बजट का प्रस्तुतीकरण आजकल सरकार के उद्देश्यों और उन्हें हासिल करने के संबंध में अधिकृत बयान से कहीं अधिक मीडिया घटनाक्रम बन गया है। बजट के जरिये सरकार वित्तीय वर्ष का खाका सामने रखती है और बताती है कि वह कहां से संसाधन जुटाएगी और कैसे खर्च करेगी। मगर सरकार इस अवसर का उपयोग यह बताने के लिए नहीं करती, कि उसने पिछले वर्ष बजट में जो घोषणाएं की थीं, उनका क्या हुआ?
यदि अब तक के पैंसठ वित्त मंत्रियों द्वारा पेश किए गए बजटों पर गौर करें, तो पाएंगे कि हर वर्ष बजट में किए जाने वाले प्रस्तावों और खर्च में कोई अंतर नहीं आया है। इसका यह कतई मतलब नहीं है कि पहले बजट में राजस्व जुटाने और खर्च करने के जो रास्ते बताए गए थे, वही आज भी कायम हैं। मसलन, 1947 में आर के षणमुखम द्वारा पेश किया गया पहला बजट उपलब्ध साधनों के दायरे में ही सिमटा हुआ था और उन्होंने कर्ज पर बहुत अधिक भरोसा नहीं किया था।
करों और कर्ज की स्थिति में कालांतर में बहुत बदलाव आया है। कर भार में कमी आई है और कर्ज का दायरा बढ़ता गया है। स्थिति यह हो गई है कि राष्ट्रीय कर्ज का बोझ निरंतर बढ़ रहा है और इस पर ब्याज का बोझ ही काफी हो गया है। यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत एक कर्ज मुक्त देश था और उसका काफी सारा धन ब्रिटेन पर बकाया था।
आज राष्ट्रीय कर्ज 70 लाख करोड़ रुपये से अधिक का हो चुका है। सालाना 4,577,329,694,115 रुपये का ब्याज है और यह निरंतर बढ़ता जा रहा है। नतीजतन देश के प्रत्येक नागरिक पर 58,954 रुपये का कर्ज है। जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के अनुपात में कर्ज 49.02 फीसदी हो चुका है। लिहाजा एक चीज स्पष्ट है कि बजट में ब्याज चुकाने के प्रावधान किए जाएंगे। बजट का दूसरा बड़ा हिस्सा यानी 18 फीसदी इसी मद में जाता है। राज्यों को स्थानांतरित किया जाने वाला हिस्सा 24 फीसदी होता है। अब इसका निर्धारण जीएसटी संग्रह और इससे जुड़े कारकों पर निर्भर होगा।
इसके बाद अन्य खर्च, केंद्रीय योजनाओं और केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं का नंबर आता है, जिनकी हिस्सेदारी क्रमशः 13 फीसदी, 11 फीसदी और 10 फीसदी होती है। इसमें केंद्रीय कर्मचारियों का वेतन और पेंशन भी शामिल है, जिसका बोझ करीब तीन लाख करोड़ रुपये है। इसमें सैन्य और रेलवे विभाग के वेतन शामिल नहीं हैं।
वास्तव में केंद्र और राज्यों के वेतन पर खर्च होने वाली कुल राशि जीडीपी के 10.4 फीसदी के बराबर होती है और यह करीब 16 लाख करोड़ रुपये होती है। इसके बाद दो बड़े प्रयोजन सब्सिडी और रक्षा हैं, जिनकी हिस्सेदारी क्रमशः 10 फीसदी और नौ फीसदी है। इनसे छेड़छाड़ नहीं की जाती। इस बजट में भी 11 फीसदी आवंटन तो विकास और पूंजीगत खर्च के लिए होंगे। इसका सीधा-सा मतलब है कि सरकार प्रत्येक सौ रुपये में से 11 रुपये लोगों पर खर्च करेगी और 89 रुपये खुद पर खर्च करेगी।
आमतौर पर इस आंकड़े में भी गिरावट आती है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से राजस्व और अन्य संग्रह लक्ष्य से कम होते हैं। इस वर्ष जीएसटी संग्रह ने ह्रासोन्मुख रुझान दिखाया है। तीस नवंबर तक अप्रत्यक्ष कर संग्रह 7.35 लाख करोड़ हो चुका था, जबकि लक्ष्य 9.27 लाख करोड़ का था। इसी तरह से 19 दिसंबर तक प्रत्यक्ष कर संग्रह सिर्फ 6.49 लाख करोड़ रुपये हुआ था, जबकि लक्ष्य 9.8 लाख करोड़ रुपये है।
इस वर्ष राजकोषीय घाटा बजट के 3.2 फीसदी रहने का अनुमान है। ऐसा लगता है कि ब्याज और खर्च का हिस्सा बराबर हो सकता है। चूंकि वेतन मद के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती, इसलिए यह राष्ट्रीय खर्च में सबसे ऊपर बना रहेगा। क्षेत्रीय वातावरण को देखते हुए रक्षा क्षेत्र पवित्र गाय की तरह है और इसमें भी किसी तरह की छेड़छाड़ की उम्मीद नहीं है। और जब सब्सिडी की बात आती है, तो फिर वह उचित या अनुचित हो, सार्वजनिक या प्रच्छन्न हो और खासतौर से चुनावी वर्ष में, तब तो सरकार इसके बचाव में खुद ही उतर आती है।
नियोजित खर्च में भी बदलाव के आसार नहीं हैं। चुनावी वर्ष में सरकार सीआईआई, फिक्की और एसोचेम जैसे संगठनों के प्रति जितनी कृतज्ञ दिख रही है, उससे समझा जा सकता है कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों में बदलाव की बहुत गुंजाइश नहीं है। वैसे भी करों में बढ़ोतरी या राजस्व बढ़ाने के उपाय और तेल सहित अन्य तरह की सब्सिडियों को घटाने या बढ़ाने के फैसले बजट से पहले ही लिए जा चुके हैं। तब फिर बजट को लेकर शोर-शराबा क्यों?
दरअसल भारत को जिस चुनौती से निपटने के उपाय करने हैं, वह हाल ही में विश्व आर्थिक मंच की बैठक में नजर आई, जहां समावेशी विकास सूचकांक जारी किया गया था। इस सूचकांक में भारत महज 3.38 अंकों के साथ 79 विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में साठवें नंबर पर है, बावजूद इसके कि प्रति व्यक्ति औसत जीडीपी विकास के मामले में यह शीर्ष दस देशों में शामिल है और इसकी श्रम उत्पादकता भी मजबूत है। गरीबी में भी गिरावट आई है। दूसरी ओर कर्ज और जीडीपी का अनुपात उच्च स्तर पर बना हुआ है, जिससे सरकारी खर्च की निरंतरता पर सवाल उठते हैं।
बजटीय प्रावधानों की घोषणा के साथ ही सरकार के पास नीतिगत बदलावों का भी यह मौका है। वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने अपने पहले कार्यकाल में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव को घातक औद्योगिक लाइसेंस नीति और इसकी प्रमुख वसूली करने वाली एजेंसी डाइरेक्टर जनरल ऑफ टेक्निकल डेवलपमेंट (डीजीटीडी) से छुटकारा पाने को राजी किया था।
इससे वह एक सुधारक के रूप में सामने आए, लेकिन दस वर्षों तक प्रधानमंत्री रहने के बावजूद उन्होंने कभी समाज को सरकारी नियंत्रणों से मुक्त करने में रुचि नहीं दिखाई। तो जेटली क्या करेंगे? क्या मोदी उन्हें सार्वभौमिक न्यूनतम आय (यूबीआई) की घोषणा करने का निर्देश देंगे?
- लेखक सेंटर फॉर पॉलिसी अल्टरनेटिव के प्रमुख