यह वह दौर था, जब यूरोप में औद्योगीकरण रफ्तार पकड़ चुका था और भारत जैसे औपनिवेशिक देशों के कृषकों को नील सप्लाई करने के लिए बाध्य होना पड़ता था। इसी बीच चंपारण किसानों की मांगों के माने जाने के बाद गांधी जी की प्रसिद्धि समूचे देश में गूंजने लगी। सरदार पटेल संयुक्त गुजरात के बड़े कांग्रेस नेता के रूप में प्रसिद्ध होकर किसान प्रश्नों पर भी सक्रिय थे। आजादी के आंदोलन का स्वरूप बदलने लगता है और असहयोग आंदोलन में ग्रामीणों की व्यापक भागीदारी होने लगी। 1928 में पुन: गुजरात प्रांत के बारदोली संभाग में किसानों पर लगान की दरें करीब 22 फीसदी बढ़ा दी गईं। इसके विरोध में सरदार पटेल ने गांव-गांव जाकर किसानों को संगठित किया। सरकार को विवश होकर बढ़ा हुआ लगान वापस लेना पड़ा। इधर, उत्तर भारत विशेषकर संयुक्त प्रांत उत्तर प्रदेश में चौ. चरण सिंह इन वर्गों की मुखर आवाज बनकर उभर रहे थे। अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत में ही उन्होंने ग्रामीण शहरी विभाजन और अभिजात वर्ग द्वारा नौकरशाही पर एकाधिकार जैसे सवालों को उठाना शुरू कर दिया।
चौ. चरण सिंह को ग्रामीण इलाकों के खिलाफ बड़ा पूर्वाग्रह कृषि उपज के लिए दिए जाने वाले कम दामों में दिखाई दिया। उनका आंकलन था कि तीन चीजें-छोटे पैमाने की खेती (भारत में एक अपरिहार्य स्थिति), उच्च उत्पादकता और कृषि उपज की कम कीमतें एकसाथ नहीं रह सकतीं। भारत की स्थितियों को देखते हुए, एकमात्र उपाय किसानों को लाभकारी मूल्य देना चाहिए। वर्गों के बीच बढ़ती खाई को पाटने एवं प्रशासनिक सेवाओं में समानता लाने के लिए चौ. चरण सिंह एक राजनीतिक प्रस्ताव लाए-‘कृषि पुत्रों’ के लिए 60 फीसदी का आरक्षण लागू किया जाए। यह प्रस्ताव कांग्रेस कार्य समिति की 1939 की एक बैठक में प्रस्तुत किया गया। यद्यपि कार्य समिति इस प्रस्ताव को स्वीकृत नहीं कर पाई, लेकिन सामाजिक न्याय के आंदोलन की बुनियाद अवश्य खड़ी हो गई।
चौ. चरण सिंह ने कहा था कि 1931 में हुई जातिगत जनगणना के अनुसार, यूपी में कृषि समुदाय 55 फीसदी आंके गए। अगर इसमें खेतिहर मजदूरों को शामिल किया जाता है, तो यह आंकड़ा 75 फीसदी होगा। उनके अनुसार, ‘कृषि पुत्रों’ के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण को उनके शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर भी उचित ठहराया जा सकता है, जिसके लिए उनके पुरखे नहीं, बल्कि राज्य या समाज जिम्मेदार है। प्राथमिक शिक्षा के अलावा, सभी शैक्षणिक संस्थाएं शहरों में स्थित हैं। कम से कम जो लोग वर्ग संघर्ष में विश्वास करते हैं और हमेशा किसानों और मजदूरों के शोषकों के खिलाफ उनके अधिकारों की वकालत करते हैं, उन्हें इस प्रस्ताव सहित हर कदम का समर्थन करना चाहिए। 1939 की कांग्रेस समिति द्वारा अस्वीकृत प्रस्ताव 14 अक्तूबर, 1949 की संविधान सभा की बहस का मुख्य मुद्दा बना। डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के सेवा एवं पदों में आरक्षण के साथ-साथ किसान समुदायों के लिए हिस्सेदारी की बात थी। एक सदस्य गुप्त नाथ सिंह ने प्रस्ताव रखा कि जो वर्ग भारतीय समाज की रीढ़ है, जैसे-कृषक, पशुपालक या कारीगर वर्ग-हालांकि इन्हें एससी/एसटी में नहीं गिना गया है, लेकिन उन्हें सरकारी सेवाओं में सेवा का अवसर दिया जाए।
आजादी के बाद 1952 में प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि के लिए 35 फीसदी और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए 15 फीसदी राशि का आवंटन किया गया। इन योजनाओं का गठन पं. नेहरू की अध्यक्षता में होता रहा। पं. नेहरू अपनी सोवियत संघ की यात्रा के दौरान वहां के औद्योगीकरण की सफलता से काफी प्रभावित होकर लौटे, जिसका असर 1962 की तृतीय योजना में देखने को मिला, जब कृषि का आवंटन 15 फीसदी और औद्योगीकरण के लिए 35 फीसदी किया गया। ग्रामीण क्षेत्रों की खराब स्थिति के कारण गेहूं और चावल तक के लिए हमें आयात पर निर्भर होना पड़ा। यद्यपि बाद में पं. नेहरू ने इस कांट-छांट के लिए संसद में अफसोस व्यक्त किया। ग्रामीण भारत के उत्थान एवं संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए चौधरी चरण सिंह अनवरत कार्य करते रहे।