फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

केवल सस्ता अनाज काफी नहीं

Fri, 25 Oct 2013 07:24 PM IST
भारत डोगरा
विज्ञापन
विज्ञापन
यह अच्छी बात है कि केंद्र सरकार ने खाद्य सुरक्षा पर विशेष जोर देते हुए देश की एक बड़ी आबादी को गेहूं और चावल जैसे अनाज बहुत कम कीमत पर उपलब्ध कराने का अभियान शुरू किया है। इससे बहुत लोगों को लाभ मिलेगा। कम से कम वे भूख से तो नहीं मरेंगे। कायदे से यह काम बहुत पहले ही शुरू हो जाना चाहिए था। वैसे सरकार का यह अभियान एकांगी है। यह ठीक है कि गेहूं और चावल से लोगों का पेट भर जाएगा। लेकिन जीने और स्वस्थ रहने के लिए सिर्फ सस्ता अनाज काफी नहीं। उनके भोजन की थाली में प्रोटीन भी चाहिए, जिनकी बेहतरी के लिए सरकार ने यह काम शुरू किया है। साफ है कि आम लोगों में प्रोटीन की बढ़ती कमी की ओर सरकार ने समुचित ध्यान नहीं दिया है। वह गरीबों की थाली में रोटी तो रखना चाह रही है, पर दाल की कटोरी भरने की ओर से आंखें मूंदे हुए है। जबकि हमारे देश में दाल ही प्रोटीन का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
विज्ञापन


दाल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता कम होने से पोषण की भी क्षति होती है और पर्यावरण की भी। दलहन फसलों में प्रकृति से नाइट्रोजन प्राप्त करने और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने की अद्भुत क्षमता है। प्रायः यह चारे की उपलब्धि की दृष्टि से भी बेहतर मानी गई है।

भारत की जलवायु और मिट्टी विविध तरह की दालों के उत्पादन के लिए बहुत अनुकूल पाई गई है। इसके बावजूद दालों की उपलब्धि में निरंतर कमी होना और दाल का महंगा होना हमारी खाद्य और कृषि नीति की एक बड़ी विसंगति है। पहले मिश्रित कृषि पद्धतियों के अंतर्गत मुख्य अनाज और दलहन साथ-साथ उगाए जाते थे, जो मिट्टी के उपजाऊपन के लिए भी अच्छा था और पोषण के लिए भी। पर सरकारी नीतियों की नासमझी से इस मिश्रित खेती को पीछे धकेला गया, नतीजतन खेतों में मात्र अनाज की एकरूपता छा गई।
विज्ञापन


आज स्थिति यह है कि घटिया दालों का हम आयात कर रहे हैं, तो भी दालों के दाम बढ़ रहे हैं। विशेष योजना बनाकर और प्राथमिकता देकर दालों का बेहतर उत्पादन हमें अपने देश में करना चाहिए। बजट में कई बार विशेष दलहन उत्पादन क्षेत्र भी रेखांकित किए गए, पर उनका कोई लाभ इसलिए नहीं मिला, क्योंकि दलहन उत्पादन से किसानों को बहुत लाभ नहीं है। दालों में आने वाली तेजी का सारा लाभ बिचौलिये ले जाते हैं। सरकार को इस बारे में ध्यान देना चाहिए।

प्रोटीन का दूसरा मुख्य स्रोत दूध और दुग्ध पदार्थ हैं। हाल के वर्षों में शहरों के धनी वर्ग में इनकी खपत बढ़ी है, जबकि ग्रामीण व निर्धन वर्ग में इनकी खपत कम हुई है। पहले गांव में मक्खन-दूध अधिक बनता था, तो गरीब, भूमिहीन मजदूर को छाछ मुफ्त में ही मिल जाता था, पर अब ऐसा नहीं है। इसे सुधारने के लिए चारे और खली की बेहतर उपलब्धि के आधार पर और देसी नस्लों की रक्षा कर ग्रामीण निर्धन परिवारों को दूध उत्पादन के बेहतर अवसर देने चाहिए। हाल के दशकों में विदेशी नस्ल की गाय या भैंसों पर जिस तरह जोर दिया गया, वैसा अभियान देसी नस्लों के संवर्धन के पक्ष में नहीं चलाया गया। इसके अलावा घुमंतू पशुपालकों की आजीविका को बचाना भी जरूरी है।

तटीय क्षेत्रों में प्रोटीन का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत मछली रहा है। पर परंपरागत मछुआरों की आजीविका पर जिस तरह आघात हुए हैं, उससे निर्धन परिवारों में मछली की उपलब्धता कम हुई है। पर्यावरण के प्रति उदासीनता बरतने, नदियों की धाराओं के सूखने और तालाबों आदि को पाट देने के कारण मछुआरों की आजीविका खतरे में पड़ चुकी है। इनके अलावा भी प्रोटीन के कई स्रोत हैं, जिनकी पर्याप्त उपलब्धता के बारे में हमारी सरकारों को सोचना होगा।

उद्देश्य केवल यह नहीं कि प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ा ली जाए। महत्वपूर्ण यह है कि इसके साथ निर्धन वर्ग की आजीविका भी आगे बढ़े। मिल्क पाउडर और बटर ऑयल का आयात करना आसान है, पर इससे हमारे पशुपालकों व किसानों की आजीविका की क्षति होगी। जरूरत यह है कि पशु पालकों की आजीविका बढ़ाते हुए अच्छे गुणवत्ता के दूध की उपलब्धता बढ़ाई जाए।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें