दीपावली प्रकाश का पर्व है। प्रकाश ज्ञान और सौंदर्य, दोनों का प्रतीक है। स्वच्छता का तो है ही। दीपावली के पूर्व घर की सफाई की जाती है। बेकार चीजें, कूड़ा-करकट फेंक दिया जाता है। घर में सफेदी करा दी जाती है। स्वच्छता और प्रकाश का मिलन हो, तो सौंदर्य निखर उठता है। शरद यों भी भारत की सर्वोत्तम ऋतु है। बरसात बीत जाती है, आकाश निर्मल हो जाता है, नदियों का जल कीचड़ से मुक्त हो जाता है। शरद स्नान पर्व है। कातिक का नहान इसी ऋतु में होता है। इन सबके साथ भारत का प्रधान अन्न धान इसी समय किसान के घर में आता है। शरद स्वच्छता, सुंदरता और समृद्धि-सबका प्रतीक है और दीपावली इसका उत्सव।
बचपन में गांव में हम मिट्टी के दीये जलाते थे। उसमें सरसों का तेल डालते थे। पूरा गांव छोटे-छोटे दीपों की पंक्तियों से जगमगा उठता था। चिउड़ा, लावा, भुना हुआ धान, मिठाइयों से बच्चों की जेबें भरी रहती थीं। जिनके पास नहीं होता था, उन्हें भी खाने को मिल जाता था। घरों में पकवान बनते थे। बच्चों को नए कपड़े मिलते थे। चारों ओर जगर-मगर रहता था। दीपों के अतिरिक्त रातों को आकाशदीप या कंदील जलाई जाती थी। रंगीन कागज की कंदील में चिराग जलाकर बांस और रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ा दिया जाता था। तब इतने पटाखे नहीं थे। हमारे गांव में कोहड़े (कासीफल) को पत्ते में लपेटकर अंगारे रख दिए जाते और उन्हें हथौड़े से पीटते थे, तो जोर से आवाज होती थी। पिता अपने मुस्लिम मित्र खान साहब के यहां मिठाइयां भिजवाते थे, उनके घर से ईद में मिठाई आती थी। रात भर काफी लोग जुआ खेलते थे। शराब पीते थे। हमारे गांव में भांग पी जाती थी। तब दीपावली उत्सव था। तब पटाखों का इतना शोर और धुआं नहीं था। पैसों का इतना अश्लील प्रदर्शन नहीं था। यह सब आज स्वप्न लगता है।
बचपन में हम गाते थे-करवा करवारी। ओकरे बरहे दीया देवारी। यानी करवा चौथ के बारह दिन बाद दीपावली होती है। दीपावली अमावस्या को होती है-कृष्णपक्ष की पूरी अंधेरी रात को। दीपावली लक्ष्मी पूजन के साथ-साथ महाकाली की भी पूजा की रात है। अमावस्या की रात तो मानो महाकाली का प्रतीक है। और क्या यह स्वाभाविक नहीं है कि सबसे अंधेरी रात को मनुष्य दीपावली का पर्व मनाता है। अंधकार में प्रकाश की जरूरत सबसे ज्यादा होती है। उस समय कहीं बचा हुआ थोड़ा प्रकाश भी अत्यंत मूल्यवान होता है। काली रात में तारे भी खूब चमकते हैं। धरती पर अंधकार है और आकाश चमकते तारों से जगमगा रहा है। इस अवसर पर मनुष्य धरती को भी दीपों से प्रकाशित कर देता है, अमावस्या को अपनी ओर से पूर्णमासी में परिवर्तित करने का उद्योग करता है। मानवीय प्रयत्न का यह औदात्य उसकी जिजीविषा और जययात्रा का प्रतीक है।
लेकिन दीपावली में दिल्ली में प्रदूषण बढ़ रहा है। पूछा जा सकता है कि शुभ अवसर पर प्रदूषण की बात क्यों की जा रही है। लेकिन प्रदूषण अब खतरा ही नहीं है, वह सामने खड़ा ललकारता हुआ दैत्य है। उसकी अनदेखी करना हमारे लिए आत्मघाती होगा। कभी-कभी लोग परंपरा की दुहाई देते हैं। परंपरा हमें अतीत से जोड़ती ही नहीं, वह हमें अतीत से अलग भी करती है। वह पुराने में कुछ नया जोड़ती भी है, पुराने में से कुछ को तोड़ती भी है। परंपरा इतिहास की धार पर खड़ी होकर सार्थक होती है। कहते हैं-चलति एकेन पादेन तिष्ठति एकेन पादेन। यानी वह एक पैर से चलती है और एक पैर पर खड़ी रहती है। खड़ी रहेगी, तो जड़ हो जाएगी। दोनों पैरों से चलेगी, तो गिर जाएगी। सो प्रदूषण के संबंध में परंपरा को इसी दृष्टि से देखना चाहिए। इतना बड़ा खतरा आंख मूंद लेने से टलने वाला नहीं है। हमें अपने आपको बदलना पड़ेगा। नहीं बदलेंगे, तो इतिहास की बात तो दूर, प्रकृति ही हमें पटक देगी।
जो लोग प्रदूषण के विरुद्ध लड़ेंगे, वे परंपरा को बाधक समझते हैं। नाना तर्कों से पटाखों के चलते रहने का आग्रह करते हैं। वे प्रकृति और संस्कृति के परस्पर संबंध पर ध्यान नहीं देते। मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं, वह प्रकृति का ही अंग है। जड़ चेतन एक दूसरे से इतना भिन्न या अलग नहीं हैं, जितना कि पहले समझा जाता था। आज तो तकनीक के सहारे मनुष्य का काम जड़ से ज्यादा चलता है। रोबोट को लगभग 'सचेत' बनाने का प्रयास किया जा रहा है। यह प्रयास कितनी आशंकाएं जगा रहा है, यह दूसरी बात है। अब चिंतक प्रकृति की 'अंध इच्छा' की बात करते हैं। प्रकृति निष्क्रिय नहीं है। वह मनुष्य की अपेक्षा कहीं ज्यादा कल्पनातीत स्तर पर सक्रिय और शक्तिशाली है, किंतु वह सावधान नहीं, विवेक शून्य है। शायद इसी प्रकृति व्यापार को हमारे मिथक में शक्ति और शिव के युग्म से संकेतित किया गया है। प्रकृति शक्ति है, लेकिन यदि वह शिवत्व के अनुकूल न हो, तो शिव को दबाकर उन्हें पदतल कर देती है। वह तांडव करके सृष्टि को छिन्न-भिन्न कर देती है।
कौन कह सकता है कि घोर अंधकार में, महाकाली में शक्ति नहीं है? अंधकार में शक्ति है, किंतु दृष्टि नहीं है। दृष्टि मानवीय विवेक में है। आपको याद आएगा, राम की शक्तिपूजा में राम का दृष्टिदान। इतिहास में, मनुष्य की यात्रा में ऐसे कालखंड आए हैं, जब शक्ति अन्याय के साथ हो गई है-अन्याय जिधर है उधर शक्ति। तब शक्ति की पूजा-साधना की जाती है और उसे अपनी ओर किया जाता है। विडंबना यह है कि अन्यायी प्रायः शक्तिशाली होते हैं।
दिक्कत यह है कि आज हम जिस व्यवस्था में हैं, उसकी नीति अधिकाधिक संग्रह में है। प्रत्येक को सबसे अधिक मिलना चाहिए, प्रत्येक को सबसे आगे होना है। मतलब यह कि प्रत्येक को प्रत्येक का प्रतियोगी होना है।
प्रदूषण हमारी जीवन पद्धति में प्रवेश कर चुका है। उससे मुक्ति के लिए घोर साधना करने की जरूरत है। दीपावली आज भी स्वच्छता, सौंदर्य, समृद्धि का ही प्रतीक है, किंतु आज वह मलिनता, संकीर्णता और प्रदूषण के विरुद्ध शाब्दिक साधना की मांग कर रही है, अपने वास्तविक रूप में मनाए जाने की मांग कर रही है।