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यूरेशिया में चीन है चुनौती

Fri, 10 Jul 2015 08:19 PM IST
मनोज जोशी
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यूरेशिया की तेजी से बदलती भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मध्य एशिया और रूस की यात्रा पर हैं। ये वे क्षेत्र हैं, जहां भारत की सीधी जमीनी पहुंच नहीं है, लेकिन इन क्षेत्रों की अनदेखी नहीं की जा सकती, क्योंकि व्यापक एशियाई शक्ति संतुलन की दृष्टि से इनका काफी महत्व है।
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लंबे समय से अपेक्षित प्रधानमंत्री का दौरा ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन के मौके पर हुआ। भारत और पाकिस्तान, दोनों एससीओ के सदस्य बनने जा रहे हैं, क्योंकि अफगानिस्तान में संघर्ष को खत्म करने और ऐसा वातावरण बनाने में दोनों देशों की महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसमें दक्षिण व मध्य एशियाई देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को एकीकृत कर सकते हैं।

जहां तक ब्रिक्स की बात है, तो कई लोग इसे पश्चिम विरोधी समूह के रूप में देखते हैं। लेकिन भारत के लिए इसका सीधा-सा मतलब है, वैश्विक शासन संरचनाओं में पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए बड़े विकासशील देशों को एकजुट करना। चीन के प्रयास से ब्रिक्स बैंक (जिसे अब न्यू डेवलपमेंट बैंक के नाम से जाना जा रहा है) और एशिया इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेंस्टमेंट बैंक की स्थापना की गई है, जिसे वैश्विक वित्तीय संरचना में विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी पश्चिम के प्रभुत्ववाली संस्थाओं के लिए चुनौती माना जा सकता है।
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जहां तक मध्य एशिया की बात है, तो भारत के लिए वहां स्थिति बहुत अनुकूल नहीं है। हालांकि उस क्षेत्र के साथ हमारा ऐतिहासिक रिश्ता रहा है, जो ब्रिटिश शासन के साथ खत्म हो गया और बाद में देश विभाजन के कारण भारत की पहुंच वहां प्रभावी ढंग से खत्म हो गई, क्योंकि पाकिस्तान हमारे प्रति दुश्मनी का भाव रखता है और उत्तरी कश्मीर पर उसका नियंत्रण है। उस क्षेत्र में चीन के लिए स्थिति अनुकूल है, क्योंकि शिंजियांग प्रांत के जरिये चीन की उस क्षेत्र में सीधी जमीनी पहुंच है। सितंबर, 2013 में पांच मध्य एशियाई गणराज्य की यात्रा के दौरान शी जिनपिंग ने न्यू सिल्क रोड की अपनी परिकल्पना की घोषणा की थी।

चीन उस क्षेत्र में पहले ही 31 अरब डॉलर का निवेश कर चुका है और चीन की कंपनियां तुर्केमेनिस्तान, उजबेकिस्तान एवं कजाकिस्तान में इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा क्षेत्र और विशाल काशागन तेल क्षेत्र में हिस्सेदारी खरीदने के लिए अतिरिक्त 51 अरब डॉलर के निवेश पर सहमत हैं। इस नई हिस्सेदारी के साथ वह तेल क्षेत्र के निर्यात की दिशा चीन की तरफ मोड़ना चाहता है। प्राकृतिक गैस की भी यही कहानी है। वर्ष 2009 में शुरू हुए चीन-मध्य एशिया गैस पाइपलाइन ने इस क्षेत्र में रूस के एकाधिकार को खत्म कर दिया।

वर्षों से चीन की वित्तीय सहायता से इस क्षेत्र में नए राजमार्ग और रेल नेटवर्क का निर्माण हुआ है। पहले से ही इस क्षेत्र का आर्थिक झुकाव चीन के प्रति है, लेकिन जब राजनीतिक एवं सुरक्षा मुद्दों की बात आती है, तो चीन रूस के हितों के प्रति संवेदनशील हो जाता है। इसलिए उसने रूस को इस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व बनाए रखने की अनुमति दी है।

असल में तीन कारक इस क्षेत्र में चीन की नीति को निर्देशित करते हैं। पहला, अपने अशांत पश्चिमी प्रांत शिंजियांग को ढाल प्रदान करना। दूसरा, ऊर्जा आपूर्ति के स्रोत के रूप में इसका इस्तेमाल, जो अमेरिकी प्रभुत्व वाले समुद्री नाकाबंदी से प्रतिरक्षित है। और तीसरा, कमजोर मध्य एशियाई गणराज्य को स्थिरता प्रदान करने की जरूरत और यह सुनिश्चित करना कि वे अमेरिकी खेमे में न जाएं। इन्हीं वजहों से चीन ने नए सिल्क रूट की परिकल्पना की है।
भू-राजनीतिक स्थिति उस क्षेत्र में भारत की भूमिका को सीमित करती है। उस क्षेत्र में भारत का व्यापार मात्र एक अरब डॉलर का है, जो चीन के उस क्षेत्र में व्यापार का पचासवां हिस्सा है। मध्य एशिया को छोड़िए, रूस के साथ भारत का व्यापार घट रहा है और वर्ष 2014 में यह मात्र छह अरब डॉलर रह गया। भले ही मोदी की यह यात्रा आधिकारिक रूप से गैस, तेल एवं यूरेनियम जैसे ऊर्जा संसाधनों पर केंद्रित है, लेकिन कनेक्टिविटी की समस्या पर काबू पाना बहुत बड़ी चुनौती है। पाकिस्तान के साथ हमारी स्थायी समस्या को देखते हुए तापी पाइपलाइन जैसी योजना, जो तुर्कमान से भारत गैस ला सकती है, हमारा भावी सपना है।

भारत के सामने एक ही विकल्प है कि वह ईरान के जरिये मध्य एशिया और रूस तक पहुंच बनाने के लिए मल्टी-मॉडल (समुद्री, सड़क व रेल) कॉरिडोर का निर्माण करे। चाहबहार और बांदर अब्बास बंदरगाहों का उपयोग मध्य एशिया और रूस में कंटेनर भेजने के लिए किया जा सकता है। पर अभी नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर सिर्फ आधिकारिक बयानबाजी है, जबकि चीनी कॉरिडोर से रेलवे कंटेनर चीन से यूरोप भेजा जाता है और मध्य एशिया से गैस एवं तेल चीन लाया जाता है।

ईरान में रेल प्रणाली में कई लिंक का अभाव है और कुछेक को और उन्नत बनाने की जरूरत है। इसके अलावा चाहबहार बंदरगाह का निर्माण किए जाने की जरूरत है। भारत के सामने कई तरह की अड़चनें हैं। सबसे पहले इसे अमेरिका और ईरान के बीच भू-राजनीतिक मतभेद दूर करने की जरूरत है, जो भारतीय कंपनियों को ईरान में प्रभावी ढंग से काम करने में बाधा डालता है। दूसरे भारत को परियोजनाएं शुरू करने के लिए मौद्रिक संसाधनों को व्यवस्थित करने की जरूरत है। तीसरी बात, नई दिल्ली को परियोजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए प्रभावी परियोजना प्रबंधन तंत्र की जरूरत है। विदेश मंत्रालय इसके लिए नोडल मंत्रालय हो सकता है, पर समय पर बजट के मुताबिक बड़ी परियोजनाओं को शुरू करने के लिए इसे निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता की आवश्यकता है।

इसी बीच हमें कथनी और करनी के अंतर को पाटने की भी जरूरत है। लंबे समय से भारत मध्य एशिया के साथ गंभीरता से जुड़ने के लिए अपने सांस्कृतिक संपर्क पर जोर दे रहा है। अब यह तय करने का समय आ गया है कि भारत यूरेशिया के खेल में खिलाड़ी बनना चाहता है या दर्शक ही बने रहना चाहता है।
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-लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रतिष्ठित फेलो हैं
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