उत्तराखंड की त्रिवेंद्र रावत सरकार ने भाजपा के चुनावी वादे का पालन करते हुए भराड़ीसैण (गैरसैण) में ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा कर ही दी। पर इस घोषणा पर संदेह की गुंजाइश है, क्योंकि सरकार मंडल मुख्यालय पौड़ी में तो मंडल स्तर के अधिकारियों को पहुंचा नहीं पा रही है, फिर पूरे सचिवालय और शीर्ष नौकरशाही को भराड़ीसैण की चोटी पर कैसे पहुंचा देगी? अगर उत्तराखंड सरकार बिना सचिवालय और सरकारी कामकाज के हिमाचल के धर्मशाला की तरह साल में हफ्ते भर का विधानसभा सत्र ग्रीष्मकालीन राजधानी के नाम से गैरसैण में कराना चाहती है, तो यह पहाड़ के लोगों के साथ छलावा और राज्य के सीमित संसाधनों का दुरुपयोग होगा।
मुख्यमंत्री ने विगत जून में कमिश्नरी मुख्यालय पौड़ी में कमिश्नरी स्तर के सभी अधिकारियों की तैनाती सुनिश्चित कर इस ऐतिहासिक नगर का रुतबा लौटाने का वादा किया था, पर कमिश्नर और डीआइजी को कमिश्नरी मुख्यालय पर पहुंचाना तो दूर, वहां कोई अदना-सा अधिकारी भी स्थायी रूप से ड्यूटी देने नहीं पहुंचा। अगर गैरसैण में ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाई जाती है, तो समूचे सचिवालय को देहरादून से गैरसैण पहुंचाना होगा। सरकार इससे पहले रिस्पना को ऋषिपर्णा बनाने, पहाड़ पर चकबंदी कराने, श्रीनगर मेडिकल कॉलेज को सेना को सौंपने, सौ दिन में लोकायुक्त का गठन करने और सवा लाख करोड़ रुपये निवेश कर उद्योग लगवाने जैसी कई घोषणाएं कर चुकी है, जो पूरी नहीं हुईं।
उत्तराखंड के गठन से पूर्व तत्कालीन कैबिनेट सेक्रेटरी ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर उनसे पूछा था कि नए राज्य की राजधानी कहां बनाई जा रही है। तत्कालीन मुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्ता ने जब इस बारे में पहाड़ के जनप्रतिनिधियों की बैठक बुलाई, तो सभी अपने-अपने निकट राजधानी बनाने पर जोर देने लगे। नतीजतन यह जिम्मेदारी प्रशासन पर छोड़ दी गई। प्रशासनिक अधिकारी देहरादून जैसा शहर छोड़ गैरसैण क्यों चले जाते? राज्य गठन के बाद भी संकीर्ण क्षेत्रवाद में फंसे राजनीतिक नेतृत्व ने सर्वमान्य फैसला लेने के बजाय यह जिम्मेदारी दीक्षित आयोग को सौंप दी। आयोग ने अखबारों में विज्ञापन देकर स्थायी राजधानी के लिए जब सुझाव मांगे, तब 70 विधायकों, पांच लोकसभा और तीन राज्यसभा सदस्यों के अलावा कई दर्जन नगर निकायों में से केवल एक तत्कालीन सांसद एवं एक मंत्री तथा नेता प्रतिपक्ष सहित पांच विधायकों ने स्थायी राजधानी स्थल के लिए आयोग को अपने सुझाव दिए थे।
गैरसैण में अब तक जितना निर्माण हुआ है, उसी पर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) को एतराज है। वर्तमान में भराड़ीसैण में चल रहे विधानसभा के बजट सत्र के लिए कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए बिस्तर-कुर्सियां और खाने के सामान तक देहरादून से गए। देहरादून से वहां सामान ढोने में और कुछ दिन के लिए राजनीतिक बारात ले जाने में सरकार को करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। वहां जाने के लिए सड़कें इतनी तंग हैं कि दो कारें भी हर जगह क्रॉस नहीं हो पातीं। बरसात में पहाड़ की सड़कें टूट जाती हैं। भराड़ीसैण में रहना कोई नहीं चाहता। सारे नेता पहाड़ छोड़कर मैदानी नगरों में आ चुके हैं। पहाड़ से पलायन रोकने के लिए बनाया गया पलायन आयोग खुद पौड़ी से देहरादून पलायन कर चुका है। ऐसे में, बेहतर होता अगर सरकार गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा के साथ ही पूरी योजना और समयबद्ध कार्यक्रम की भी घोषणा करती।