आजकल स्कूलों में एडमिशन का दौर चल रहा है। एक दिन अपने बच्चे की उंगली पकड़े एक लड़की ने शिकायत करते हुए कहा-आंटी, यह क्या बात हुई। मैं और मेरी एक सहेली, एक ही दफ्तर में काम करते हैं। हमारे बच्चे भी लगभग बराबर के हैं। उसकी इकलौती बेटी है, इसलिए उसका एडमिशन हो गया। लेकिन मेरे इकलौते बेटे का एडमिशन नहीं हो सका। यह तो दूसरे किस्म का भेदभाव है। मेरा लड़का हो गया, तो उसे कहीं प्रेफरेंस नहीं मिलेगा। जो गरीब हैं, वहां लड़कियों को प्राथमिकता मिलना ठीक है, मगर जो लोग बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करते हैं, उन पर यह शर्त लागू करना ठीक नहीं है।
आजकल ऐसी बहुत-सी आवाजें सुनाई देती हैं, जहां स्कूलों और समाज के अनेक क्रियाकलापों में सिर्फ लड़कियों को आगे बढ़ाने की बातें की जाती हैं। हाल ही में कुछ बड़ी कंपनियों, जैसे कि एरिक्सन और एमटीएस ने भी ऐसे विचार प्रकट किए हैं। उनका कहना है कि औरतों को आगे बढ़ाना तो ठीक, मगर इस कारण यदि पुरुष पिछड़ जाएं, सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों में उनकी पूछ ही न हो, तो यह किसी भी दफ्तर, समाज या देश के लिए ठीक नहीं है। दफ्तरों में बड़ी संख्या में पुरुष काम करते हैं। उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। इसीलिए न केवल इन कंपनियों ने, बल्कि कई और कंपनियों ने पुरुष दिवस मनाने का फैसला किया था। बताते चलें कि अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस उन्नीस नवंबर को पड़ता है। कंपनियों ने अपनी महिला कर्मचारियों से कहा कि वे इस दिन अपने पुरुष सहयोगियों को कार्ड देकर शुभकामनाएं दें।
हालांकि कंपनियां यह मानती हैं कि वरिष्ठ पदों पर महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के मुकाबले कम है, इसलिए वे महिलाओं के उत्थान के लिए तरह-तरह की योजनाएं चलाती हैं। मगर अब यह सोच भी बढ़ चला है कि महिलाओं की भागीदारी बढ़े, लेकिन इसके लिए अपने पुरुष कर्मचारियों की उपेक्षा करना भी ठीक नहीं है। वे पुरुषों के दिखाए- बताए जाते स्टीरियो टाइप्स को भी तोड़ना चाहती हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जिस तरह से विविध कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, कंपनियां चाहती हैं, पुरुष दिवस पर भी ऐसे ही कार्यक्रम हों। चूंकि आज के पुरुष पहले जैसे नहीं रहे, उनकी सोच अपने पिताओं की पीढ़ी से अलग है। इसलिए अगर औरतों की दुनिया को बदलना है, तो उसमें पुरुषों की भागीदारी भी होनी चाहिए। यदि पुरुषों को अलग कर दिया जाए, तो बदलाव की सारी जिम्मेदारी सिर्फ औरतों के ही कंधों पर आन पड़ेगी, जो ठीक नहीं है। बदलाव पूरे समाज के जरिए ही किया जा सकता है।
कंपनियों की ऐसी सोच वास्तविक है, क्योंकि देखा गया है कि इन दिनों अक्सर समाजशास्त्रियों से लेकर राजनेता तक सिर्फ महिलाओं की बातें करते हैं। उन्हें लगता है कि बड़ी संख्या में औरतें पढ़-लिख गई हैं, आत्मनिर्भर हैं और वे वोटर भी हैं। लेकिन जो लोग पुरुषों को हाशिये पर डालते हैं, वे भूल जाते हैं कि देश में औरतों के साथ-साथ पुरुष भी रहते हैं। वे भी देश की आधी आबादी हैं, वे भी वोटर हैं। इसलिए उनकी अनदेखी करके कोई देश या समाज आगे नहीं बढ़ सकता। चाहे औरतों के प्रति बढ़ते अपराधों की जितनी बातें की जाएं, लेकिन सभी पुरुष अपराधी नहीं होते। न ही वे औरतों को देखते ही उन्हें मारने-पीटने, काटने, पछाड़ने को दौड़ पड़ते हैं। इसलिए कंपनियों की यह सोच बिल्कुल सही है कि हाल के समय में समाज में पुरुषों की जो नकारात्मक छवि बना दी गई है, उसे बदला जाना चाहिए।