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मिट्टी से जुड़कर बदली तस्वीर

तरुण विजय Updated Tue, 11 Sep 2018 07:03 PM IST
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तरुण विजय

विपक्ष की तोड़फोड़ सड़क से शब्दों तक जारी है। क्या भारत विकास पर राजनीतिक विनाश की कालिमा को छाने देगा और उन लोगों की बात को महत्व देगा, जिन्हें न धर्म की भाषा का ज्ञान है, न उन्हें समाज के विकास का व्याकरण पता है?



उदाहरण के लिए, क्या कभी किसी ने देश के सत्तर प्रतिशत किसानों की आय को दोगुना करने की हिम्मत दिखाई थी? देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 17.6 प्रतिशत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि यह 25 प्रतिशत तक जाना चाहिए और जिस क्षेत्र को अभी संकटग्रस्त कहा जात था, उसमें दो बड़े परिवर्तन कर उसे संकट के स्तर से बाहर निकाला गया है। पहली बार 14 खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया गया, जो पहले की तुलना में 52.5 फीसदी अधिक है।

 

बिचौलियों को हटाने के लिए किसानों की उपज सीधे खरीदने के लिए 585 मंडिया ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार में जोड़ी गईं और अगले वर्ष इसमें 425 मंडियां और जोड़ी जाएंगी और एक ऐसा असाधारण कदम उठाया, जैसे एक देश में एक कर, तो एक देश में एक कृषि बाजार। यानी अब किसान पूरे देश में जहां उन्हें सर्वोत्तम मूल्य मिले, वहां वे बेरोकटोक अपना उत्पाद बेच सकते हैं।

 

किसानों को जो मिट्टी परीक्षण कार्ड मिले, वह दिलचस्प और बड़ी बात है। जिस किसान के शरीर की मेडिकल जांच के लिए दस तरह के परीक्षण जरूरी होते हैं, उसी किसान की धरती माता के स्वास्थ्य के परीक्षण के लिए क्या किसी ने अभियान छेड़ा था? 15 करोड़ किसानों को अगर खेत की मिट्टी की सेहत के कार्ड मिले, जो घोषित लक्ष्य से एक करोड़ ज्यादा है, तो इससे खेती खराब होगी या बढ़ेगी? गुस्सा तब आता है, जब देश की खेती, मिट्टी और आबोहवा को बदलने के अभियान बंद, तोड़फोड़ और राजनीतिक प्रपंचों में धुंधला दिए जाते हैं।

 

फसल बीमा ने विश्व रिकॉर्ड बनाया है। सिर्फ मध्य प्रदेश में किसानों ने यदि पांच सौ करोड़ रुपये फसल बीमा के प्रीमियम में दिए, तो क्षतिपूर्ति में तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक बीमा राशि मिली। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने सही कहा कि पहले फसल की क्षतिपूर्ति का न्यूनतम बीमा मानक तहसील को माना जाता था और अगर ब्लॉक में सभी गांवों में फसल बर्बाद नहीं हुई, तो किसी को क्षतिपूर्ति नहीं मिलती थी। पहली बार मोदी ने क्षतिपूर्ति का मानक तहसील और ब्लॉक से भी घटाकर गांव किया और सैकड़ों-हजारों किसानों को बर्बादी तथा आत्महत्या के मार्ग पर जाने से रोका। ऐसे हजारों उदाहरण हैं, जिनमें किसानों को न केवल फसल बीमा की राशि तुरंत और समय पर मिली, बल्कि उनकी और उनके परिवार की प्राण रक्षा भी की।

 

शायद पहली बार ऐसा हुआ कि किसी भी दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक का पहला पूरा दिन किसानों पर केंद्रित रहा। भाजपा की दो दिवसीय कार्यकारिणी का यह महत्वपूर्ण घटनाक्रम था। दुर्भाग्य से आज भी स्थिति यह है कि किसान का पढ़ा-लिखा बेटा वापस किसान नहीं बनना चाहता है। जब मैं पिछले दिनों विदर्भ की यात्रा पर गया, तो वहां सर्वश्रेष्ठ किसान का खिताब पाए किसान सुभाष भाई ने बताया कि आज भी लोग शहर में कम आय और दस बाई दस फीट के कमरे में रहने वाले लड़के से अपनी बेटी ब्याहना ज्यादा पसंद करते हैं, लेकिन पचास बीघा जमीन के मालिक और शानदार साफ हवा, साफ भोजन और सुखी जिंदगी वाले किसान के बेटे से नहीं, क्योंकि किसान कितना भी बड़ा हो जाए, वह पिछड़ा माना जाता है। मोदी के खेती की इज्जत और आय बढ़ाने वाले कदम वैवाहिक विज्ञापनों के इस दस्तूर को अगर बदल दें, तो आश्चर्य नहीं। 

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