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अपने शहरों की दशा कब सुधरेगी

Mon, 21 Jan 2013 08:43 AM IST
तवलीन सिंह
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यह लेख आपके पास आ रहा है स्विट्जरलैंड के एक सुंदर शहर से, जो इस मौसम में इतना सुंदर दिखता है कि मुझे ऐसा लगने लगा है कि मैं किसी चित्रकार की तस्वीर के अंदर पहुंच गई हूं। कल रात से बर्फ गिरनी शुरू हुई, सो सुबह उठी तो देखा कि सामने वाले बाग में एक चमकती सफेद चादर बिछ गई है। पेड़-पौधों पर रुक गई है बर्फ सफेद शक्कर की तरह और सड़कों के किनारे पर ढेर बन गए हैं लंबे, मोती से।
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नजारा इतना सुंदर है कि मुझे ऐसा महसूस हो रहा है, जैसे पहली बार मैंने कोई खूबसूरत शहर देखा हो किसी विकसित, पश्चिमी देश में। पहली बार तो बिल्कुल नहीं है, लेकिन हर बार की तरह जब भी ऐसे शहरों में आती हूं, तो याद आते हैं मुझे अपने भारत महान के गंदे, बेहाल शहर और यह भी याद आता है कि कभी भारत के शहरों को देखकर बाहर से आने वाले यात्री उनकी सुंदरता देखकर बिल्कुल ऐसे चौंक जाते थे, जैसे मैं स्विट्जरलैंड के शहरों को देखकर हर बार चौंक जाती हूं।

मोहनजोदड़ो, हड़प्पा के बारे में तो बहुत पढ़ा है इतिहास की किताबों में, लेकिन उनके खंडहर बन जाने के सदियों बाद भी चीनी यात्रियों ने लिखा है पाटलिपुत्र की शान के बारे में। लिखते हैं ह्वेन सांग, जो सातवीं शताब्दी में भारत आए थे, कि शहर की इमारतें इतनी शानदार थीं कि ऐसा लगा उन्हें कि उनका निर्माण देवलोक से आकर देवताओं ने किया हो।
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रही बात वर्तमान भारत की, तो अपनी आंखों से मैंने देखे हैं जैसलमेर के पास पालीवालों के उस गांव में, जो इतने संयोजित तरीके से बनाए गए हैं कि उनको देखकर आश्चर्य होता है, और जो सिर्फ कोई तीन सौ वर्ष पुराने हैं। भारत के शहर इतने बेहाल नहीं थे पचास साल पहले, जितने अब हो गए हैं, और जब भी इस बात का जिक्र मैंने किया है अपने आला अधिकारियों से, उनसे अक्सर ही एक जवाब मिला है, अरे, क्या कर सकते हैं हम जब मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में लाखों की तादाद में देहातों से लोग आते हैं बसने के लिए हर साल? लोकतंत्र है हमारे देश में, इसलिए चीन की तरह हम उनको शहरों में आने से रोक तो नहीं सकते हैं।

बिल्कुल ऐसे जवाब यही अधिकारी देते हैं हमारे राजनेताओं को, और वहीं पर बात खत्म हो जाती है, लेकिन असलियत यह है कि हम बहुत कुछ कर सकते हैं अपने शहरों को सुधारने के लिए। हमारे शहर बेहाल इसलिए नहीं हुए हैं कि देहातों से ज्यादा लोग आए हैं, क्योंकि बिल्कुल इसी तरह बसे हैं अन्य देशों के शहर।

हमारी समस्या प्रशासनिक है, जिसकी हम कभी बात करने को तैयार नहीं होते हैं, क्योंकि हमारे राजनेताओं के पास कभी फुर्सत ही नहीं होती है देश की गंभीर समस्याओं के बारे में बात करने के लिए। संसद अगर सही तरीके से चलने देते, तो शायद बहुत पहले ही वह कानूनी परिवर्तन आ गया होता, जिसके बिना हमारे शहरों को बचाना मुश्किल नहीं, नामुमकिन हो जाएगा बहुत जल्दी।

दिल्ली में बलात्कार की घटना के बाद शीला दीक्षित ने पुलिस को अपने तहत लाने की मांग की जरूर थी, लेकिन थोड़ा सोचकर बात की होती दिल्ली की मुख्यमंत्री ने, तो आगे यह भी कहतीं कि समय आ गया है महानगरों के तमाम प्रशासन को शक्तिशाली महापौर के नीचे लाने का।

शीला जी क्योंकि एक शहर की मुख्यमंत्री हैं, बड़े राज्य की नहीं, तो दिल्ली का हाल अन्य महानगरों से थोड़ा बेहतर है। मुंबई की आधी आबादी गंदी, कच्ची बस्तियों में रहने के लिए मजबूर है, जहां बुनियादी शहरी सुविधाओं का इतना सख्त अभाव है कि ये बस्तियां गंदगी और महामारियों का केंद्र बन गई हैं। लेकिन कहां फुर्सत है महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को इन चीजों पर ध्यान देने की?

भारत के शहरों की जिम्मेदारी जब तक शहर के लोगों के चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों में नहीं आती है, तब तक शहरी सुधारों की कोई संभावना नहीं है। खैर, जहां मैं हूं आज वहां मौसम इतना सुंदर है, शहर इतना सुंदर है कि क्या फायदा वतन की यादों को ताजा करके दिल को उदास करने का। आखिर में इतना ही कहूंगी कि हर बार जब आती हूं ऐसे किसी विदेशी शहर में, तो सपने देखती हूं उस दिन के, जब भारत के सारे शहर इतने ही सुंदर दिखेंगे।
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