भारतरत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे ने धर्मशास्त्र का इतिहास में दीपावली के सुखरात्रि, यक्षरात्रि तथा सुखसुप्तिका नाम लिखे हैं। यह किसी देव या देवी के सम्मान में किया गया केवल एकदिवसीय उत्सव नहीं है, बल्कि पांच दिनों तक चलता है और इसमें अनेक कृत्य संपादित होते हैं। धन पूजा, नरक चतुर्दशी, हनुमान जयंती, अन्नकूट तथा भाईदूज। इनमें सबसे खास है भगवती महालक्ष्मी की पूजा। लक्ष्मी जी का संबंध मात्र धन से ही नहीं, बल्कि उनकी पवित्रता से भी है, क्योंकि लक्ष्मी अशुद्ध, अपवित्र और अप्राकृतिक से कभी नहीं जुड़ती। लक्ष्मी भगवान नारायण के साथ प्रतिष्ठित हैं। शास्त्रों में वे श्री, शोभा, समृद्धि और सौभाग्य के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वात्स्यायन के कामसूत्र में दीपावली ‘यक्ष-रात्रि’ है। यक्ष-रात्रि से तात्पर्य है कि इस दिन यक्षराज कुबेर की पूजा होती थी। दीपावली के साथ यक्षों के जुड़ने का तात्पर्य ऋग्वेद के श्रीसूक्त से स्पष्ट है। इसके एक मंत्र में ‘मणिना सह’ शब्द का प्रयोग है, जिसका संबंध यक्षों द्वारा किए जाने वाले ‘मणिभद्र यज्ञ’ से है। महाभारत में मणिभद्र एक यक्ष हैं, जो यक्षस्वामी कुबेर के साथ वर्णित हैं। यक्षों से संबंध होने से कामसूत्र ने दीपावली को यक्ष रात्रि कहा है।
शास्त्र दीप को निर्जीव नहीं, वरन देवता मानते हैं-भो दीप देवरूपस्त्वम्...। दीप के देवता में परिवर्तित हो जाने का एक सुंदर इतिहास है। पुराकाल में अग्नि को बचाए रखने के तमाम उपायों में दीप सबसे आसान तरीका था। वह सहारा था जीवन का और लौकिक व्यवहारों का। आचार्य यास्क के अनुसार, ‘भरत’ का अर्थ आदित्य है और उससे उत्पन्न प्रजा ‘भारती’ है। इस प्रकार भारत शब्द का अर्थ है सूर्य संतान यानी प्रकाश की प्रजा। हमारे देश भारत का मतलब ही प्रकाश में रत है, जो प्रकाशोत्सव मनाता है। वेद कहते हैं कि माता लक्ष्मी सुखी दांपत्य, स्वादिष्ट अन्न, लहलहाती फसल तथा गौ माता से जुड़ी है। दीपावली मनुष्य के लिए गौरव बोध का पर्व है। आचार्य कुबेरनाथ राय दीपावली को मनुष्य के हाथों अंधकार पर विजय की रात्रि मानते हैं। धरती की बेटी माता सीता के सगे भाई हैं ये दीप। लक्ष्मी का उपयोग होता है, उपभोग नहीं। जो उसके उपभोग का दुस्साहस करता है, वह रावण जैसी दुर्गति को प्राप्त होता है।