यह साल आधा बीत चुका है और चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में महज तीन महीने रह गए हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ झारखंड में सरकार बनाने जा रही कांग्रेस एक और लक्ष्य हासिल करने के बारे में सोच रही है। इससे 2014 के चुनाव में कांग्रेस के खाते में पांच और सीटें आ सकती हैं, जबकि भाजपा के लिए यह दूसरा झटका होगा।
इस बीच इशरत जहां मुठभेड़ मामला सामने आ गया है और सीबीआई ने पहला आरोपपत्र दाखिल किया है, जिसमें इस बात का संकेत है कि मुठभेड़ फर्जी थी, जिसे खुफिया ब्यूरो और गुजरात पुलिस ने संयुक्त रूप से अंजाम दिया। यह एक बहुत गंभीर मामला है। इस बारे में हर किसी का चूंकि अपना-अपना मत है, ऐसे में इसके निहितार्थों को समझना बेहद ही मुश्किल हो गया है। न केवल इसमें, बल्कि अन्य विवादास्पद मामलों के बारे में भी मेरा मानना है कि कि उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालयों का फैसला अंतिम होना चाहिए। राजनीतिक दल इस मुद्दे की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं, लेकिन जो मामला शीर्ष अदालत की निगरानी में है, उसके लिए हमें परेशान होने की जरूरत नहीं है। एनकाउंटर कोई नई बात नहीं है और यह पूरे देश में होता ही रहता है, लेकिन मानवाधिकार समूहों की सजगता ने ऐसे मामलों को सार्वजनिक करने में मदद की है।
मैं यह जानकर बेहद दुखी महसूस करता हूं कि कई मामलों में मुस्लिम युवाओं एवं अन्य बेगुनाहों को वर्षों जेल की सजा भुगतनी पड़ती है। जनता की न्याय की मांग को फौरी तौर पर संतुष्ट करने के लिए पुलिस बेगुनाह लोगों का जीवन बर्बाद कर देती है। ऐसे एक-दो मामले हो सकते हैं, जिनमें वास्तव में गलतियां हुई हों, लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह से ऐसे मामलों की संख्या बढ़ी है, वह भयावह है। इसका मूल्यांकन करने के लिए विशेष अदालतों की मांग उठ रही है कि जिन अपराधों के लिए मुस्लिम युवा वर्षों से जेल में हैं, क्या वाकई उन्होंने वह जुर्म किया है। हमें इसके लिए मीडिया का कृतज्ञ होना चाहिए कि उसके कारण ऐसे मामले उचित जांच के दायरे में लाए गए हैं। 2002 के गुजरात दंगे की भाजपा को तब तक भारी राजनीतिक कीमत चुकानी होगी, जब तक वह ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से बाज नहीं आती।
हमारे संसदीय लोकतंत्र में संसद सबसे ऊपर है। किसी का ऐसा इरादा नहीं है कि सरकारी संस्थाएं पिंजरे के तोते की तरह हों। लेकिन चुने हुए जनप्रतिनिधियों को पिंजरे में रखने की कोशिश भी नहीं होनी चाहिए, जिससे कि वह फैसला लेने में असमर्थ हो। जो लोग और संस्थाएं जनता द्वारा निर्वाचित न होकर मनोनीत हैं, वे भी अपने कामकाज में पूर्ण स्वतंत्रता चाहती हैं! दुनिया का दूसरा कोई लोकतांत्रिक देश ऐसा नहीं होगा, जहां स्वाधीन होने की मंशा इतनी तीव्र हो। लेकिन असीमित शक्तियों का हमेशा किसी न किसी रूप में दुरुपयोग होता है, यह हमने सरकार चलाने के दौरान व्यावहारिक रूप से देखा है।
यदि सीबीआई को सरकार से स्वतंत्र करना है, तो फिर उसे अदालतों के अधीन क्यों होना चाहिए? क्या हम ऐसा लोकतंत्र चाहते हैं, जो तानाशाही की तरह काम करे? हमने अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और यहां तक कि सेवानिवृत्त नौकरशाहों के एक समूह का उत्थान एवं पतन देखा ही है। वह पूर्व सेना प्रमुख आज कहां हैं? और सामाजिक आंदोलन को एक राजनीतिक पार्टी में तब्दील करने वाले लोग भी आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी जमानत बचाने के लिए भारी दबाव में होंगे। सोशल मीडिया और टीवी चैनलों के प्रोत्साहन के बावजूद उनका आंदोलन विफल क्यों हुआ? इसकी असली वजह यह है कि सभी अपने-अपने ढंग का लोकतंत्र पेश कर रहे थे, जो अराजकता और अव्यवस्था से ज्यादा कुछ नहीं था।
आज देखिए कि मिस्र में क्या हुआ! वहां की सेना ने राष्ट्रपति मुर्सी की सरकार का तख्तापलट कर दिया। लाखों लोग काहिरा की सड़कों पर जमा हैं। कई तो पहले ही मर चुके हैं और हताहतों की संख्या हजारों में हो सकती है, क्योंकि प्रदर्शनकारियों के पास वैकल्पिक सरकार को लेकर कोई सुसंगत नीति नहीं है। मध्य-पूर्व में एक के बाद एक, कई देशों में हमने ऐसा होते देखा है। लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुरक्षा व स्थायित्व और लोकतांत्रिक स्तंभों के बीच बेहतर तालमेल के बिना लोकतंत्र नहीं आता। कुछ लोग समझते हैं कि लोकतंत्र की तलाश में वे अराजकता एवं अव्यवस्था को थोड़ी ढील दे रहे हैं। हमारी व्यवस्था इन खतरों से बाहर निकल आई है और मेरा दृढ़ विश्वास है कि आम आदमी उसी पार्टी को वोट देगा, जो उनके साथ सत्ता में साझेदारी करेगी।
अब भविष्य के बारे में मैं अपनी पेशेवर राय देना चाहूंगा। आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 2009 के 206 सीटों के आंकड़े से लुढककर 150 से 155 सीटों पर सिमट जाएगी, जबकि भाजपा बहुत मुश्किल से सौ से कुछ अधिक सीटें जीत पाएगी। मेरे आकलन के मुताबिक, क्षेत्रीय पार्टियां 270 सीटें जीतेंगी, लेकिन लाख टके का सवाल है कि क्या वे 160 सीटों का समूह तैयार कर सकती हैं, ताकि कांग्रेस उनके साथ जाने के लिए मजबूर हो। यह सब कुछ चुनाव खत्म होने के बाद ही तय होता है, पर मेरा मानना है कि यह काफी पहले तय हो जाएगा। आप स्वयं कागज-कलम लेकर लिखना शुरू कीजिए कि कौन-सी क्षेत्रीय पार्टी कांग्रेस के साथ जाएगी और कौन भाजपा के साथ, आपको जवाब मिल जाएगा। झारखंड में कांग्रेस और झामुमो की सरकार बनने में अब सिर्फ औपचारिकताएं बची हैं। जुलाई में और भी कई समझौते होने वाले हैं।