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कनाडा की चेखव

Fri, 11 Oct 2013 08:10 PM IST
रमण कुमार सिंह
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विगत अप्रैल में जब कनाडा की 82 वर्षीय लेखिका एलिस मुनरो से वक्त ने उनके दूसरे पति जेराल्ड फ्रेमलिन को छीना होगा, तो उन्होंने शायद सोचा भी नहीं होगा कि यही वक्त जल्द ही उन्हें मुस्कराने का मौका भी देगा। मानव जीवन की ऐसी ही जटिलताओं पर कहानियां बुनने वाली एलिस मुनरो को इस बार साहित्य का नोबल मिला है।
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एलिस मुनरो लघुकथाओं की सिद्धहस्त लेखिका मानी जाती हैं। मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद और स्पष्टता उनके लेखन की विशेषता है। अपने चरित्रों का उन्होंने जिस गर्माहट, अंतर्दृष्टि और सहानुभूति के साथ चित्रण किया है, वह विरल है। कई आलोचक उन्हें ‘कनाडा की चेखव’ भी कहते हैं। आमतौर पर उनकी कहानियां छोटे शहर के परिवेश पर केंद्रित रही हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में स्वीकृत सामाजिक परंपरा के कारण संबंधों के तनाव और नैतिक संघर्ष को चित्रित किया है।

कनाडा के ओंटारियो प्रांत के रूढ़िवादी शहर विन्घम में किसान पिता और स्कूल शिक्षिका मां के घर में 10 जुलाई, 1931 को जन्मी एलिस ने हाई स्कूल की पढ़ाई के बाद वेस्टर्न ओंटारियो विश्वविद्याल में अंग्रेजी और पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू की, लेकिन कॉलेज के साथी जेम्स मुनरो से विवाह करने के लिए उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। एलिस ने लिखना तो किशोरावस्था से ही शुरू कर दिया था, लेकिन उनका पहला कहानी संग्रह डांस ऑफ द हैप्पी शेड्स छपा 1968 में। इस पहली किताब ने ही उन्हें अपने देश में चर्चित कर दिया।
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पति के साथ ब्रिटिश कोलंबिया के विक्टोरिया में बस जाने के बाद वह पूरी तरह गृहिणी बन गईं। मगर उम्र के तीसरे दशक के शुरू में ही वह इतनी डरी-सहमी और उदास रहने लगीं कि कुछ समय के लिए लिखना बिल्कुल ही छूट गया। फिर जब पति के साथ उन्होंने किताबों की दुकान खोली, तो लोगों से संवाद का मौका मिला और उनकी कलम फिर से चल पड़ी।

मगर इसी बीच जेम्स मुनरो से तलाक हो गया। बाद में उन्होंने फ्रेमलिन से शादी की और क्लिंटन आ गईं। उनकी कहानियों के 14 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और मैन बुकर प्राइज सहित कनाडा के साहित्य जगत का सबसे बड़ा पुरस्कार भी उन्हें तीन बार मिला है। वह कनाडा में रहने वाली पहली लेखिका हैं, जिन्हें नोबल मिला है। लेखन से संन्यास की घोषणा के बाद मिला नोबल सम्मान उनके ही कहे वाक्य 'धमाके के साथ विदाई अच्छा लगता है', को चरितार्थ करता है।
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- रमण कुमार सिंह
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