व्यक्तिगत कारणों से उर्जित पटेल के एकाएक इस्तीफा देने के बाद दिसंबर, 2018 में शक्तिकांत दास केंद्रीय बैंक के गवर्नर बने थे। गवर्नर के रूप में एक ओर तो उन्होंने कोविड महामारी के आर्थिक प्रभावों से निपटने में सराहनीय भूमिका निभाई, तो दूसरी तरफ, रूस-यूक्रेन और इस्राइल-हमास के युद्धों से उपजी आर्थिक चुनौतियों से भी वह कुशलतापूर्वक निपटे। इन चुनौतियों से पार पाने के लिए केंद्रीय बैंक ने जो कदम उठाए, वे बेशक एक नियत समय के लिए थे, लेकिन उसके बाद भी अगर बाजार में कोई उथल-पुथल नहीं दिखी, तो इसका श्रेय शक्तिकांत दास को ही जाना चाहिए।
रिजर्व बैंक के किसी गवर्नर के प्रदर्शन के विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना यह होता है कि उसने महंगाई से निपटने के लिए क्या किया। इस मोर्चे पर उनकी कामयाबी इस तथ्य में देखी जा सकती है कि उनके छह वर्ष के कार्यकाल में सिर्फ एक बार जनवरी से सितंबर, 2022 में ऐसा हुआ, जब लगातार तीन तिमाहियों तक महंगाई छह फीसदी के दायरे से ऊपर रही, जिसके लिए रिजर्व बैंक को सरकार के समक्ष बाकायदा स्पष्टीकरण भी देना पड़ा था। शक्तिकांत दास ने जीएसटी की शुरुआत में तो महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ही, डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और डिजिटल मुद्रा की शुरुआत जैसे प्रयोगों को बखूबी अंजाम दिया।
अमेरिका की ग्लोबल फाइनेंस पत्रिका ने दो बार उन्हें सर्वश्रेष्ठ केंद्रीय बैंकर घोषित किया, जो अपने आप में एक बड़ी बात है। इस संदर्भ में नए गवर्नर संजय मल्होत्रा के लिए चुनौती यह होगी कि उनके ऊपर शुरुआत से ही सबकी नजर रहेगी। वह ऐसे वक्त में केंद्रीय बैंक की कमान संभालने जा रहे हैं, जब चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर घटकर सात तिमाहियों में सबसे कम 5.4 फीसदी रह गई है और अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए ब्याज दरों में कटौती का चारों तरफ से दबाव बढ़ रहा है। इसके अतिरिक्त, दो बड़े युद्धों व वैश्विक मंदी जैसे बाहरी कारकों का निर्यात पर जो असर पड़ रहा है, उसने भी केंद्रीय बैंक की चिंताएं बढ़ाई हैं। ऐसे में, डॉलर के मुकाबले रुपये में आ रही गिरावट को थामने के प्रयास तो उन्हें करने ही होंगे, लेकिन उनकी असल परीक्षा इससे होगी कि वह महंगाई से कैसे निपटते हैं।