पश्चिम बंगाल के 17 में से 13 जिलों की पंचायतों पर जीत दर्ज कर तृणमूल कांग्रेस ने अपना वर्चस्व कायम रखा है। कुल 8,864 ग्राम पंचायतों की 58,865 पंचायत सीटों में से अधिकांश पर उसने कब्जा किया है। अहम यह भी है कि इस बार राज्य के पंचायत क्षेत्र में रहने वाले 4.4 करोड़ मतदाताओं में से 84.56 फीसदी ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया, जो रिकॉर्ड है। हिंसा और सांविधानिक अड़चनों के बीच संपन्न यह चुनाव दरअसल वामपंथी यूटोपियाई आदर्शों और तृणमूल से जुड़ी संवेदी भावनाओं के बीच का चुनाव था।
एक तरह से यह चुनाव किसी वर्ग संघर्ष के बगैर विभिन्न वर्गों की एकता के एक नवीन समीकरण का नतीजा कहा जा सकता है। चुनाव के नतीजे बताते हैं कि विपक्षी दलों में चुनावी संघर्ष का माद्दा खत्म हो चुका है। वर्तमान शासन से कथित मोहभंग के नारों को हकीकत में बदलने का हुनर उनमें नहीं दिखा। असल में, मोहभंग एक शहरी फिनोमिना है और यही कारण है कि यह कोलकाता महानगर और उसके आसपास के क्षेत्रों में दिखता है। विपक्ष, खासतौर पर वाम मोर्चा, नई सहस्राब्दी के दूसरे दशक में सत्ता और समाज के मध्य तैयार हुए नए समीकरणों के अंतर्विरोधों को मिटाने में शुरू से ही नाकामयाब रहा और उस विफलता को वह तरह-तरह के नारों से छिपाने की कोशिश करता रहा है। मसलन, मोटर साइकिल वाहिनी। दरअसल जिस मोटर साइकिल वाहिनी का आज वामपंथी रोना रो रहे हैं, ऐसे ही दल कभी उसके आतंक का पर्याय थे। तृणमूल ने इसमें कुछ ज्यादा ही क्रूरता और निर्भयता भर दी, नतीजतन कई जगह वामपंथी उम्मीदवार चुनाव के पर्चे ही नहीं भर सके।
आम चुनाव के दस महीने पहले हुए बंगाल के पंचायत चुनाव के नतीजे में राष्ट्रीय राजनीति के कूट संकेत भी छिपे हैं। इस चुनाव में तृणमूल को अधिकांश सीटें मिलने का साफ अर्थ है कि 'पोरिबर्तन' को प्रतिगामी बनाने के वामपंथी इरादे और साजिशें कामयाब नहीं हो सकीं। पहले कहा जा रहा था कि शहरी बंगाल और उसका भद्रलोक ही बंगाल के मानस को रूपायित नहीं करता, बल्कि 'ग्राम बंग्ला' भी बंगाल की सोच का प्रतिनिधित्व करता है। अब तक यह कहा जा रहा था कि शहरी इलाकों में परिवर्तन की लहर लाकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बंगाल पर शासन कर रही हैं, पर इस चुनाव ने बता दिया कि ग्रामीण स्तर तक उन्होंने पकड़ बना ली है और वामपंथी संगठनों को निस्तेज कर दिया है। वैसे यह भी कहा जा सकता है कि वर्तमान नतीजे बताते हैं कि बंगाल में अब कोई विपक्ष नहीं रहा। चाहे वामपंथी हों या कांग्रेसी, दोनों को इससे सीख लेनी चाहिए, क्योंकि लोकसभा चुनाव सिर पर हैं।
जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है, उसके लिए तो स्पष्ट संदेश है कि बंगाल में उसे सियासी बैसाखियों का ही सहारा लेना होगा। यह एक ऐसी हकीकत है, जो लोकसभा चुनाव में बंगाल में कांग्रेस के अभियानों के आड़े आएगी, क्योंकि ममता बनर्जी ने कांग्रेस की मुख्यधारा की पैदाइश होने के बावजूद एक नए तरह की राजनीतिक संस्कृति का सूत्रपात किया है। वह है, सब कुछ पर अपना नियंत्रण। इस चुनाव के परिणाम ने उस नियंत्रण को और कठोर बना दिया। विगत कुछ महीनों से तृणमूल कांग्रेस में विभाजन की फुसफुसाहट चल रही थी, इस परिणाम ने ऐसी संभावनाओं को समाप्त कर दिया।
वामपंथी दलों ने 14 फीसदी सीटों पर तृणमूल के निर्विरोध जीतने पर सवाल उठाया है और कह रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र को खतरा है। किंतु अगर इतिहास देखें, तो महसूस होगा कि लोकतंत्र के लिए खतरे की ये जड़ें बहुत पुरानी और गहरी हैं। क्या माकपा सीना ठोककर कह सकती है कि उसके शासन काल में लोकतंत्र महफूज था? अगर था, तो 2003 में 7,000 सीटें उसने निर्विरोध कैसे जीत ली थीं? यही नहीं, 1980 में जब स्थानीय निकायों द्वारा योजना तथा शासन के विकेंद्रीकरण करने का नियम बना, तो वामपंथियों ने क्यों संपूर्ण व्यवस्था को उलट दिया और पंचायतों को लालफीताशाही के कब्जे में दे दिया। जमीनी स्तर पर लोगों को राजनीतिक सत्ता में भागीदारी दिए जाने की व्यवस्था के लिए आरंभ किए गए पंचायत आंदोलन की आड़ में वामपंथी शासन में ग्रामीण राजनीतिक अधिनायकवाद या कहें 'पोलिटिकल एबसोल्युटिज्म' को बढ़ावा मिला। सिंगुर (2006), नंदीग्राम (2007) और लालगढ़ (2008) की घटनाओं में इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं। दरअसल 2008 में पहली बार माकपा को आघात लगा, जब उसके लगभग 90 प्रतिशत मतों का हिस्सा 52 प्रतिशत हो गया।
हालांकि हालात अब भी बहुत नहीं बदले हैं। जो क्षेत्रीय वर्चस्व का मसला वामपंथ के जमाने में था, वह आज तृणमूल-काल में भी है, बल्कि कुछ ज्यादा ही है। केवल झंडे बदले हैं, डंडे नहीं। इससे भी खतरनाक हालत यह है कि यह पूरा सियासी खेल वामपंथियों की तरह केवल चरम वर्चस्व हासिल करने का नहीं है, बल्कि इससे एक कदम आगे विपक्ष को समाप्त कर देने का है, तथा उससे भी खराब संकेत हैं कि इसके नेता गरीबों अथवा मजदूर वर्ग के खिलाफ संघर्ष को बढ़ावा दे रहे हैं। वे सभाओं में यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि भूमि सुधार आंदोलन एकदम गलत था और इसे सुधारने के लिए जरूरी है कि जमीनें पूर्व मालिकों (जमींदारों) को लौटाई जाएं।
वामपंथियों का चरम वर्चस्व हासिल करने का प्रयास दूसरी तरह का था। वे सामाजिक अंतर्विरोधों की गलतफहमियों का लाभ उठा रहे थे। वे अमीरों के प्रति गरीबों-मजदूरों के गुस्से का उपयोग कर उन्हें सशक्त बनाने के उपक्रम के बदले वर्ग विरोधियों से साजिश कर सत्ता में काबिज थे। दूसरी तरफ, तृणमूल की सियासत गरीबों के प्रति अमीरों की नफरत को और ज्यादा गंभीर बनाने का प्रयास है। कहते हैं न, इतिहास खुद को दोहराता है, कई बार विद्रूप के रूप में।