यह बात तो सर्वविदित ही है कि भारत दुनिया का सर्वाधिक युवा देश है, यानी भारत की युवा आबादी चीन समेत दुनिया में किसी देश से ज्यादा है। चीन की जनसंख्या लंबे समय से भारत से ज्यादा बेशक रही है, लेकिन उसकी युवा आबादी भारत की युवा आबादी से कम ही रही। इसका कारण यह है कि 1980 के दशक में चीन ने अपनी जनसंख्या पर नियंत्रण के लिए हर दंपत्ति के लिए एक ही संतान की अनिवार्य शर्त रख दी, यानी कोई भी दंपत्ति एक संतान से अधिक पैदा नहीं कर सकता। यदि किसी भी महिला द्वारा एक से अधिक संतान पैदा करने का प्रयास किया जाता था, तो उसे विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित किया जाता था। एक बच्चे के जन्म के बाद किसी महिला के गर्भधारण करने पर जबर्दस्ती गर्भपात भी करवाया जाता था।
एक संतान की नीति को क्रूरता से लागू करने के कारण चीन की जनसंख्या की वृद्धि दर में भारी कमी आ गई और अब अंततोगत्वा चीन की जनसंख्या घटने लगी है। दूसरी तरफ भारत में भी हालांकि जनसंख्या नियंत्रण के उपाय तो किए गए, और सामान्य परिवार दो बच्चों तक ही सीमित हो गए, लेकिन इसमें जबर्दस्ती की कोशिश नहीं थी। इस तरह जनसंख्या की वृद्धि दर घटने लगी।
जनसांख्यिकी के हाल ही में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल प्रजनन दर 2019 के 2.2 से घटकर 2022 तक 2.159 रह गई। गौरतलब है कि यदि प्रजनन दर 2.0 प्रतिशत से कम होती है, तो जनसंख्या घटने लगती है। लेकिन पूर्व में जनसंख्या वृद्धि की प्रवृत्तियों के कारण और 1980 और 1990 के दशकों में जनसंख्या वृद्धि की दर दो प्रतिशत के आसपास रहने के कारण देश में बच्चों की जनसंख्या में खासी वृद्धि हो गई। 1980 और 1990 के दशक में पैदा हुए बच्चे 2000 और 2010 के दशक में युवावस्था को प्राप्त हुए। यानी देश में युवा जनसंख्या का अनुपात बढ़ने लगा। आज हमारी 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम है। लेकिन चीन की एक संतान नीति के कारण उनकी जनसंख्या में युवाओं का अनुपात कम होता गया।
हालांकि भारत में युवा जनसंख्या के बढ़ने और देश में उस अनुपात में रोजगार न बढ़ पाने के कारण देश के युवा दुनिया के दूसरे मुल्कों में रोजगार की तलाश में जाने लगे। इस कारण से शेष दुनिया में भारतीयों की संख्या बढ़ने लगी और उनके द्वारा भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा कमाकर भारत में भेजी जाने लगी। वर्ष 2022 में भारतीयों द्वारा स्वदेश भेजी जाने वाली राशि 100 अरब डॉलर से भी ज्यादा रही। यह राशि अनिवासी चीनियों द्वारा चीन भेजी जाने वाली राशि से कहीं ज्यादा थी। भारत में श्रमशक्ति की उपलब्धता काफी बढ़ गई और उसका पूरा उपयोग भी नहीं हो पाता, बेरोजगारी में भी देश में भारी वृद्धि देखी जा रही है।
चीन में तेजी से बढ़ती जनसंख्या और उसके अनुपात में संसाधनों की कमी से घबरा कर वहां के कम्युनिस्ट शासकों ने क्रूरता से एक संतान की नीति लागू तो कर दी, पर चीन को इसके साथ एक अन्य समस्या का सामना करना पड़ा। वह यह कि वहां युवाओं की तुलना में बुजुर्गें का अनुपात बढ़ने लगा। इसका असर यह हुआ कि चीन में श्रमशक्ति की कमी हो गई और मजदूरी दर भी बढ़ने लगी। लेकिन अब चूंकि चीन की जनसंख्या ही घटने लगी है, ऐसे में, उसकी मुसीबतें और बढ़ सकती हैं।
पहले से ही विकास दर की कमी, महामारी, सरकारी और निजी क्षेत्र की बढ़ती ऋणग्रस्तता तथा अमेरिका समेत दुनिया के विभिन्न मुल्कों की बढ़ती बेरुखी के चलते पहले से ही मुश्किल में आए चीन की परेशानियां जनसंख्या की कमी से और बढ़ सकती हैं। आज चीन में खाद्य पदार्थों, अन्य विनिर्मित उत्पादों और साज-ओ-सामान का उत्पादन बहुत अधिक मात्रा में होता है, लेकिन घटती जनसंख्या के चलते वहां घरेलू मांग प्रभावित हो सकती है। भारत और अन्य मुल्कों में आत्मनिर्भरता के प्रयास भी साज-ओ- सामान की उसकी मांग को कम कर सकते हैं। घटती घरेलू मांग चीन की अर्थव्यवस्था में ठहराव का कारण बन सकती है।
आने वाली मुसीबत को समझते हुए चीन की सरकार ने कुछ साल पहले अपनी एक संतान नीति में कुछ ढिलाई का एलान तो किया, लेकिन श्रमशक्ति और घरेलू मांग में वृद्धि के संबंध में इसके परिणाम आने में काफी देर लग सकती है। आज अवसर है कि भारत अपने जनसांख्यिकी लाभ, चीन के संकटों और रूस समेत दुनिया में भारत के लिए खुलते नए बाजारों का लाभ उठाते हुए आत्मनिर्भरता के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़े। सरकार इस मामले में संवेदनशील है और इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए चीन से आयातों को रोकने हेतु पीएलआई स्कीम, एंटी डंपिंग ड्यूटी और अन्य रुकावटें लगा रही हैं।
चीन से आने वाले अंधाधुंध आयातों के कारण पूरी दुनिया में मैन्यूफैक्चरिंग प्रभावित हुई, जिसके कारण दुनिया भर के मुल्कों को बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है। चीन की बढ़ती आर्थिक और सामरिक ताकत के चलते भारत समेत चीन के सभी पड़ोसी देश ही नहीं, कई दूसरे मुल्क भी आशंकित हैं। आज जब चीन संकट में है, तो उन सभी मुल्कों को एक रणनीति के तहत वे उपाय करने होंगे, ताकि चीन के कम्युनिस्ट शासकों की आर्थिक और सामरिक ताकत घटे और वह दुनिया को परेशान न कर सके।