चीन, जिसकी म्यांमार में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से लेकर खनन तक में भारी दिलचस्पी है, ने लड़खड़ाती सेना जुंटा को हार से बचाने के लिए अपनी ताकत झोंक दी है। बीते महीने चीनी वार्ताकारों ने कोकांग विद्रोही समूह एमएनडीएए (म्यांमार नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस आर्मी) को लाशियो शहर से हटने के लिए मजबूर किया, जिस पर विद्रोहियों ने पिछले साल महीनों की भारी लड़ाई के बाद कब्जा किया था। लाशियो उत्तरी प्रांत शान का प्रमुख शहर होने के साथ ही चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे के लिए अहम माना जाता है, जहां बर्मी सेना की उत्तर-पूर्वी कमान (तत्मादाव) का मुख्यालय स्थित है। इसी तरह एमएनडीएए की सहयोगी तांग नेशनल लिबरेशन आर्मी (टीएनएलए) पर शान राज्य के ही दो महत्वपूर्ण शहरों ह्सिपाव और क्याकमे को सेना जुंटा को सुपुर्द करने का दबाव बनाया जा रहा है। ये दोनों शहर चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे के लिए महत्वपूर्ण हैं, जिसे बीजिंग को बंगाल की खाड़ी और फिर हिंद महासागर तक जमीन से समुद्र तक पहुंच प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है।
चीन सीधे तौर पर उन विद्रोही समूहों के सीधे संपर्क में है, जिन्होंने देश के उत्तर में स्थित दुर्लभ मृदा धातु खदानों पर अपना नियंत्रण किया हुआ है। सूत्रों के अनुसार, बीजिंग इन विद्रोही समूहों पर आपूर्ति में वृद्धि हेतु खनन कार्यों को बढ़ाने के लिए दबाव बना रहा है। चीन को भारी दुर्लभ मृदा धातुओं को चुंबकों में बदलने के लिए क्षेत्र में लगभग एकाधिकार प्राप्त है, जिनसे पवन टर्बाइनों, चिकित्सा उपकरणों और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे महत्वपूर्ण माध्यमों को ऊर्जा प्राप्त होती है। यह बात कम लोगों को पता है कि चीन दुर्लभ मृदा धातुओं और ऑक्साइड के लिए म्यांमार पर काफी हद तक निर्भर है। उसके दुर्लभ मृदा आयात का लगभग आधा हिस्सा म्यांमार के काचिन और शान प्रांतों से आता है।
म्यांमार से दुर्लभ मृदा का आयात करने वाली चीनी कंपनियों में तब हड़कंप मच गया, जब बीते साल अक्तूबर में काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी (केआईए) ने पनवा और चिपवे शहरों पर नियंत्रण हासिल कर लिया था, जिससे उसे इस क्षेत्र में दुर्लभ मृदा खदानों पर पूरा नियंत्रण मिल गया। चीनी कंपनियों को फिर से काम करने का मौका तब मिला, जब चीन ने केआईए पर संघर्ष विराम के लिए दबाव डालना बंद किया। इससे बीते छह महीनों में चीन के आयात में 90 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी। हालांकि, आयात फिर से शुरू हो गया है, क्योंकि इससे केआईए को भारी राजस्व प्राप्त होता है।
चीनी कंपनियों ने काचिन प्रांत का विकल्प तलाश लिया है और चीन सीमा से करीब 200 किलोमीटर दूर मोंग हसात और मोंग युन शहरों में नई दुर्लभ मृदा खदानों से खनन शुरू कर दिया है। कंपनियों ने म्यांमार के सबसे मजबूत जातीय विद्रोही समूह यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी (यूडब्ल्यूएसए) के संरक्षण में खनन कर्मियों को तैनात किया है, जिसे पिछले 25 वर्षों से बीजिंग द्वारा हथियार प्रदान किए जा रहे हैं। वा और कोकांग जनजातियों ने अब समाप्त हो चुकी बर्मी कम्युनिस्ट पार्टी की सशस्त्र शाखा के लिए अधिकांश पैदल सैनिक उपलब्ध कराए थे, जो 1980 के दशक के अंत में बंद हो गई थी। बीजिंग ने बर्मी सेना और अपनी सीमाओं पर प्रमुख जातीय विद्रोही समूहों को बढ़ावा देने की अपनी नीति के तहत यूडब्ल्यूएसए और एमएनडीएए को हथियार और उपकरण देना जारी रखा है।
यूडब्ल्यूएसए चीन के बहुत करीब है और इसने पिछले तीन दशकों में बर्मी सेना के साथ लड़ाई नहीं की है, इसलिए बीजिंग वा स्वायत्त क्षेत्र में धरती के दुर्लभ भंडार को दोहन के लिए अधिक आसान मानेगा। यूडब्ल्यूएसए इसे सिंथेटिक ड्रग व्यापार से अपनी कमाई बढ़ाने के लिए राजस्व के एक नए स्रोत के रूप में देखेगा। रखाइन प्रांत के 17 में से 14 शहरों पर अराकान आर्मी (एए) का कब्जा है, जहां चीनी सेना बर्मी सेना की मदद कर रही है, ऐसे में जुंटा और एए के बीच संघर्ष तेज होने का अंदेशा है। इस इलाके में चीन की कई परियोजनाएं चल रही हैं, जिनमें चीन के युन्नान प्रांत से जुड़ने वाली तेल-गैस पाइपलाइन क्यौकफ्यू के पास माडे द्वीप से निकलती है, जहां चीन ने एक रिफाइनरी बनाई है। जुंटा ने भी इस वर्ष की शुरुआत में एक कानून पारित कर चीनी सुरक्षा कर्मियों को अपने प्रतिष्ठानों की सुरक्षा करने की अनुमति प्रदान की थी, जिनमें ज्यादातर चीन के पूर्व सैनिक हैं।
चीन का केआईए और एए जैसे विद्रोही समूहों पर उतना प्रभाव नहीं है, जितना कि यूडब्ल्यूएसए और एमएनडीएए जैसे वा और कोकांग विद्रोही समूहों पर है। यदि बर्मी सेना को, खासकर क्यौकफ्यू में ज्यादा नुकसान होता है, तो चीनी सुरक्षाकर्मी संघर्ष में हिस्सा ले सकते हैं, क्योंकि बीजिंग हर हाल में जुंटा को बचाने में जुटा है। पता चला है कि विद्रोही समूहों का साथ देने के लिए कुछ पश्चिमी सैनिक भारत के मिजोरम के रास्ते म्यांमार में घुस गए हैं, जिनमें से कई यूक्रेन में लड़ चुके हैं।
ऐसे में बांग्लादेश से रखाइन आपूर्ति गलियारा बनाने में अमेरिका की दिलचस्पी जुंटा को हराने के लिए विद्रोही समूहों को बढ़ावा देने की योजना का हिस्सा हो सकती है, ताकि चीन को बंगाल की खाड़ी तक अपनी बहुप्रतीक्षित जमीन से समुद्री पहुंच तक वंचित किया जा सके। म्यांमार में चीन-अमेरिका की बढ़ती प्रतिद्वंद्विता के ऐसे परिदृश्य में, भारत अब चुपचाप बैठकर इंतजार नहीं कर सकता। चूंकि भारत म्यांमार के साथ एक लंबी और संवेदनशील स्थलीय सीमा और समुद्री सीमा साझा करता है, इसलिए उसे इस बात पर विचार करना होगा कि एक अशांत पड़ोसी देश में उभरती परिस्थितियों को कैसे संभाला जाए।