विश्व में सबसे बड़े बदलावों में गांवों की संख्या का तेजी से गिरना है। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक, सामाजिक विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1995 में दुनिया में गांवों की आबादी तीन अरब से ऊपर थी और शहरों की आबादी लगभग दो अरब थी। लेकिन 2015 आते-आते इसमें अप्रत्याशित बदलाव आया और शहरों की आबादी बढ़कर चार अरब के आसपास पहुंच गई, जबकि गांवों की संख्या तीन अरब के आसपास रही। ये आंकड़े निश्चित रूप से विचलित करने वाले हंै, क्योंकि इससे साफ पता चलता है कि आने वाले समय में गांव खाली होते चले जाएंगे और शहरों में दमघोंटू स्थिति पैदा हो जाएगी।
बात मात्र आबादी में परिवर्तन की नहीं है, बल्कि ये कई बदलते हालात की तरफ भी इशारा करते हैं। मसलन, सबसे पहले खेती को ही ले लीजिए। दुनिया भर में 2006 में 38 प्रतिशत भूमि पर खेती होती थी, जिसमें 2011 आते-आते लगभग एक फीसदी की गिरावट आई। आयरलैंड में 66 प्रतिशत भूमि पर खेती होती थी, जो गिरकर 65 प्रतिशत रह गई। डेनमार्क में 63 प्रतिशत भूमि पर खेती होती थी, जहां अब 61 फीसदी पर ही खेती होती है। सूडान में कृषि भूमि का रकबा 48 प्रतिशत से घटकर 47 प्रतिशत रह गया। मतलब एकाध को छोड़कर कोई भी देश ऐसा नहीं, जहां खेती में गिरावट न आई हो। अपने ही देश में देख लीजिए, 1992 में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति औसतन 1.01 हैक्टेयर भूमि थी, जो 2013 में घटकर 0.592 हैक्टेयर रह गई। इतनी बड़ी घटत अच्छे संकेत नहीं देती, क्योंकि इसका इशारा साफ है कि खेती की तरफ से किसानों का रुझान घटा है।
इसके बावजूद अगर कोई देश खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से असुरक्षित नहीं है, तो इसका मतलब है कि हमने व्यापारिक खेती को बढ़ावा दिया है और गरीब और सीमांत किसान खेती से दूर चले गए हैं। आधुनिक खेती ने पर्याप्त भोजन तो दिया है, पर इसकी गुणवत्ता व विभिन्नता पर प्रतिकूल असर पड़ा है। मतलब आज रसायनयुक्त भोजन ही हमारी थाली का हिस्सा है और हमने फसलों में स्थानीय विभिन्नताओं को खो दिया है।
बदलती दुनिया ने अगर कुछ और खोया है, तो वे प्राकृतिक वन, नदियां व ग्लेशियर हैं। आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में प्राकृतिक वनों का विनाश हुआ है। उदाहरण के लिए, अपने देश में प्राकृतिक वन मात्र 23 प्रतिशत ही बचे हैं, बाकी नए विकास की भेंट चढ़ गए हैं। दूसरे देशों में भी वनों में गिरावट आई है। जैसे जिम्बाबे में 2011 में लगभग 40 प्रतिशत भूमि पर वन थे, जो 2015 में घटकर 36 प्रतिशत रह गए। ये वन ही हैं, जो पानी, मिट्टी व प्राणवायु के उत्पादक हैं। पृथ्वी के बदलते मौसम व तापक्रम पर अगर कोई नियंत्रण रख सकता है, तो वन ही, जिन्हें हम दुनिया भर में खो रहे हैं। इसका बड़ा कारण है कि प्रकृति के रक्षक ग्रामीण तेजी से शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं।
दुनिया भर में मरती नदियों के पीछे का कारण बढ़ता शहरीकरण और घटते गांव ही हैं। चाहे विकसित देश अमेरिका की कहानी हो या फिर चीन या जापान की, सबने अपनी नदियों को पिछले 20 वर्षों में खोया ही खोया है। पानी की मात्रा व गुणवत्ता का बड़ा नुकसान आज पूरी दुनिया में दिखाई दे रहा है। शहरों की कचरा ढोती नदियां व गांवों में इनके जलागमों के बिगड़ते हालात आज नदियों को मारने पर उतारू हैं। ग्लेशियरों के भी ऐसे ही हालात हैं। दुनिया में सबसे बड़े अंटार्कटिका के ग्लेशियर अपना आकार खो रहे हैं। हिमालय हो या एल्पाइन, सब जगह पृथ्वी का बढ़ता तापक्रम सबसे पहले ग्लेशियर पर ही हमला कर रहा है।
इन सब बदलावों के पीछे बढ़ता शहरीकरण व इसकी बढ़ी आवश्यकताएं ही हैं। हमंे दुनिया भर में ग्रामीण क्षेत्रों को तवज्जो न देने का नुकसान भुगतना ही पडे़गा। यह भी विडंबना है कि आज किसी भी तरह के विकास में प्राकृतिक संसाधनों की ही बलि चढ़ती है, जो मोटे तौर पर ग्रामीण परिवेश के उत्पाद हैं। जैसे बिजली के तीन-चार ही बड़े स्रोत हैं, जो जल, कोयला, सौर या फिर पेट्रोल उत्पादों के रूप में हैं। इन संसाधनों से शहर रोशन भी होते हैं और उद्योग भी इन्हीं की कृपा से चलते हैं। लेकिन दूसरी तरफ आज भी दुनिया के दो अरब गांव बिजली से वंचित हैं। ऐसे में शहरों की चमक अंधेरों से विचलित गांवों में पलायन को ही जन्म देगी। सच तो यह है कि शहरों में पानी, बिजली की बढ़ती जरूरतें गांवों के हिस्से को लील चुकी हैं। शहरों के ठाठ-बाट के पीछे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गांवों के ही उत्पाद जुड़े हैं। अपने प्रबंधन व अन्य कौशलों के प्रताप से शहर बहुत आगे बढ़ गए, लेकिन विकास का लाभ गांवों को नहीं मिल पाया। पिछले कुछ दशकों में शहरों में जहां एक तरफ जीडीपी में बढ़ोतरी हुई, वहीं गांवों की जीडीपी या तो घटी या फिर स्थिर रही। इसके चलते न सिर्फ ग्रामीण एवं शहरी लोगों में, बल्कि विकसित एवं विकासशील देशों में भी आर्थिक असमानता बढ़ी है।
ऐसी बदलती परिस्थितियां कई बड़े प्रश्न भी खड़े करती हैं कि आने वाले समय में दुनिया का भविष्य क्या होगा। अगर इसी रफ्तार से गांव खाली होते चले गए और शहरी आबादी बढ़ती गई, तो 2050 तक हालात विस्फोटक हो जाएंगे। सबसे बड़ी मार प्राकृतिक उत्पादों-भोजन, पानी, हवा, मिट्टी पर पड़ेगी, जो सीधे-सीधे गांव से जुड़े उत्पाद हैं। वेनेजुएला के बिगड़ते हालात से इसका कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। तेल के मामले में अमीर इस देश में खाद्य युद्ध की स्थिति पैदा हो गई। वहां सब कुछ था, पर भोजन के लाले पड़ गए। इसलिए समय आ चुका है कि इस भ्रमित आर्थिकी के फेर में ज्यादा न पड़ें और जीवन से जुड़े उत्पादों के संरक्षण के प्रति गंभीर हो जाएं। चूंकि ये संसाधन गांवों से जुड़े हैं, इसलिए पूरे विश्व को अब ग्राम केंद्रित होना होगा। वरना सारी सुविधाओं के ढेर पर बैठकर हमें रोटी के लिए रोना पड़ेगा। इन्हीं मुददों पर पहली बार अमेरिका में गांवों से संदर्भित सम्मेलन हुआ, जिसमें यह बात उभरकर सामने आई कि अगर नए सिरे से गांवों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो गांवों का तो पता नहीं ही रहेगा, शहरों की पताका भी नहीं लहराएगी।