अक्सर कहा जाता है कि वास्तविकता के खिलाफ युद्ध में कल्पना एक शक्तिशाली हथियार है। पिछले हफ्ते कर्नाटक के बेलगाम से भाजपा सांसद सुरे अंगाड़ी ने आर्थिक सुस्ती को लेकर हो रहे विरोध को खारिज कर दिया और कहा, 'हवाई अड्डों और ट्रेनों में भीड़ है, लोगों की शादियां हो रही हैं।' अंगाड़ी ने आर्थिक सेहत को आंकने के लिए ऐप आधारित टैक्सियों और बॉक्स आफिस की कमाई आदि का भी जिक्र कर डाला। आखिर अर्थव्यवस्था का मिजाज है कैसा?
2016-17 में भारत की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की विकास दर 8.2 फीसदी थी। तीन बजटों के बाद भारत की जीडीपी 2018-19 में नीचे गिरकर 6.8 फीसदी पर आ गई और उत्तरोत्तर तिमाहियों में जीडीपी जुलाई 2018 में आठ फीसदी से नीचे गिरकर 2019 की अप्रैल से जुलाई की तिमाही में पांच फीसदी पर आ गई थी। पिछले हफ्ते अर्थशास्त्रियों के एक समूह ने अनुमान व्यक्त किया कि जुलाई और सितंबर के दौरान जीडीपी की विकास दर 4.2 फीसदी से 4.7 फीसदी के बीच हो सकती है, जो कि पहले से कम है। इससे पता चलता है कि यदि 4.5 फीसदी का औसत मानें तो इस वर्ष की पहली छिमाही में जीडीपी की विकास दर 4.85 फीसदी के आसपास होगी। इसका मतलब यह हुआ कि 2019-20 में छह फीसदी की विकास दर के लिए अर्थव्यवस्था को अक्तूबर से मार्च के दौरान 7.2 फीसदी की रफ्तार से आगे बढ़ना चाहिए। मूडी ने वर्तमान वित्त वर्ष के लिए जीडीपी का अपना अनुमान घटाकर 5.6 फीसदी कर दिया है। और शनिवार को नेशनल काउंसिल फॉर अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (राष्ट्रीय व्यावहारिक आर्थिक अनुसंधान परिषद) ने 2019-20 के लिए भारत की जीडीपी विकास दर के 4.9 फीसदी रहने का अनुमान व्यक्त किया है। सिर्फ जीडीपी की भविष्यवाणियां ही मायूसी नहीं पैदा कर रही हैं। अप्रत्यक्ष कर संग्रह में संकुचन और प्रत्यक्ष कर संग्रह की धीमी रफ्तार-18 फीसदी से अधिक के संग्रह का लक्ष्य था- से राजस्व में कमी आएगी और इससे वित्तीय घाटे के लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी के जोशी ने ट्विटर पर देश की अर्थव्यवस्था में गिरावट को ग्राफ के जरिये समझाया है। इसमें आंकड़े दिखाते हैं कि नीतिगत दरें कम हैं, मुद्रास्फीति नीचे है, कच्चे तेल के दाम अनुकूल हैं और वैश्विक जीडीपी की विकास दर तीन फीसदी से कुछ अधिक है, इसके बावजूद विकास दर नीचे जा रही है। भारत में लोगों और उपभोक्ताओं की कमी नहीं है, इसके बावजूद अर्थव्यवस्था खराब मांग और खपत के संकट का सामना कर रही है। रिजर्व बैंक के उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण में यह साफ दिखाई देता है, जो कि छह वर्ष के सबसे निचले स्तर पर है। कंपनियों की बिक्री के आंकड़े, निजी खपत से संबंधित तिमाही आंकड़ा और हाल ही में लीक हुआ एनएसओ का अध्ययन दिखाता है कि ग्रामीण खपत 80 के दशक के बाद पहली बार संकुचित हुई है।
रिजर्व बैंक के आंकड़े दिखाते हैं कि एमएसएमई, सेवा और प्राथमिकता क्षेत्र में गैर खाद्य कर्ज में गिरावट आई है। निजी निवेश में नई गिरावट आई है, उच्च सरकारी उधार की पहुंच कम हो गई है और खराब मांग और क्षमता उपयोग ने उद्यमियों को निवेश के लिए प्रोत्साहन से दूर कर दिया है। और फिर नए एनपीए (फंसे कर्ज) का परिदृश्य नजर आ रहा है, बिजली कंपनियां मांग में कमी और खराब भुगतान के बीच संघर्ष कर रही हैं, रियल एस्टेट कंपनियां अधूरी परियोजनाओं से उबर नहीं पाई हैं और दूरसंचार कंपनियों ने सरकार से एक लाख करोड़ रुपये की मांग की है।
फंसे धन के रूप में अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाली नई अवधारणा परिदृश्य को और खराब कर रही है। यह अनिवार्य रूप से सरकारी क्षेत्र पर निजी क्षेत्र का बकाया धन है, मसलन राज्य बिजली बोर्ड बिजली कंपनियों के 80,535 करोड़ रुपये के बकायेदार हैं। यह सूची सस्ती आवास परियोजनाओं के बकाएदारों से लेकर सड़क निर्माण कंपनियों तक और लंबी है। इसके अलावा वित्तीय क्षेत्र में दिवालियेपन का मुद्दा भी है। पिछले 15 महीने के दौरान दो लाख करोड़ रुपये की बैलेंस शीट वाली एनबीएफसी (गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां) की हवा निकल गई। अभी इसका कोई समाधान भी नहीं है। दो हजार से अधिक लेनदार दिवालिया कंपनियों से वसूली के लिए कतार में खड़े हैं। हां नए नियमन से बैंकों के लिए रास्ता साफ हुआ है, लेकिन जिन लेनदारों को भुगतान नहीं हुआ है उनकी समस्या आपूर्ति शृंखला और ऋणदाताओं के भरोसे पर असर डाल सकती है।
तथ्य यह कि भविष्य के सबक अतीत से जुड़े होते हैं। नवंबर, 2017 में रेटिंग एजेंसी मूडी ने भारत की रेटिंग को सुधारते हुए इसे बीएए2 से बीएए3 की थी और 'नजरिये' को 'स्थिर' और 'सकारात्मक' बताया था। सरकार ने इसका स्वागत किया था और इसे पिछले कुछ वर्षों के दौरान किए गए सुधारों की पु्ष्टि बताया था। लेकिन यह सुधार किंतु-परंतु और चेतावनी के साथ था। मूडी ने आगाह किया था कि काफी कुछ किया जाना बाकी है और उसने अनेक सुधारों की उम्मीद की थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
सात नवंबर, को मूडी ने कहा कि सुधारों पर अमल की संभावनाएं मंद पड़ गई हैं। लिहाजा उसने भारत के लिए 'नजरिये' को बदलकर इसे 'स्थिर' से 'नकारात्मक' कर दिया और रेटिंग को बीएए2 कर दिया। बेशक, सरकार ने पांच फीसदी के अनुमानों से पहले और उसके बाद कई पहलें की हैं। इनमें दिवालिया होने की प्रक्रिया में ढील, रियल एस्टेट, निर्यात और एमएसएमई के लिए पैकेज और कॉरपोरेट कर में कटौती शामिल हैं। रिजर्व बैंक ने भी नीतिगत दरें घटाकर 5.15 फीसदी कर दी है। लेकिन गुत्थी यह है कि न तो उधार की दरों और न ही सरकार के दस साल के बांड की दरों ने उसका अनुसरण किया निर्विवाद रूप से आगे की राह दुष्कर है। संकट यह है कि जब समय अच्छा था, तब पहल नहीं की गई। जैसा कि महान कबीर ने कहा था, जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।
- लेखक आईडीएफसी इंस्टी. की विजिटिंग फेलो हैं।