यह कि उन्हें हवाई यात्रा से बचना चाहिए या कहीं घूमने से। नहीं तो कोई पहलगाम जैसी घटना हो सकती है। और यह सिखाते-सिखाते युद्ध का सायरन बज जाए, तो फिर वे माता-पिता और बच्चे क्या करें? भूख से बिलखते बच्चे, रूस-यूक्रेन का युद्ध, बांग्लादेश-पाकिस्तान की उथल-पुथल में फंसा भारत और फिर तमाम असुरक्षा के बीच माता-पिता अपने बच्चों को जीवे का हौसला कैसे दें? यह कठिन घड़ी है, क्योंकि जीवन कुछ ज्यादा अनिश्चित हो गया है। और यह उन तमाम माता-पिता के लिए एक चुनौती है, जहां उन्हें बच्चों को सतर्क भी करना है और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी।
बच्चों की यह एक पीढ़ी पहले ही कोविड की भयावहता और असुरक्षा से रूबरू हो चुकी है, लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच वर्षों से चल रहा तनाव एक बहुत मुश्किल पाठ बन चुका है। उस हर छात्र के मन में डर का माहौल है, जब वह कोई सायरन बजते सुनता है या कोई मॉक ड्रिल की खबर आ जाती है। उन बच्चों की आंखों में स्कूल के मॉक ड्रिल के बाद का खामोश डर है। और उन बालकों की पीड़ा का क्या, जिनके माता-पिता को देश की रक्षा के लिए सीमा पर बुलाया जाता है। वे तो कभी नहीं समझ पाते कि दो देश वर्षों से लड़ क्यों रहे हैं और समझें भी कैसे? आखिर दो देशों के बीच उलझे हुए इतिहास और संघर्ष के परिणामों को समझने के लिए वे अभी बहुत कोमल भी तो हैं।
लेकिन युद्ध और तमाम मृत्यु की घटनाएं उनके बचपन को बाधित कर रही हैं-उस डर से, अनिश्चितता से, एक ऐसी दुनिया से, जो अचानक कम सुरक्षित महसूस मालूम होती नजर आ रही है। और यह चिंता और घनी होती जा रही है। जब उनके माता-पिता खुद को असहाय महसूस कर रहे होते हैं।
अपने जीवन से ज्यादा दूसरे के जीवन का महत्व कोविड ने समझाया। आखिर दुनिया ने उस अकेलेपन और उपेक्षा को भी कोविड के दौर में झेला है। अपने शोध अध्ययन ‘कोविड-19 : पोस्ट-ट्रॉमेटिक ग्रोथ और तनाव के अनुभव पर सामाजिक संबंध की भूमिका’ में मार्सेला माटोस, कर्स्टन मैकइवान, मार्टिन कानोवस्की आदि यह मानते हैं कि कोविड-19 महामारी के दौरान जो एक प्रमुख तनाव समझा गया वह था सामाजिक वियोग और अकेलेपन की भावना। उनका अध्ययन इस बात की भी पड़ताल करता है कि अकेलेपन और करुणा के अभाव ने किस तरह से लोगों क पोस्ट-ट्रॉमेटिक ग्रोथ और पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस को प्रभावित किया है।
‘कोविड 19 समुदाय, संचार और करुणा’, यही फियोना लोंगमुइर का शोध पेपर था और यह पेपर उन तरीकों की जांच करता है, जिनमें ऑस्ट्रेलियाई स्कूल के लीडर्स ने कोविड-19 वैश्विक महामारी से उत्पन्न संकट और अनिश्चितता की स्थितियों को समझा और उनका सामना किया। उनके निष्कर्षों से यह पता चला कि इन तमाम विद्यालयों का मुख्य फोकस संवेदना निर्माण और अपने समुदायों की भलाई करना था। पक्विता डी जुलुएटा ने अपने अध्ययन में लिखा, ‘करुणा मानव कल्याण के लिए केंद्रीय है, जो इसे देते हैं और जो इसे प्राप्त करते हैं, दोनों को ही लाभ होता है।’
तो यह जरूरी है कि माता-पिता इस असुरक्षित माहौल में अपने बच्चों को और करुणा और संवेदनशीलता से समझें। उन्हें सुनने की कोशिश करें। अगर वे भयभीत नजर आएं या डर को व्यक्त करें, तो उन्हें डरपोक की संज्ञा न दें। आशा तभी संजोई जा सकती है, जब स्कूल से पास होते ही उन्हें सिर्फ यह न बताया जाए कि कुछेक लोगों से ही यह दुनिया चलती है और वे इंजीनियर, डॉक्टर, वकील या चार्टेड अकाउंटेंट होते हैं। बारहवीं के बाद कोई भी सपना इन ग्रहों के इतर नहीं होता। कोई उनसे नहीं पूछता कि तुम क्या बनना चाहते हो?
सभी गूगल से पूछकर उसे यह बताने में लगे रहते हैं कि स्कूल की आजाद दुनिया कुछ नहीं होती और न होती है कुछ उसकी वह अटेंडेंस वाली पढ़ाई। दुनिया तो नौकरी से शुरू होकर वहीं समाप्त भी हो जाती है। लेकिन एक दुनिया स्वस्थ रूप से खुश होकर जिंदा रहने की भी होती है और उन दुखों को महसूस करने के कवच-कुंडल के साथ। अगर स्कूल संग माता-पिता इस बात को समझेंगे, तो आने वाली पीढ़ी को वे उस करुणा और संवेदना से जोड़ पाएंगे, जो कहीं न कहीं से उनको जीवन की आशा देगी। सिर्फ बच्चों को ही नहीं, बल्कि खुद को भी।
अगर ऐसा नहीं हुआ, तो कल कोई बच्चा हवाई जहाज पर बैठने से डरेगा, और डरेगा उड़ते ड्रोन को देखकर, कहीं पहाड़ों पर घूमने जाने से भी डरेगा और ठिठक जाएगा मॉक ड्रिल की खबर और उस सायरन को सुनकर। इस असुरक्षा को हर मां-बाप और स्कूल के शिक्षक को समझना होगा और करुणा और संवेदना के मूल्यों को एकीकृत कर उनको अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्यास, ‘द ओल्ड मैन एंड द सी’ के उस सिंटिया नामक बूढ़े मछुआरे के कथन को दोहराना होगा, ‘मनुष्य को पराजित नहीं किया जा सकता।’