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पंद्रह बरस बाद की चुनौती

Wed, 19 Jun 2013 09:43 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
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हाल ही में संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी की गई वैश्विक जनसंख्या रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत 2028 तक चीन को पछाड़कर दुनिया में सर्वाधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। चीन की आबादी अभी 134 करोड़ है और भारत की 121 करोड़। दुनिया की आबादी अभी 7.2 अरब है, और रिपोर्ट कहती है कि 2025 तक यह आठ अरब को पार कर जाएगी। यह इजाफा मुख्य रूप से विकाशील देशों में होगा।
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रिपोर्ट के मुताबिक, प्रजनन दर में बदलाव का जनमानस पर बड़ा असर पड़ सकता है। कई विकासशील और विकसित देश ऐसे होंगे, जहां जनसंख्या वृद्धि की गति धीमी होगी। यूरोप की आबादी में तो कमी आने का अनुमान है।

निश्चित रूप से 15 साल बाद जब भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश होगा, तो उसके समक्ष बढ़ी हुई जनसंख्या की चुनौतियां भी और अधिक होंगी। गौरतलब है कि देश में पिछले एक दशक में आबादी में 18.1 करोड़ नए लोग जुड़े हैं, जिससे दुनिया की कुल आबादी में भारत की हिस्सेदारी 17.5 फीसदी हो गई है। जबकि पृथ्वी के धरातल का मात्र 2.4 फीसदी हिस्सा ही भारत के पास है।
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जाहिर है, बढ़ती आबादी का संसाधनों पर जबर्दस्त दबाव बढ़ेगा। चूंकि संसाधनों को विकसित करने की रफ्तार जनसंख्या वृद्धि दर से कम है, इसलिए देश में आर्थिक-सामाजिक समस्याओं का दुष्प्रभाव और बढ़ेगा। विकास परिदृश्य पर गांव और पिछड़े हुए दिखेंगे, क्योंकि रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के लिए शहरों की ओर पलायन बढ़ेगा।

देश के सभी बड़े शहरों में बढ़ती जनसंख्या देश की आवास समस्या को और बढ़ाएगी। देश के करोड़ों लोगों के पास तो आज भी रहने का स्थायी ठिकाना नहीं है। मकानों की कमी के कारण शहरों में झुग्गी-बस्तियों का दबाव भी बढ़ेगा। इस समय दुनिया की सबसे अधिक मलिन बस्तियां भारत में ही हैं। आंकड़े बताते हैं कि हर छठा भारतीय झुग्गी में रहता है।

बुनियादी सुविधाओं के अभाव में यहां रहने वाले लोगों को बदतर हालात में जिंदगी बितानी पड़ती है। चूंकि गरीब परिवारों में पैदा होने वाले बच्चों की जन्म दर मध्य व उच्च वर्ग से बहुत अधिक है और उनके पास आगे बढ़ने के संसाधन कम हैं, इसलिए गरीब वर्ग का आकार बढ़ता जाएगा। बढ़ती आबादी से जनस्वास्थ्य सुविधाएं और दयनीय होंगी। अब भी नवजात शिशु की मौत के मामले में भारत सबसे आगे है। अंतरराष्ट्रीय एनजीओ सेव द चिल्ड्रन ने दुनिया में माताओं के लिए सर्वश्रेष्ठ परिस्थितियों की दृष्टि से तैयार की गई 2013 की रिपोर्ट में भारत को 142वें स्थान पर रखा है। यह रिपोर्ट स्वास्थ्य, मातृत्व, शिक्षा, आय, बाल मृत्यु दर पर आधारित है।

आबादी बढ़ने के कारण पर्यावरण पर भी दबाव बढ़ेगा। कृषि संसाधनों का बंटवारा बढ़ेगा। प्रति व्यक्ति खाद्यान्नों की खपत में कमी दिखाई देगी। यद्यपि देश में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ रहा है, पर बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण हर उत्पादन वृद्धि आवश्यकता से कम दिखाई देगी।

निश्चित रूप से जनसंख्या विस्फोट जैसी दिखाई दे रही आर्थिक-सामाजिक चुनौतियों का यह परिदृश्य आगाह कर रहा है कि हमें 2028 में भारत की आबादी के बारे में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मद्देनजर ध्यान देना होगा कि यदि जनसंख्या वृद्धि दर को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की गई, तो संसाधनों की कमी के कारण जीवनस्तर में गिरावट शुरू हो जाएगी। परिणामस्वरूप भारत ऊंची विकास दर के बावजूद विकसित देशों जैसा जीवनस्तर हासिल नहीं कर पाएगा। हमें बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए शहरों के सुनियोजित विकास पर ध्यान देना होगा।

यद्यपि सरकार ने देश को झुग्गियों से मुक्त कराने का लक्ष्य तय कर रखा है, लेकिन यह भी उपयुक्त होगा कि देश की झुग्गियों को शहरी अवसरों के प्रवेश द्वार की तरह देखा जाए। झुग्गियों को लेकर सरकार की रणनीति को और अधिक कारगर तरीके से तैयार किए जाने की आवश्यकता है। हमें ज्यादा स्वच्छ, ज्यादा सुविधाओं वाली, ज्यादा सुधरी हुई, ज्यादा ऊंचे स्तर की झुग्गियों की जरूरत है।

झुग्गी बस्तियों को सुधारने के लिए थाइलैंड और मिस्र के उदाहरण भी ध्यान में रखे जा सकते हैं। इन देशों की सरकारों ने एनजीओ के साथ मिलकर झुग्गी-बस्तियों को सुधारने के लिए सफलतापूर्वक कार्य किया है। हमें इस उजले तथ्य पर भी ध्यान देना होगा कि देश की युवा जनसंख्या को मानव संसाधन के रूप में बदलकर आर्थिक विकास का घटक भी बनाया जा सकता है। एक ताजा अध्ययन के मुताबिक, भारत की श्रम शक्ति नई वैश्विक जरूरतों के मुताबिक तैयार हो जाए, तो वह भविष्य में एक ऐसी पूंजी साबित होगी, जिसकी मांग दुनिया के हर देश में होगी। लेकिन युवा जनसंख्या को मानव संसाधन के रूप में परिवर्तित करने के लिए सरकार को पेशेवर शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण पर ध्यान देना होगा।

इस समय कुछ लोग राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के उस कथन को आवश्यक मान रहे हैं, जिसमें कहा गया है कि जनसंख्या नियंत्रण का मामला सिर्फ लोगों की इच्छा के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। हमें जनसंख्या नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। जागरूकता के विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल कर लोगों को छोटे परिवार के फायदे समझाने की जरूरत है।

जाहिर है, 15 वर्ष में भारत के दुनिया की सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बनने की रिपोर्ट के मद्देनजर बढ़ती जनसंख्या के कारण देश के आर्थिक-सामाजिक परिदृश्य पर भयावह होती जा रही चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें सुनियोजित प्रयास करना होगा और साथ ही बढ़ती हुई जनसंख्या को उपयुक्त रूप से नियंत्रित भी करना होगा।
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