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व्यवस्था बदलो, सिर्फ संस्था नहीं

Fri, 22 Aug 2014 07:47 PM IST
शंकर अय्यर
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भारत का राजनीतिक अर्थशास्त्र ऐसे विरोधाभाषों से अटा पड़ा है, जो हमें यह सोचने के लिए बाध्य करते हैं कि आखिर क्यों नाकामयाब संस्थान अपनी अवसान तारीख तक घिसटते चले जाते हैं। योजना आयोग ऐसे ही विरोधाभाषों का ताजा उदाहरण है। पहली पंचवर्षीय योजना का मुख्य जोर गरीबी उन्मूलन, कृषि विकास, स्वच्छता, पीने के साफ पानी की उपलब्धता, ग्रामीण विद्युतीकरण, सड़कों और रोजगार निर्माण पर था। और बारहवीं पंचवर्षीय योजना भी इन्हीं मुद्दों के बीच झूल रही है। स्वतंत्रता मिले हुए छह दशक बीत जाने के बावजूद देश की आबादी का 30 फीसदी गरीबी रेखा से नीचे रहने को मजबूर है, 40 फीसदी लोगों के पास स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, एक-तिहाई ग्रामीण परिवारों में केरोसिन ही रोशनी का जरिया है, हर दस घरों में से छह में चूल्हे पर खाना पकता है, और बेरोजगारी एक महामारी की तरह फैली हुई है।
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गौरतलब है कि पहली पंचवर्षीय योजना में यह माना गया था कि विकास महज एक भौतिक अवधारणा नहीं है, बल्कि इसका संबंध पूर्ण रोजगार और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन जैसे व्यापक लक्ष्यों से है। वहीं बारहवीं पंचवर्षीय योजना का शीर्षक है, 'तीव्र, अधिक समावेशी और सतत विकास।' इससे ऐसा लगता है कि आबादी के बड़े हिस्से के लिए मानो वक्त ठहर सा गया हो। बारहवीं पंचवर्षीय योजना की डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा लिखी गई प्रस्तावना इसकी वजह स्पष्ट करती है। इसमें कहा गया है, 'अतीत में बनाई गईं हमारी योजनाओं के साथ दिक्कत यह है कि इनमें आकर्षक भविष्य का खाका तो खींचा गया, मगर न तो इसकी प्राप्ति के रास्तों पर पर्याप्त ध्यान दिया गया, और न ही नाकामयाब होने पर नतीजों के बारे में कुछ कहा गया।' इस नाकामयाबी की भविष्यवाणी सबसे पहले सी राजगोपालाचारी और तमाम अर्थशास्त्रियों ने 1956 में ही कर दी थी। इसके अलावा 1963 में भारत की यात्रा करने वाले अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन और बाद में जी डी बिड़ला और जे आर डी टाटा जैसे उद्योगपतियों के भी कुछ ऐसे ही विचार रहे थे। इतना ही नहीं, दक्षिण कोरिया, ताईवान, सिंगापुर और मलयेशिया जैसे एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था के विकास ने नियोजन के विचार की विफलता को ही जाहिर किया।

इसके लिए प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर दोष मढ़ना सबसे आसान होगा। यह सच है कि समाजवाद से उन्हें अगाध प्रेम था। यह भी सच है कि सोवियत संघ ने केंद्रीय नियोजित देश के रूप में उच्च औद्योगिक और विकसित जर्मनी को परास्त कर दिया था। योजना आयोग का गठन करते हुए नेहरू उसकी सफलता को लेकर अभिभूत थे। नेहरू के उत्तराधिकारियों की नाकामी यह है कि उन्होंने उसे समाप्त नहीं किया।
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आखिरकार मोदी सरकार ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर योजना आयोग को दया मृत्यु देने की घोषणा की। यह एक अच्छी खबर है। मगर डर यह है कि इसकी जगह जो ढांचा सरकार स्थापित करने जा रही है, उसका हश्र भी ऐसा ही न हो। इसमें संदेह नहीं कि भारत को ऐसे मंच की जरूरत है, जहां देश के सबसे मेधावी मस्तिष्क और विचारों को जगह मिल सके। एक ऐसा निकाय, जो योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़े दुरूह मसलों के नए समाधान ढूंढ सके। भारत के विकास की कहानी को विचारों के मंथन की दरकार है। एक ऐसी पटकथा की जरूरत है, जो बुनियादी ढांचे से जुड़ी योजनाओं को कामयाब बना सके। एक ऐसे आईने की जरूरत है, जिसमें सरकार सर्वाधिक वंचितों को शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराते वक्त अपना चेहरा देख सके। दरअसल भारत को एक ऐसे भरोसेमंद संस्थान की सख्त आवश्यकता है, जो बता सके कि देश के लोग, राज्य और सरकारें सामाजिक व आर्थिक सवालों के समाधान में कैसी भूमिका निभा रहे हैं।

कहते हैं कि कामयाबी से बड़ा कोई प्रमाण नहीं होता। गुजरात सरकार की एक पायलट परियोजना के तहत सैटेलाइट चित्रों और एसएमएस सेवा के जरिये मछुआरों को यह जानकारी दी जाती है कि मछलियों की बहुतायत किस जगह पर है। साफ है कि बेहतर तकनीक के उपयोग से आय बढ़ाने में मदद मिलती है। दूसरी ओर तमिलनाडु ने ऐसी नीतियों को तरजीह दी है, जिससे श्रम बल में महिलाओं की तादाद बढ़ाई जा सके। क्या दूसरे राज्य इससे सीख नहीं ले सकते? कुपोषण से निपटने के लिए उत्तर पूर्व के राज्य कौन-सी रणनीति अपना रहे हैं? अपनी साक्षरता दर बढ़ाने के लिए हिमाचल प्रदेश क्या कर रहा है ? क्या उत्तर प्रदेश बागबानी की कला महाराष्ट्र से सीख सकता है? यही नहीं, कौशल विकास के मद्देनजर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काफी कुछ सीखने को है। दरअसल भारत को विचारों की जरूरत है, मगर उससे भी ज्यादा जरूरत विकास के नए मॉडल की है। प्रधानमंत्री मोदी 21वीं सदी के भारत के लिए लोगों से सुझाव मांग रहे हैं। मगर उन्हें समझना होगा कि सहभागी शासन एक अच्छा विचार है, मगर इसकी कुछ सीमाएं हैं। जैसा कि मारग्रेट थेचर ने कहा था, 'हमेशा सर्वसम्मति से चलना ही नेतृत्व नहीं होता। नेतृत्व को सबसे आगे होना चाहिए।'

भारत को महज एक संस्थान नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था बदलने की जरूरत है। योजना आयोग पूरे केंद्रीय नियंत्रण के मॉडल की विफलता का सुबूत है। सरकार का अपने लोगों का भाग्य निर्माता होना, राजशाही में तो मुमकिन है, मगर 21वीं सदी के लोकतंत्र में यह विचार बेमानी लगता है। दरअसल विकास की वर्तमान प्रक्रिया पूरी तरह बेतुकी है। केंद्र संसाधनों का आवंटन करता है, योजना आयोग खर्चों पर निगाह रखता है, और राज्यों पर क्रियान्वयन की जिम्मेदारी होती है। यहां सारी शक्तियां केंद्र के पास हैं, मगर उसकी कोई जवाबदेही नहीं है।

मोदी सरकार संघवाद को मजबूत करने के वायदे के साथ सत्ता में आई है। इसका मतलब है, संसद से जिला परिषद और नगर निकायों के साथ ही सरकार के हर स्तर को सशक्त बनाना, ताकि वह अपने लोगों के हित में सही फैसला कर सकें। फिर वक्त का भी तकाजा है कि व्यवस्था बदली जाए, सिर्फ संस्था नहीं। और यही मोदी सरकार का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।
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(एक्सीडेंटल इंडियाः ए हिस्ट्री ऑफ द नेशन्स पैसेज थ्रू क्राइसिस ऐंड चेंज के लेखक)
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