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दूसरी पारी में चुनौती अमेरिका से भी

Wed, 24 May 2017 12:26 PM IST
एस डी मुनि
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हसन रूहानी
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ईरान के बेहद ध्रुवीकृत राष्ट्रपति चुनाव में हसन रूहानी ने अपना दूसरा कार्यकाल हासिल कर लिया। यह चुनाव काफी कड़वाहट के साथ लड़ा गया। रूहानी ने ईरान को दुनिया के लिए खोलने और ईरान के लोगों के लिए व्यापक राजनीतिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग का अभियान चलाया, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी इब्राहिम रईसी ने उन पर यह कहते हुए निशाना साधा, कि वह 2015 में किए गए उस परमाणु समझौते के जरिये ईरान की सुरक्षा को पश्चिम के हाथों बेचना चाहते हैं, जिसका अब तक आम ईरानियों को कोई प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ नहीं मिला है। रईसी ने आंतरिक संसाधन जुटाकर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की बात की। उन्होंने रूहानी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए दस लाख नए रोजगार सृजित करने और जरूरतमंदों को तीन गुना नकदी देने का वायदा किया। लेकिन लगता है कि ऐसे लोकलुभावन वायदे ईरान के बढ़ते मध्यवर्ग, महत्वाकांक्षी युवा, महिलाओं, धार्मिक एवं नस्लीय अल्पसंख्यकों और शहरी निवासियों को आकर्षित नहीं कर सके, जिन्होंने उदार और व्यावहारिक दृष्टिकोण से ईरान की आंतरिक और बाह्य चुनौतियों का सामना करने वाले रूहानी के पक्ष में उत्साहपूर्वक वोट किया।
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ईरान में सत्ता संरचना पर धार्मिक मुल्लाओं का वर्चस्व है। सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खमेनई का लोकप्रिय निर्वाचित नेता द्वारा जारी सभी नीतियों पर वीटो होता है। वह ईरान के सुरक्षा बलों, खासकर रिवोल्यूशनरी गार्ड्स पर भी नियंत्रण रखते हैं। रूहानी अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर उन्हें अपने दूसरे कार्यकाल में सफल होना है, तो उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान के मौलवियों के साथ तालमेल बिठाकर काम करना होगा। इसलिए जीत के बाद अपने पहले संबोधन में उन्होंने इस्लाम के साथ गणतंत्रवाद की प्रशंसा की, स्वतंत्रता और एकता का आह्वान किया तथा अपने मतदाताओं को आश्वस्त किया कि वह जो कर रहे हैं, उससे पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने अपने पहले कार्यकाल के दौरान किए गए कामों की वकालत की। तदनुसार, उन्होंने अमेरिका के साथ किए परमाणु समझौते को जारी रखने, गैर-परमाणु प्रतिबंध हटवाने के लिए बातचीत करने और ईरानी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए निवेश को आमंत्रित करने का वायदा किया। यही नहीं, उन्होंने वर्षों से जेलों में कैद या नजरबंद ईरान के कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार के पैरोकारों और पर्यावरणविदों की स्वतंत्रता की मांग की। उन्होंने ईरान के पड़ोसियों से भी अपील की कि वे विदेशी ताकतों पर भरोसा करके और सामरिक गठबंधन बनाकर खतरा पैदा करने के बजाय लोकतंत्र एवं जनता की इच्छाओं का सम्मान करते हुए क्षेत्रीय शांति एवं सुरक्षा के लिए सामूहिक रूप से काम करें।

दूसरे कार्यकाल में रूहानी की सफलता उनके संकल्प, लचीलेपन और आने वाली चुनौतियों से निपटने की उनकी क्षमता पर निर्भर करेगी। विदेश नीति के क्षेत्र में उन्हें शेष प्रतिबंधों को हटवाने और परमाणु समझौते को स्थायी बनाने के लिए अमेरिका के साथ और बेहतर सबंध बनाने होंगे। गौरतलब है कि अपने शुरुआती बयान में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि ओबामा प्रशासन का ईरान से समझौता गलत था, जिससे संकेत मिला कि वह इसे रद्द कर सकते हैं।
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सऊदी अरब की यात्रा के दौरान ट्रंप ने 300 अरब डॉलर का हथियार समझौता किया, जो नए अमेरिकी प्रशासन पर सऊदी अरब के मजबूत प्रभाव को दर्शाता है। यहां यह भी ध्यान में रखना होगा कि भले ही सऊदी अरब ईरान पर क्षेत्रीय अस्थिरता और आतंकवाद का आरोप लगाता है, लेकिन ट्रंप ने अपने सऊदी मेजबान और पचास अन्य मुस्लिम देशों से अपील की कि वे क्षेत्र से आतंकवाद का उन्मूलन करने के लिए अपने गिरेबान में झांकें। उन्होंने कहा कि हर राष्ट्र का यह कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उसकी धरती पर आतंकवाद को पनाह नहीं मिलेगी। हालांकि रूहानी की जीत पर अब तक अमेरिका ने कोई सकारात्मक रुख नहीं दिखाया है और सीरिया, इराक और यमन में क्षेत्रीय विवादों पर ईरान और अमेरिका के बीच भारी मतभेद हैं। लेकिन यूरोपीय देशों की प्रतिक्रियाएं ज्यादा आश्वस्तकारी हैं। इसलिए रूहानी के पास अमेरिका और यूरोप के मतभेदों को दूर करने के लिए अपने बातचीत के कौशल का उपयोग करने की पर्याप्त गुंजाइश है। और अमेरिका यदि वास्तव में इस अशांत क्षेत्र में स्थिरता चाहता है, तो उसे भी रूहानी की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

रूहानी को मिला व्यापक जनादेश घरेलू संदर्भ में उनके लिए एक बड़ी ताकत साबित हो सकता है, जहां उनके सामने रूढिवादियों की ओर से मजबूत चुनौतियां हैं। रूहानी आर्थिक विकास बढ़ाने और रोजगार पैदा करने जैसी अपनी पहल के समर्थन की उम्मीद कर सकते हैं, क्योंकि ईरान में बेरोजगारी की दर 12.5 फीसदी है, जिससे 30 फीसदी युवा और प्रतिभाशाली लोग प्रभावित हैं। लेकिन आंतरिक राजनीतिक व्यवस्था को खोलने, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के अत्याचार की जवाबदेही तय करने और सुधारवादी नेताओं व कार्यकर्ताओं को छोड़ने की अनुमति आसानी से नहीं मिलेगी। रूहानी ने रूढ़िवादियों के नियंत्रण में रहने वाले कई संस्थानों को अलग-थलग कर दिया, पर वे उनकी नीतियों का विरोध करना जारी रखेंगे।

भारत रूहानी के नेतृत्व में ईरान के साथ बेहतर संबंधों की उम्मीद कर सकता है, बशर्ते कि वह ईरान में चाबहार जैसी विभिन्न परियोजनाओं में अपने वितरण घाटे को नियंत्रण में रखे। ईरान-अमेरिका रिश्तों में कोई भी गंभीर बाधा भारत को बुरी तरह से प्रभावित कर सकती है, हालांकि यह उम्मीद है कि ईरान धीरे-धीरे अपने दक्षिण-पूर्वी पड़ोसी पाकिस्तान को जान जाएगा। ईरान ने पाकिस्तान आधारित आतंकियों खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी है, जो नियमित रूप से ईरानी सीमा सुरक्षा गार्ड पर हमला करते हैं। लेकिन क्षेत्रीय मामलों में ईरान का रूस एवं चीन के साथ व्यापक सामरिक सहयोग है, इसलिए भारत को अपने कूटनीतिक प्रयास तेज करने होंगे।
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