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फिल्मों में औरतें: आधुनिक हीरोइनों में बहुत कुछ नकली है

Sat, 06 Jun 2015 03:01 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
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फिल्म समाज का दर्पण है या फिल्मों के आधार पर समाज अपने चाल-चलन और सोच बदलता है-यह एक पुरानी और अंतहीन बहस है। हिंदी फिल्मों को बेचने के लिए अब तक उसमें किसी बड़े हीरो का होना आवश्यक था। नरगिस, वहीदा रहमान, नूतन और मीना कुमारी जैसी अभिनेत्रियों की प्रतिभा को छोड़ दें, तो हीरो के किरदार को ही सबसे अधिक समय, अच्छे संवाद और महत्व दिया जाता था। हालांकि महिला कलाकारों को भी एक सीमित दायरे मे अपना जलवा दिखाना पड़ता था- 'अच्छी' भारतीय नारी की घिसी-पिटी परिभाषाओं की सीमाएं।
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हाल में कुछ बदलने लगा है। नए तर्ज की इन फिल्मों की सबसे बेहतर मिसाल शायद तनु वेड्स मनु रिटर्न्स है। इसमें कंगना रनौत एक नहीं, दो नायिकाओं की भूमिका निभाती हैं, और दोनों ही अच्छी-बुरी भारतीय नारी का मिश्रण है। एक कुछ ज्यादा बुरी है, तो दूसरी कुछ अधिक अच्छी। इस फिल्म में बहुत कुछ अब तक की फिल्मी मान्यताओं को तोड़ने वाला मौजूद है। अभी तक अच्छी औरत ही अंत में नायक को पाने में सफल होती थी। और बुरी औरत आंसू भरे नयन से अच्छी औरत को नायक के साथ अनंत खुशियों के दौर में प्रवेश करते हुए देखने को मजबूर होती थी।

इस फॉर्मूले में थोड़ा-सा परिवर्तन तब आया, जब अच्छी औरत 'आधुनिक' बन गई। इसलिए उसमें बुरी लड़की के अंश-मात्र लक्षण दिखने लगे, लेकिन बुनियादी तौर पर वह अच्छी भारतीय-मूल्यों से भरपूर औरत ही थी। तनु वेड्स मनु रिटर्न्स में यह कुछ बदला-सा लगता है। तनु अपने जन्म-जन्म के साथी से चार साल में ही तंग आ जाती है, और वापस कानपुर लौट आती है। वहां लौटकर वह एक लंपट किस्म के किरायेदार के साथ दिन भर उसकी मोटर साइकिल पर ही नहीं घूमती, बल्कि जब लड़के वाले उसकी छोटी बहन को 'देखने' आते हैं, तो वह उनसे मिलने अपने जिस्म पर सिर्फ तौलिया लपेटकर आती है। बहुत ही आधुनिक है वह। बहरहाल, इस तरह की आधुनिकता के तमाम सुबूत देने वाली तनु को एक दिन पता चलता है कि जिस पति से छुटकारा पाने के लिए वह आमादा थी, उसे एक दूसरी आधुनिक लड़की से प्यार हो गया है। इससे उसकी आधुनिकता को काफी धक्का लगता है। वह दारू पीना तो कम नहीं करती, पर पति को फिर से पाने के लिए कई पैंतरे अपनाती है। और पैंतरे भी कौन से? परंपरागत अच्छी भारतीय नारी वाले।
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फिल्म तमाम कोशिशों के बाद भी खरी नहीं उतरती। उसकी आधुनिक नायिकाओं में बहुत कुछ नकली है। किसी औरत के हाथ में लगातार वाइन की ग्लास या दारू की बोतल थमा देने से, उसके मुंह से गालियों की बौछार बरसा देने से, और उसे भड़काऊ कपड़े पहना देने से वह आधुनिक नहीं बन जाती है। कानपुर और भारत के तमाम छोटे-बड़े शहरों मे लाखों लड़कियां आधुनिकता का परिचय बड़ी मेहनत के बाद दे रही हैं। उनका मकसद अच्छे कपड़े पहनना नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होना है।

बहरहाल, यहां एक बात खरी है कि यह हीरोइन अपने कंधों पर फिल्म का पूरा भार उठा सकती है। ऐसी ही कुछ और हीरोइनें अब अपनी ताकत और क्षमता का इस्तेमाल करके यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि 'असली' आधुनिक औरत पर फिल्म बने और पुरुष प्रधानता को 'कबूतर' बना दिया जाए।
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-माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य और पूर्व सांसद
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