चंद्रयान-3 भारत का तीसरा चंद्र अभियान है। यह भारतीय वैज्ञानिकों की बीस वर्षों की अनथक तपस्या का फल है, जिसकी कल्पना 15 अगस्त, 2003 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी। प्रसिद्ध वैज्ञानिक मयिलसामी अन्नादुरई के नेतृत्व में 22 अक्तूबर, 2008 को इसरो के विश्वसनीय पीएसएलवी-सी 11 रॉकेट के जरिये चंद्रयान-1 का प्रक्षेपण किया गया था। वह एक आर्बिटर था, जो चांद के रासायनिक, खनिज विज्ञान एवं फोटो-भूगर्भिक मानचित्रण के लिए चंद्रमा की सतह से सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर चंद्रमा के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था। इसने चंद्रमा के चारों ओर 3,400 से अधिक चक्कर लगाए, जो अपेक्षा से अधिक थे। 29 अगस्त, 2009 को अंतरिक्ष यान से उसका संपर्क टूट गया और अंततः वह मिशन समाप्त हो गया।
उसके बाद, इसरो ने एक जटिल मिशन के रूप में चंद्रयान-2 की तैयारी शुरू की। चंद्रयान-2 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के अन्वेषण के लिए एक आर्बिटर, विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर लेकर गया था। लेकिन चंद्रयान-2 चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने के अंतिम क्षण में विफल हो गया, जब वैज्ञानिकों का विक्रम से संपर्क टूट गया।
हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने पिछली विफलताओं से सबक लेकर चंद्रयान-3 को उन्नत तकनीक से लैस किया, ताकि विक्रम लैंडर को सुरक्षित चांद की सतह पर उतरने में मदद मिल सके। इसे अधिक ईंधन और मजबूत सुरक्षा उपायों से लैस किया गया। चंद्रयान-2 की विफलता का मुख्य कारण एल्गोरिदम विफलता के कारण सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की विसंगति था। चंद्रयान-3 को इस तरह से डिजाइन किया गया कि किसी तरह की गड़बड़ी हो, तो भी इसे सफलतापूर्वक चांद की सतह पर उतारा जा सके। इसमें सेंसर विफलता, इंजन विफलता, एल्गोरिदम विफलता और गणना विफलता सहित कई चीजों की जांच की गई और उनसे निपटने के लिए उपाय विकसित किए गए।
चंद्रयान-2 की प्रमुख समस्या इंजनों पर पड़ेे अपेक्षा से अधिक दबाव से जुड़ी थी। लैंडिंग साइट भी अंतरिक्ष यान की जरूरतों के हिसाब से बहुत छोटी साबित हुई। चंद्रयान-3 को इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया, जिसमें लैंडिंग क्षेत्र को 4 किमी गुणा 2.5 किमी तक बढ़ाया गया। बिजली उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए अंतरिक्ष यान को अधिक ईंधन और अतिरिक्त सौर पैनल से लैस भी किया गया।
बहुत से लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठ सकता है कि भारत ने अपना चंद्रयान-3 चांद के दक्षिण ध्रुव पर क्यों उतारा। दरअसल, चंद्रमा पृथ्वी का सबसे निकटतम खगोलीय पिंड है। कोई भी वैज्ञानिक खोज उस क्षेत्र में की जाती है, जिसके बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं होती। अंतरिक्ष की खोज करने वाले देशों में अंतरिक्ष के रहस्यों को जानने की एक स्वाभाविक होड़ रहती है।
सोवियत संघ ने जब सितंबर, 1959 को पहला मानव निर्मित यान लूना-2 चांद की सतह पर उतारा था, तो उससे चांद की सतह, विकिरण, चुंबकीय क्षेत्रों से संबंधित कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिली थीं। लूना-2 की सफलता ने चांद पर और अधिक प्रयोग करने एवं अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने का मार्ग प्रशस्त किया। अब तक जितने भी देशों ने चंद्र अभियान में सफलता हासिल की है, उनमें से किसी ने अपना यान चांद के दक्षिणी ध्रुव की ओर नहीं भेजा है। पिछले दिनों रूस ने जरूर लूना-25 दक्षिणी ध्रुव की तरफ भेजने की कोशिश की थी, लेकिन वह विफल रहा और अंतरिक्ष यान क्रैश हो गया। इसलिए भारत की यह सफलता बहुत महत्वपूर्ण है।
भारत ने जब चंद्रयान-1 भेजा था, तब पहली बार दुनिया को पता लगा था कि चांद पर पानी हो सकता है, क्योंकि चंद्रयान-1 को पानी के अणु मिले थे। इससे पहले यह समझा जाता था कि चांद बेहद सूखा है और वहां बिल्कुल भी पानी नहीं है। इसके बाद दुनिया भर के वैज्ञानिकों में चांद के प्रति और उत्सुकता जगी, क्योंकि पानी की संभावना से यह उम्मीद बंधी कि अगर चांद पर पानी की खोज सफल हुई, तो आगे वहां पानी ले जाने की जरूरत नहीं होगी। अमेरिका के आर्टिमिस मिशन की नजर भी दक्षिणी ध्रुव पर है। इसलिए कहा जा रहा है कि चांद के अंधेरे हिस्से दक्षिणी ध्रुव की तरफ पहुंचने की गोल्ड रश (होड़) लगी है।
इसके अलावा, अनुमान है कि दक्षिणी ध्रुव का तापमान शून्य से 230 डिग्री तक नीचे होगा। यानी वहां की मिट्टी में जमा चीजें लाखों वर्षों से जस की तस होंगी। इन्हीं चीजों के बारे में जानकारी पाने के लिए वैज्ञानिक दक्षिणी ध्रुव के पास अपना यान उतारने की कोशिश कर रहे हैं। दक्षिणी ध्रुव के पास की मिट्टी में जमे हुए बर्फ के अणुओं की जांच से कई रहस्यों का पता चल सकता है, जैसे सौर परिवार का जन्म, चंद्रमा और पृथ्वी के जन्म का रहस्य, चंद्रमा का निर्माण कैसे हुआ और उस दौरान क्या स्थितियां थीं आदि।
चंद्रयान-3 की खासियत यह है कि यह बिल्कुल स्वदेशी है, जिसे भारत ने अपने दम पर तैयार किया है। इसमें सैटेलाइट भी हमारा है, रॉकेट भी हमारा है और नेविगेशन सॉफ्टवेयर भी हमारा है, सारे वैज्ञानिक उपकरण हमारे अपने देश में विकसित किए गए हैं। यह भारत के लिए बहुत गर्व की बात है। चंद्रयान-3 से पहले अब तक जितने भी चंद्रयान चांद की सतह पर उतरे, वे भूमध्य रेखा पर ही उतरे, क्योंकि भूमध्य रेखा पर उतरना आसान है। रूस का हाल ही में क्रैश हुआ लूना-25 भी भूमध्यरेखा पर ही उतरने की कोशिश कर रहा था, लेकिन हमारे चंद्रयान-3 ने दक्षिणी ध्रुव पर उतरने में सफलता हासिल कर अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में एक नई इबारत लिख दी है। यह कामयाबी भारत के अंतरिक्ष अभियानों के लिए मील का पत्थर है।
-लेखक वरिष्ठ विज्ञान पत्रकार हैं।