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पहाड़-सी चुनौतियों के बीच

Thu, 27 Jun 2013 09:10 PM IST
अनिल जोशी
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उत्तराखंड में आई भीषण आपदा ने एक बार हम सबको फिर से आईना दिखा दिया है। हिमालय की इस आपदा ने दो चीजों की तरफ साफ इशारा कर दिया है। पहला कि हमने पिछली आपदाओं से कोई शिक्षा नहीं ली और दूसरा सरकारों के लिए आपदा प्रबंधन सिर्फ चिंता तक ही सीमित है, ऐसा लगता है कि सरकारें इसे ठीक से जानती तक नहीं।
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उत्तराखंड की आपदा ने एक हजार से भी अधिक लोगों को काल के गाल में पहुंचा दिया और अभी तक अनेक लोग लापता हैं। हजारों लोग बेघर हो चुके हैं, गांवों के हालात की तो अभी पूरी खबर भी नहीं है। यह पहाड़ी राज्य इस आपदा में ऐसा हताहत हुआ है कि इसे उबरने में लंबा वक्त लगेगा।

इस आपदा ने दिखाया है कि कहीं न कहीं प्रकृति हमसे नाराज है। हमने इसके साथ गत दशकों में जो भी किया, उसी का परिणाम आज हमारे सामने है। दरअसल इस पहाड़ी राज्य को स्थापित करने के पीछे जो भी राजनीतिक मंशा रही हो, पर इस मांग के पीछे यही था कि यहां के पहाड़ों, जंगलों और नदियों के कारण यहां की परिस्थिति विषम है, जिससे स्थानीय लोगों का जीवन बहुत कठिनाइयों से भरा हुआ है।
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वास्तव में पहाड़ों की छोटी-छोटी दुर्घटनाएं ही बड़े मायने रखती हैं, ऐसे में किसी पहाड़ी राज्य की प्रगति और उसका विकास मात्र आर्थिक ढांचे और सड़कों के जाल पर ही तय नहीं हो सकता। उत्तराखंड में विकास के चाहे जो भी दावे कर लिए जाएं, एक ही तगड़ी बारिश ने दिखा दिया कि हम जिस राह पर चल रहे हैं, वह ठीक नहीं है।

उत्तराखंड ही नहीं, अन्य पहाड़ी राज्यों में विकास के लिए प्राथमिकताएं तय करना अब हमारा पहला दायित्व होना चाहिए। इन राज्यों में आपदा प्रबंधन को वरीयता में रखा जाना चाहिए। ऐसी आपदाओं के लिए सिर्फ आपदा प्रबंधन विभागों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि ये संसाधनों के लिहाज से सबसे कमजोर विभागों में से एक हैं। असल में होना तो यह चाहिए कि पहाड़ी राज्यों में आपदा प्रबंधन केंद्र सरकार का विषय हो, क्योंकि आपदा आने पर राज्यों को जिस केंद्र के पास सहायता के लिए चक्कर काटने पड़ते हैं, तब वह इसकी सीधी जिम्मेदारी लेगा।

विकास के जिस मॉडल के साथ हम दिन-प्रतिदिन आगे बढ़ रहे हैं, उसमें ऐसी आपदाएं आती रहेंगी। प्रकृति से छेड़छाड़ को न हम रोक पाने में सक्षम हैं और न ही इसके प्रकोप से बचने में। अतिवृष्टि, भूस्खलन या भूकंप जैसी आपदाओं को शायद ही किसी तकनीक से रोका जा सकता है। इनकी वजह से सरकार की विकास की गाड़ी उतने कदम आगे नहीं चलती, जितने कदम पीछे हो जाती है। ऐसी आपदाओं की चपेट में शहरों और कस्बों से अधिक गांव आते हैं और उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं होती। उत्तराखंड में देखा ही जा सकता है कि अभी यह हिसाब नहीं लगाया जा सकता कि वहां वास्तव में कितने गांव प्रभावित हुए हैं। हकीकत यह है कि अनेक गांव तो नक्शे से ही गायब हो चुके हैं।

16 जून की घटना के बाद पूरे देश में आपदा प्रबंधन को लेकर बहस तेज है। और हाल यह है कि देश के आपदा प्रबंधन प्राधिकरण पर तो कैग भी उंगली उठा चुका है। उसका कहना है कि इस प्राधिकरण ने किसी भी प्रभावी योजना को कोई अमलीजामा नहीं पहनाया। आपदा प्रबंधन का कार्य ऑफिस में बैठकर और कंप्यूटर से संचालित नहीं हो सकता। अनुभवी व्यक्ति ही इसे सही दिशा दे सकते हैं। केंद्र का यह संगठन बैठकों में अधिक नजर आता है। राज्यों के आपदा प्रबंधन की कार्यशाला वगरैह के जरिये इतिश्री हो जाती है। आपदाओं से निपटने के लिए कम से कम हमें सही रणनीति तो तय करनी ही चाहिए। मसलन, सुदूर संवेदनशील वाडिया भू-विज्ञान संस्थान और मौसम विभाग को आपदा प्रबंधन से सीधे जोड़ा जा सकता है। दुर्भाग्य से विभिन्न विभागों के बीच तालमेल का अभाव नजर आता है।

आपदा प्रबंधन का काम सिर्फ सरकारी भरोसे भी नहीं छोड़ा जा सकता। जागरूक नागरिकों और सामाजिक संगठनों को भी ज्यादा सक्रियता के साथ जुड़ने की आवश्यकता है। ऐसे बहुत से संगठन हैं, जो आपदा पीड़ितों के बीच जाकर उनके दुख में भागीदारी करना चाहते हैं, मगर विकट परिस्थितियों से निपटने के लिए जरूरी प्रशिक्षण न होने से वे भी असहाय हो जाते हैं।
दुनिया में ऐसे अनेक देश हैं, जहां हर नागरिक को हर परिस्थिति के लिए तैयार किया जाता है। फिर वह आपदा प्राकृतिक हो या मानवीय। हमारे यहां भी इसकी जरूरत है और इसकी शुरुआत स्कूली शिक्षा में आपदा प्रबंधन को शामिल कर की जा सकती है। उच्च शिक्षा में जरूर आपदा प्रबंधन को जोड़ा गया है, लेकिन इसे व्यापक रूप देने की जरूरत है। हम जिस तरह प्रकृति का दोहन कर रहे हैं, उसमें आने वाली पीढ़ी को आपदा के प्रति तैयार करने का दायित्व भी हमारा है।

असल में आपदा प्रबंधन के साथ एक तरह के नैतिक बोध की भी जरूरत है, जिसका अभाव दिखता है। जो संस्थाएं आपदा प्रबंधन में आगे आती हैं, उन्हें भी व्यापक रूप से प्रशिक्षित किए जाने की जरूरत है। हमें यह बात जान लेनी चाहिए कि आपदाओं को हम नहीं रोक सकते, बल्कि उत्तराखंड में हुई तबाही ने दिखा दिया है कि आपदा किस तरह नए रूप में हमारे सामने आ रही है। इनसे निपटना अकेले राजनीतिक नीतिकारों या सरकारों के बूते का नहीं है। यह बड़ी चुनौती है, जिसके लिए निचले स्तर तक तैयारी की जरूरत है। क्या हम कोई सीख लेने को तैयार हैं?
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