नहीं पाएंगे, जबकि सेवा क्षेत्र जैसे कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं, जिन्हें इससे लाभ होगा।' तथ्य यह भी है कि क्षेत्रीय समझौते के आकार लेने के बावजूद यह तय नहीं है कि इससे चीन को कितना लाभ होगा।   

© The New York Times 2019

 
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