अब जबकि राहुल गांधी औपचारिक रूप से कांग्रेस पार्टी की कमान संभालने वाले हैं, देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी में बड़े बदलाव दिख सकते हैं। राहुल के सामने चुनौतियां पहाड़ जैसी हैं, जिनसे निपटने के लिए बहुस्तरीय रणनीति और पेशेवराना अंदाज की जरूरत होगी। सबसे बड़ी समस्या तो यही है कि कांग्रेस न तो मानसिक रूप से और न ही सांगठनिक रूप से बड़े बदलाव के लिए तैयार दिखती है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपनी जिम्मेदारी संभालने के बाद राहुल किसी नए राजनीतिक सचिव और पार्टी के नए कोषाध्यक्ष की नियुक्ति करेंगे। अभी ये जिम्मेदारियां संभाल रहे अहमद पटेल और मोतीलाल वोरा की पहचान सोनिया गांधी के करीबी सहयोगियों की है। यदि उनकी उम्र और अनुभव को ध्यान में रखते हुए वे इन पदों पर बने रहते हैं, तो इसे यथास्थिति ही माना जाएगा और उन्हें बदला जाता है, तो इसे नई शुरुआत और सुधार के तौर पर देखा जाएगा।
राहुल कांग्रेस संसदीय बोर्ड (सीपीबी) की स्थापना कर सकते हैं, जिसका 1991 के बाद से कोई अस्तित्व नहीं है। कांग्रेस के संविधान के मुताबिक दस सदस्यीय सीपीबी कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यालय के बाद पार्टी का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। विधानसभा और संसद के चुनावों में उम्मीदवारों के चयन से लेकर मुख्यमंत्रियों और कांग्रेस विधायक दल के नेता के चुनाव में सीपीबी की अहम भूमिका होती है और पार्टी के संविधान में इसका जिक्र कांग्रेस कार्यसमिति से भी अधिक बार किया गया है। यदि सीपीबी का गठन किया जाता है, तो उसमें मनमोहन सिंह, अहमद पटेल, मोतीलाल वोरा, मोहसिना किदवई, अंबिका सोनी, दिग्विजय सिंह, ऑस्कर फर्नांडीज, मल्लिकार्जन खड़गे, सुशील कुमार शिंदे और ए के एंटनी जैसे नेताओं को उसमें शामिल किया जा सकता है। वास्तव में राहुल को पार्टी संगठन में नीचे से ऊपर तक जवाबदेही तय करने की आवश्यकता है। अपनी मां सोनिया गांधी के विपरीत नए कांग्रेस अध्यक्ष कांग्रेस में 'सब चलता है संस्कृति' को जारी रखते हुए नया बदलाव नहीं ला सकते। राहुल ने पहचान की राजनीति और वफादारी के प्रति बेरुखी दिखाई है, मगर ये ऐसी चीजें हैं, जिन्हें लेकर उन्हें पार्टी के भीतर विरोध का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि कांग्रेस में बदलाव की एक झलक प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अपमानजक टिप्पणी करने वाले वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर पर की गई कार्रवाई में देखी जा सकती है। राहुल ने न केवल अय्यर को माफी मांगने के लिए कहा, बल्कि उन्हें पार्टी से भी निलंबित कर दिया गया है। आर्थिक मामलों में सोनिया गांधी पार्टी में मौजूद मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम जैसे अर्थशास्त्रियों पर भरोसा करती थीं, वहीं राहुल अपनी राजनीतिक और आर्थिक वैश्विक दृष्टि पर भरोसा करते दिखते हैं। इस बात की संभावना है कि इस मामले में राहुल का रुझान मध्य-वामपंथी होगा। जहां तक धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा है, तो राहुल इस मामले में जवाहरलाल नेहरू और सोनिया गांधी से कहीं अधिक राजीव, संजय और इंदिरा के करीब दिखते हैं। राहुल कांग्रेस के इतिहास से वाकिफ होंगे, जब 1950 और 1960 के दशक में गोवध का मुद्दा प्रमुखता से छाया हुआ था और पार्टी में भी इसे लेकर उथल-पुथल थी।
वास्तव में 1960 के दशक में पार्टी के भीतर तब तक दक्षिणपंथी रुझान बना रहा, जब तक कि इंदिरा ने समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे के प्रति अनुराग नहीं दिखाया। लेकिन 1980 में सत्ता में वापसी के बाद इंदिरा ने बहुसंख्यक समुदाय को रिझाने का काम भी किया। पी वी नरसिंह राव के पूरे दौर में पार्टी में दक्षिणपंथी खेमे का प्रभुत्व रहा। राहुल विकेंद्रीकरण को बढ़ावा दे सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय क्षत्रपों को उभरने का मौका मिल सकता है। यानी राज्य स्तरीय नेताओं को पार्टी में अधिक महत्व मिल सकता है। यह संभव है कि राहुल की अगुआई में कांग्रेस के भीतर राजस्थान में सचिन पायलट, मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया या कमलनाथ झारखंड में डॉ अजय कुमार जैसे नेताओं को उभरने का मौका मिले। पंजाब जैसे पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को हर हफ्ते में नई दिल्ली में राहुल दरबार में हाजिरी लगाने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।
इसमें दो राय नहीं कि राहुल पार्टी में पूरी तरह से आंतरिक लोकतंत्र भले स्थापित न कर पाएं, मगर लगता है कि पार्टी मुख्यालय में कार्यशैली बदलेगी और कागजों की जगह स्मार्ट फोन के जरिये कामकाज बढ़ेगा। कांग्रेस के भीतर अटकलें तेज हैं कि क्या राहुल के कमान संभालने के बाद उनकी बहन प्रियंका भी पार्टी संगठन में आ सकती हैं। और यदि ऐसा होता है तो क्या राहुल अपने चचेरे भाई फिरोज वरुण गांधी की ओर भी हाथ बढ़ाएंगे, जो भाजपा में लगभग हाशिये पर हैं? प्रियंका राहुल की करीबी सहयोगी, शुभचिंतक और सलाहकार हैं और आगे भी वह इसी भूमिका में दिख सकती हैं। औपचारिक रूप से वह संगठन से जुड़ती हैं, तो इससे पार्टी के भीतर 'सत्ता के दो केंद्र' बन जाएंगे और इससे राहुल के लिए ही मुश्किलें खड़ी होंगी। जहां तक वरुण की बात है, तो वह अभी भाजपा के सांसद हैं और उनकी मां मेनका गांधी नरेंद्र मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं, ऐसे में भला वे क्यों अपना करियर दांव पर लगाएंगे? आखिरी सवाल यह कि राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद सोनिया गांधी क्या करेंगी? क्या वह औपचारिक रूप से राजनीति से संन्यास ले लेंगी और देश से बाहर जाकर अपनी बीमार मां के साथ अधिक समय व्यतीत करेंगी या फिर यहीं रहकर राहुल की मार्गदर्शक बनी रहेंगी? कांग्रेस के भीतर ऐसी भावना है कि सोनिया कांग्रेस संसदीय दल की नेता बनी रहें या फिर कांग्रेस संसदीय बोर्ड जैसी संस्था का हिस्सा बनें।
वास्तव में सोनिया राजनीति से थोड़ा आराम चाहती हैं। दिसंबर, 2013 में उन्होंने पार्टी के कुछ चुनींदा नेताओं से कहा था कि वह सत्तर वर्ष की होने पर राजनीति से रिटायर होना चाहेंगी और तब वह 66 वर्ष की थीं। हलांकि भारत में शायद ही कोई नेता राजनीति से रिटायर होता है। सोनिया सक्रिय रहें या न रहें, लेकिन राहुल को अब खुद को साबित करना होगा।