अब तक असम तक सीमित नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) को 2019 के घोषणापत्र में राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने के भाजपा के दावे के बाद यह चुनावी बहस का केंद्र बिंदु बन गया था। अब जबकि असम में इसे प्रकाशित करने की अवधि पूरी होने वाली है, इसको लेकर भारी विवाद पैदा हो गया है।
एनआरसी का उद्देश्य देश के वास्तविक नागरिकों को दर्ज करना और अवैध प्रवासियों की शिनाख्त करना है। असम में ऐसा पहली बार 1951 में नेहरू सरकार द्वारा असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपीनाथ बारदोलोई को शांत करने के लिए किया गया था, जो विभाजन के बाद बड़ी संख्या में पूर्वी पाकिस्तान से भागकर आए बंगाली हिंदू शरणार्थियों को असम में बसाए जाने के खिलाफ थे। 1980 के दशक में वहां के कट्टर क्षेत्रीय समूहों द्वारा एनआरसी को अद्यतन करने की लगातार मांग की जाती रही। असम आंदोलन को समाप्त करने के लिए राजीव गांधी सरकार द्वारा 1985 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसमें 1971 के बाद आने वाले लोगों को एनआरसी में शामिल न करने पर सहमति व्यक्त की गई थी।
अवैध प्रवासियों को हटाने के लिए राज्य की कांग्रेस सरकार ने पायलट प्रोजेक्ट के रूप में वर्ष 2010 में एनआरसी को अद्यतन करने की शुरुआत असम के दो जिलों-बारपेटा और कामरूप से की। लेकिन बारपेटा में हिंसक झड़प के बाद यह प्रक्रिया ठप हो गई। हालांकि, एनआरसी का काम एक स्वयंसेवी संगठन असम पब्लिक वर्क्स द्वारा एक याचिका दायर करने के बाद सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से ही फिर से शुरू हो सका। वर्ष 2015 में असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एनआरसी का काम फिर से शुरू किया। एनआरसी का अंतिम प्रकाशन 31 अगस्त को होना है।
एनआरसी के मसौदे में असम के चालीस लाख से अधिक निवासियों को शामिल नहीं किया गया है, जिनमें अधिकांशतः बंगाली हिंदू और मुसलमान हैं, साथ ही नेपाली भाषी गोरखाओं, राजस्थानियों और उत्तर भारत के हिंदी भाषियों की भी काफी बड़ी संख्या है। नागरिकता को चुनौती देने वाली शिकायतों के बाद एनआरसी से एक लाख और लोगों को हटा दिया गया। उनमें से अधिकांश के पास नागरिकता का प्रमाण है, लेकिन नामों की वर्तनी अलग-अलग रहने संबंधी त्रुटियों के कारण उन्हें परेशानी झेलनी पड़ी है। और चूंकि असम ने विभाजन के बाद आए लोगों का रिकॉर्ड नहीं रखा है, इसलिए सरकार द्वारा जारी शरणार्थी प्रमाणपत्र पेश करने वाले बंगाली हिंदू शरणार्थियों को एनआरसी में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि इन प्रमाणपत्रों को अभिलेखों द्वारा सत्यापित नहीं किया जा सकता था।
भाजपा ने उन सभी हिंदुओं को नागरिकता देने का वादा किया, जिन्हें एनआरसी में शामिल नहीं किया गया था। ऐसा उसने तब किया था, जब नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी), 2016 संसद के दोनों सदनों से पारित हो गया था। सीएबी का इरादा बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आने वाले हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, पारसियों, जैनियों और ईसाइयों को नागरिकता देने का है, क्योंकि उन्हें उनके गृह देश में सताया गया है। इस संबंध में सीएबी का इरादा भारत में रहने की अवधि को 11 वर्ष से घटाकर छह वर्ष करने का है। हालांकि, सीएबी को पूर्वोत्तर राज्यों में बड़े पैमाने पर विरोध का सामना करना पड़ रहा है, यहां तक कि सत्तारूढ़ भाजपा के सहयोगी दल भी विरोध कर रहे हैं। वे सीएबी लाने के बाद एनआरसी की प्रभावकारिता पर भी सवाल उठा रहे हैं।
एनआरसी के साथ मोदी की यह बड़ी चुनौती है। अगर उनकी सरकार अंतिम एनआरसी में बड़े पैमाने पर हिंदू बहिष्करण को नहीं रोक सकती है और फिर असम में सीएबी को लागू करने में विफल रहती है, तो भाजपा बंगाली हिंदुओं के बीच अपने बढ़ते समर्थन को खो देगी, जो पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और अन्य राज्यों में अपनी बड़ी आबादी के कारण चुनावी संभावनाओं पर असर डाल सकता है। ममता बनर्जी पहले से ही एनआरसी को बंगाली विरोधी कदम बता रही हैं, क्योंकि मुसलमानों से ज्यादा बंगाली हिंदुओं को एनआरसी के मसौदे से बाहर रखा गया है। लेकिन अगर भाजपा सीएबी को आगे बढ़ाना चाहती है, तो इससे असमी और पूर्वोत्तर के अन्य जनजातियों के बिगड़ने का जोखिम है। भाजपा के सामने यह विचित्र स्थिति पैदा हो गई है।
दक्षिण एशिया में भारत का सबसे विश्वस्त सहयोगी बांग्लादेश असम में अवैध प्रवासियों की पहचान के बाद से उनके संभावित प्रवाह को लेकर आशंकित है। बांग्लादेश के ऊपर पहले से ही दस लाख रोहिंग्या का भार है, ऐसे में वह और लोगों का भार नहीं झेल सकता। मोदी ने शेख हसीना सरकार को यह आश्वासन देने के लिए विदेश मंत्री एस जयशंकर को इस महीने ढाका भेजा था कि एनआरसी भारत का आंतरिक मामला है। यह भी संकेत दिया गया कि अवैध बांग्लादेशियों को वापस नहीं भेजा जाएगा। बांग्लादेश ने चीन के नाराज होने का खतरा उठाते हुए भी कश्मीर के पुनर्गठन को लेकर भारत का समर्थन किया है और कहा है कि यदि युद्ध छिड़ता है, तो वह पाक के खिलाफ भारत का समर्थन करेगा। इसलिए मोदी की यह बड़ी चुनौती है कि एनआरसी का बांग्लादेश के साथ संबंधों पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े। मुस्लिम बहुल बांग्लादेश, हिंदू बहुल नेपाल या बौद्ध बहुल श्रीलंका से ज्यादा विश्वस्त पड़ोसी है, क्योंकि वे 1971 की पाकिस्तान की क्रूरताओं को नहीं भूले हैं।
अगर अवैध प्रवासियों को वापस नहीं भेजा जाता, तो सबसे बड़ी चुनौती है कि लाखों अवैध घोषित लोगों के साथ क्या किया जाएगा! इतने लोगों को जेल में रखना भी संभव नहीं होगा। बड़े पैमाने पर एनआरसी से वास्तविक भारतीयों का बहिष्करण इसलिए हुआ, क्योंकि असम की नौकरशाही उन्हें बाहर फेंकना चाहती थी। ऐसे लोगों में कई प्रतिष्ठित हस्तियां शामिल हैं। असम में इसके कारण पहले ही 57 लोगों ने खुदकुशी कर ली है। हजारों गरीब परिवार बर्बाद हो गए हैं। अगर कश्मीर के बाद असम मोदी का दूसरा मोर्चा बनता है, तो उसे संभालना मुश्किल होगा, क्योंकि असम में भाजपा को भारी नुकसान होने की आशंका है और असम में एनआरसी को ठीक से लागू किए बगैर अन्य राज्यों में उसे लागू करने की बात करना बुद्धिमानी नहीं होगी।