छब्बीस जनवरी भारत की महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन है। पुरुषों से ज्यादा, महिलाओं के लिए यह दिन महत्वपूर्ण है। कुछ दशक पहले, इसी दिन, डॉ आंबेडकर द्वारा रचित संविधान के आधार पर भारत के गणराज्य होने की घोषणा की गई थी। एक ऐसा गणराज्य, जिसमें देश के इतिहास में पहली बार तमाम नागरिकों को समानता का दर्जा दिया गया था। महिलाओं को भी। लेकिन संविधान द्वारा दी गई समानता अभी तक महिलाओं के जीवन की वास्तविकता नहीं बन पाई है। आज भी हमारे देश में महिलाएं ज्यादा भूखी रहती हैं, कम काम पाती हैं और काम के बदले मजदूरी भी कम पाती हैं।
गरीब से गरीब महिला से लेकर सबसे अधिक पढ़ी-लिखी महिला तक जानती है कि काम करने का अधिकार और काम करने का मौका उसके लिए कितना आवश्यक है। लेकिन महिलाओं के लिए नौकरी पाने में तमाम बाधाएं हैं, जो पुरुष प्रधानता की गहरी सोच का फल है। इसका बहुत ही चौंकाने वाला उदाहरण कुछ हफ्ते पहले जनरल रावत के साक्षात्कार के जरिये मिला। कमाल की बात है कि इतने महत्वपूर्ण सांविधानिक पद पर विराजमान जनरल साहब ने महिला सैनिकों के बारे में इस तरह की टिप्पणियां कीं, जो संविधान की धज्जियां उड़ाती हैं और महिलाओं की केवल फौज में ही नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में प्रवेश को और भी कठिन बना देती हैं।
जनरल रावत से पूछा गया था कि क्या महिलाओं को फौज में सिर्फ भर्ती ही नहीं किया जाएगा, बल्कि उन्हें मोर्चे पर लड़ने के लिए भी भेजा जाएगा। उन्होंने बड़ा ही अजीब-सा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अभी इसके लिए सही समय नहीं आया है। इसके आगे उन्होंने कहा कि शहरों की बात अलग है, सेना में बहुत से सैनिक ग्रामीण परिवेश के हैं और वह महिलाओं के बारे में अलग तरह से सोचते हैं। वह किसी महिला को अपनी अफसर के रूप में स्वीकार करने में दिक्कत महसूस करेंगे। उन्होंने आगे कहा कि अगर फौज में भर्ती महिलाएं गर्भवती हो गईं, तो उन्हें लंबी छुट्टी भी देनी पड़ेगी, जिससे बहुत दिक्कत पैदा होगी।
सामाजिक परिवर्तन के लिए हिम्मत और इच्छाशक्ति जुटाने की आवश्यकता होती है और अगर ऊंचे पदों पर विराजमान लोग ऐसा नहीं करते हैं, तो वे महिलाओं के साथ ही नहीं, उस संविधान के साथ भी ना-इंसाफी करते हैं, जिस पर हाथ रखकर वह पद पर पहुंचने की शपथ लेते हैं। 26 जनवरी से तीन दिन पहले, 23 जनवरी को सुभाष चन्द्र बोस का जन्मदिन पड़ता है। वह संविधान के बनने से कई साल पहले ही दुनिया से चले गए थे, लेकिन संविधान की रूह, समानता, को वह पूरी तरह स्वीकार करते थे। इसीलिए उन्होंने अपनी आजाद हिंद फौज में महिलाओं की टुकड़ी का निर्माण भी किया था। उसमे भर्ती होने वाली महिलाएं, मलाया, बर्मा और सिंगापुर की मामूली घरों की, मजदूर परिवार की, छोटे कर्मचारियों और दुकानदारों के परिवारों की महिलाएं थी। जिन्होंने कभी भारत को देखा भी नहीं था, लेकिन अपने भारतीय-मूल पर गर्व करती थीं। उनकी उम्र 18 से 25 साल के बीच की थी। उनको वही प्रशिक्षण मिलता था, जो पुरुषों को मिलता था। जब वह मोर्चे पर गईं, तो उन्हें भी पीठ पर भारी पैक और रायफल लेकर चलना पड़ता था। जंगलों और पहाड़ियों में उन्हें रहना पड़ता था। बिना भोजन और पानी के उन्हें कई-कई दिन गुजरने पड़ते थे। उन्होंने कभी शिकायत नहीं की और उनके साथ उनके पुरुष साथियों ने कभी किसी प्रकार की बदसलूकी भी नहीं की। अबकी साल, 26 जनवरी की परेड में लड़ने वाली महिलाओं का मार्च नहीं हो पाएगा। आज से 80 साल पहले उन्हें ऐसा करने का मौका मिला था। शायद जल्द फिर मिलेगा।
लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।