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कुर्सी का भी इतिहास होता है

Thu, 05 Dec 2013 06:47 PM IST
निर्मल गुप्त
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मेरे घर में एक कुर्सी है। खिड़की के पास रखी इस कुर्सी पर मैंने कभी किसी को बैठे नहीं देखा। मेरी मां ने बता रखा है कि इस पर कभी मेरे पिता बैठा करते थे। उससे पहले उनके पिता यानी मेरे दादा और उससे भी पहले दादा के पिता यानी मेरे परदादा। मुझे यकीन है कि हो न हो, इससे पहले भी इस पर कोई न कोई जरूर आसीन होता रहा होगा। मैंने इस मामले में जब मां से कुछ ज्यादा छानबीन करनी चाही, तो उन्होंने मुझे यह कहकर डपट दिया कि अधिक गहरे में मत जा, वर्ना डूब जाएगा।
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मुझे मालूम है कि हर चीज का इतिहास होता है और वह हमेशा खुशगवार नहीं होता। इतिहास को जब तक ऊपर से पढ़ो, तो बड़ा लुभावना होता है और उसके अंतस को कुरेदो, तो अनेक बदनाम गाथाएं सामने आ जाती हैं। इतिहास कोई नहीं रचता, वह तो सदैव अपने को रचता रहता है। अत्यंत आदरणीय लोगों का भी निजता के स्तर पर अशालीन इतिहास हो सकता है। इसी तरह संभव है कि इस कुर्सी का भी कोई ऐसा-वैसा इतिहास रहा हो, इसलिए मेरी मां ने इसकी गहराई में जाने से मना किया।

एक साहब हैं, जो आजकल अपना  इतिहास अपनी रुचि के अनुसार रचने में तल्लीन हैं। इतिहास उनका शगल भी है, गलतफहमी भी और कुछ कर गुजरने का उपक्रम भी। उनका इतिहास प्रेम लोगों को चौंकाता है, गर्वित भी करता है, तालियां भी बजवाता है और मनोरंजन भी करता है। उनका मानना है कि इतिहास रचना है, तो कुछ न कुछ करते रहो। खबरों का उत्पादन प्रचुर मात्रा में हो, इसके लिए कच्चे माल की कभी कमी न होने दो। उनकी आंख सिंहासन को ऐसे देख रही है, जैसे कभी किसी धनुर्धर ने मछली की आंख को ताका था। पर उन्हें मालूम नहीं कि मछली की आंख को ताकना सरल होता है, क्योंकि मछली की पलकें नहीं होतीं। वैसे तो सिंहासन के भी झपकने वाली पलक नहीं होती, पर इतिहास रचने के लिए आतुर साहब की पलकें चाहे-अनचाहे झपक जाती हैं। थकने पर वह भी किसी कुर्सी पर टिक जाते हैं। वह भी किसी कुर्सी पर टिके थे, जो अब इतिहास का हिस्सा बन गई। सुनने में आया है कि वह ऐतिहासिक कुर्सी बिकने के लिए बाजार में है।
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मेरे पुरखों की कुर्सी का भी अपना एक इतिहास है, जिसके विषय में मुझे कुछ अस्फुट जानकारी है। इसके बावजूद मेरे घर की यह पुरातन कुर्सी बिकाऊ नहीं है। जबरन गढ़ा हुआ इतिहास तो हाटों में बिक जाया करता है।
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