कार्टूनिस्ट के लिए सबसे खास बात ही यह है कि वह अपने आंख, नाक, कान खुले रखे। विचार कहीं से भी, कभी भी आ सकते हैं। उनका बखूबी इस्तेमाल करना आना चाहिए। करीब 25 साल पहले की बात है। मैं घर में बैठा था। मेरा बेटा बाहर आंगन में खेल रहा था।
तब वहां झुमरी तलैया से कुछ लोग मुझसे मिलने पहुंचे। वे लोग सिर्फ मेरा नाम सुनकर ही मिलने आए थे, मुझे पहचानते नहीं थे। उन्होंने बाहर से ही बच्चे से मेरी तरफ इशारा करके पूछा, ‘बेटा, ये सज्जन कौन हैं?’ मेरे बेटे ने तपाक से जवाब दिया, ‘ये सज्जन नहीं हैं, ये मेरे पापा है।’ बस ढब्बू जी के अगले कॉलम में यही स्केच और डायलॉग इस्तेमाल किए गए।
वैसे मेरी कार्टूनिंग में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। मूलत: मैं एक पेंटर हूं। अपनी कुछ पेंटिंग्स के लिए ही मैंने एक बार कुछ इलस्ट्रेशन बनाए, जो काफी पसंद किए गए। बस, उसके बाद कार्टून बनाने का सिलसिला चल निकला। तब से अब तक काफी कुछ बदल गया है, लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि आज के समय में कार्टून का महत्व कम हुआ है।
आज भी कार्टूनिंग की दुनिया में मंजुल और पवन जैसे नाम हैं, जो कार्टूनिंग के सुनहरे वर्तमान और भविष्य की तस्वीर दिखाते हैं। अगर यह कहा जा रहा है कि अब कार्टून सत्ता पर वैसी चोट नहीं कर पाते, जैसा पहले होता था, तो इसके लिए मौजूदा हालात जिम्मेदार हैं। आज की तरह पहले कभी किसी कार्टूनिस्ट को कार्टून बनाने की सजा भी नहीं मिली, उसे जेल नहीं भेजा गया। कुछ समय पहले हुई असीम त्रिवेदी के जेल जाने की घटना से सभी वाकिफ हैं।
फिर बात यह आती है कि अखबार और पत्रिकाओं में कार्टून को कितना स्पेस मिल रहा है! समाज में कार्टून को कितना स्पेस दिया जा रहा है और अपनी जिंदगी में हमने कार्टून के लिए कितनी जगह तय कर रखी है। यहां कार्टून का मतलब बच्चों के कार्टून किरदारों से नहीं है, जो आजकल टीवी पर उपलब्ध हैं।
जिंदगी में कार्टून को जगह देने का मतलब है कि अगर अपनी कमी या गलतियों पर कोई इशारा करता है तो हम उस पर किस तरह से प्रतिक्रिया करते हैं। नेहरू से ज्यादा कार्टून शायद ही किसी प्रधानमंत्री के बने हों। इंदिरा गांधी को भी कार्टूनिस्टों के व्यंग्यबाण झेलने पड़े। तब और भी राजनेताओं को कार्टूनिस्टों ने अपना सब्जेक्ट बनाया, लेकिन ऐसी प्रतिक्रिया नहीं होती थी। कहने का एक अधिकार था और उस अधिकार का दमन नहीं होता था। आज बात बदल गई है। अधिकार और हक जैसे शब्द बेमानी हो गए हैं और समाज का ढांचा भी बदल गया है।
बात यह है कि कार्टून के लिए स्पेस तो है, लेकिन कार्टूनिस्ट नहीं हैं। अखबार में कम पैसे मिलने की वजह से ज्यादातर युवा कार्टूनिस्ट अब एनीमेशन की तरफ रुख करने लगे हैं। हालांकि पहले की तुलना में अब कार्टूनिंग के लिए सुविधाएं कहीं ज्यादा हैं। मसलन डिजिटलाइजेशन का फायदा मिल रहा है। दूसरा इंटरनेट से अब नए-नए विचारों के लिए इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता है।
घर बैठे ही आप यह भी जान सकते हैं कि दूर विदेश में कार्टूनिस्ट क्या बना रहे हैं। वक्त सच में बहुत बदल गया है। जब मैंने ढब्बू जी बनाना शुरू किया, तब एक कार्टून के लिए 15 रुपये मिलते थे। अब उसी कार्टून के लिए 2500 रुपये मिलते हैं। कार्टून समाज में बदलाव लाने और अपनी बात कहने के लिए काफी प्रभावशाली माध्यम है। एक ही चित्र पूरा उपन्यास कह जाता है। आंखें और नाक, कान खुले रखने की जरूरत है। अपने आप विचार मिल जाते हैं।