लिंगानुपात में आंशिक सुधार हुआ है, तो शिशु मृत्यु दर भी घटकर 24 हो गई है। देश में मातृ मृत्यु दर घटकर 88 तक पहुंच गई है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन राष्ट्रीय औसत के पीछे छिपी क्षेत्रीय विषमताएं चिंता का विषय हैं। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य अब भी इस मामले में अपेक्षित सुधार से दूर हैं। अच्छी बात है कि प्रदेश के प्रशासनिक स्तर पर इसके कारणों को जानने व युद्ध स्तर पर समुचित कार्रवाइयां करने की बात उठ रही है, लेकिन फिलहाल यह एक चुनौती तो है ही।
रिपोर्ट का यह कहना भी गौर करने लायक है कि देश की कुल प्रजनन दर (प्रति महिला औसतन बच्चों की संख्या) 2.1 से घटकर 1.9 हो गई है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों को छोड़कर शेष सभी राज्यों में यह दर जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए आवश्यक रिप्लेसमेंट लेवल (2.1) से नीचे गिर गई है। राजधानी दिल्ली में तो यह सबसे कम है। समस्या यह है कि जब प्रजनन दर लगातार लंबे वक्त तक इस स्तर से नीचे बनी रहती है, तब जनसंख्या वृद्धि की गति धीमी और आखिरकार नकारात्मक हो सकती है।
रिपोर्ट कहती है कि जिन राज्यों में प्रजनन दर एक दशक से भी पहले रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे गिर गई थी, वहां की कुल जनसंख्या में 0-14 वर्ष आयुवर्ग का अनुपात सबसे कम है। जाहिर है कि प्रजनन दर में गिरावट और जनसंख्या वृद्धि की गति धीमी होने के साथ देश तेजी से एक नए जनसांख्यिकी दौर में प्रवेश कर रहा है। गौरतलब है कि देश की 24 फीसदी आबादी 0-14 वर्ष आयुवर्ग की, तो करीब 66 फीसदी 15-60 वर्ष आयुवर्ग की है।
आंकड़े बताते हैं कि कम प्रजनन दर वाले राज्यों में कामकाजी उम्र वाली आबादी (15-59 वर्ष) अधिक है, जिससे यह संकेत मिलता है कि भारत के लिए जनसांख्यिकीय लाभ की गुंजाइश अभी खत्म नहीं हुई है। लेकिन इसकी सीमाएं भी हैं, क्योंकि कम उम्र की आबादी का हिस्सा घटने और कार्यशील आयुवर्ग की आबादी बढ़ने से वृद्ध आबादी की संरचना बदलती है। यह बदलाव आने वाले वर्षों में सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य ढांचे और रोजगार नीति पर अतिरिक्त दबाव भी डाल सकता है। विकास की कहानी केवल जीडीपी में बढ़ोतरी तक सीमित नहीं रह सकती। यह तभी पूरी होगी, जब आबादी की संरचना में आ रहे ये बदलाव नीति निर्माण के लिए मार्गदर्शन के बिंदु बनें।