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...खमेर रूज के जख्मों से उबरता कंबोडिया

Sun, 20 Sep 2015 02:05 PM IST
सुदीप ठाकुर/अमर उजाला, कंबोडिया से लौटकर
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जनवरी, 1993 में कंबोडिया के सिविल सेवा की एक युवा अधिकारी मोल्यका को राजधानी नोमपेन्ह के एक मुख्य चौराहे पर कुछ सैनिकों ने उस वक्त रोक दिया था, जब वह संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी की पत्नी के साथ अपनी कार से कहीं जा रही थीं।
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जब मोल्यका ने उन्हें बताया कि वह खुद एक अहम मंत्रालय में काम करती हैं, तो उसका भी असर उन पर नहीं हुआ। वह उनसे बिना वजह रिश्वत मांग रहे थे। उनके पास उस वक्त कुछ हजार रियाल ही थे! मगर वह इतने में राजी नहीं थे। उन्होंने मोल्यका से सिगरेट मांगी! और जब उन्हें एक सिगरेट भी नहीं मिली, तो वह उन्हें अपने साथ नजदीक की एक बिल्डिंग की ओर ले जाने लगे। आखिरकार एक अन्य अधिकारी के दखल से सैनिकों ने उन्हें छोड़ा।

1975 से 1978-79 के कुख्यात पोल पाट शासन की बर्बरता और फिर वियतनाम के हमले के बाद राजनीतिक उथल-पुथल, सैन्य यातना और बर्बादी के दौर से गुजर रहे कंबोडिया के इस वाकये को अमिताव घोष ने अपनी किताब डांसिंग इन कंबोडिया ऐंड अदर एसे में दर्ज किया है।
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संयुक्त राष्ट्र ट्रांजिशनल अथॉरिटी कंबोडिया (यूएनटीएसी) की देखरेख में कंबोडिया में मई, 1993 से कुछ महीने पहले ऐसे वाकये आम थे। मगर इसके विपरीत अब कंबोडिया पूरी तरह बदल चुका है। खमेर रूज शासन के दौरान नोमपेन्ह के जिस हाई स्कूल को कुख्यात यातनादायी जेल एस-21 (सिक्योरिटी प्रिजन) में बदल दिया गया था, वह अब तुओल स्लेंग जेनोसाइड म्यूजियम बन चुका है।

यह म्यूजियम कंबोडिया के जख्मों का प्रतीक भले हो, मगर दक्षिण पूर्व एशिया का यह देश अपनी एक पुरानी विरासत अंकोर वाट मंदिर के जरिये नई पहचान ही नहीं, आर्थिक मजबूती की राह भी तलाश रहा है। इसकी झलक करीब बीस लाख की आबादी वाले नोमपेन्ह की सड़कों से लेकर रेस्तरां और दुकानों और राष्ट्रीय स्मारकों तक में दिखाई देती है।

सरकारी मुद्रा रियाल और राष्ट्रीय ध्वज में तो अंकोर वाट के चित्र अंकित हैं ही; शैम्पू से लेकर बीयर तक के ब्रांड और रॉयल पैलेस से थोड़ी दूर ही स्थित नाइट मार्केट में बिकने वाली टी शर्ट से लेकर हर ऐसी चीज पर, जिसे बेचा जा सके, अंकोर वाट के चित्र नजर आते हैं।

राजधानी नोमपेन्ह से करीब साढ़े तीन सौ किमी दूर स्थित सिएम रीप में स्थित 12 वीं सदी में निर्मित यह परिसर दुनिया भर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। कंबोडिया और लाओस की यात्रा के दौरान भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी पिछले हफ्ते इस परिसर को देखने गए थे।

खमेर रूज शासन के दौरान यह परिसर उपेक्षित पड़ा हुआ था। पोल पाट के दौर में मानो पूरा देश ही यातना शिविर में तब्दील हो गया था। घनघोर कम्युनिस्ट विचारधारा और माओ त्से तुंग की क्रांति से प्रेरित बताने वाले पोल पाट और उसके साथियों ने 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लोन नोल का तख्ता पलट कर शिक्षित मध्यवर्ग को निशाना बनाना शुरू किया था। वहीं लाखों लोग गरीबी और बीमारी से मारे गए।

शहर से लोगों को जबर्दस्ती ग्रामीण इलाकों में भेजकर खेतिहर मजदूर बना दिया गया था। कंबोडिया की मुद्रा रियाल अपनी कीमत खो चुकी थी। खमेर रूज ने उस वर्ष को 'ईयर जीरो' घोषित कर दिया था, मानो सब कुछ वह फिर से शुरू करना चाहते थे।

नोमपेन्ह की सड़कों और बाजारों पर अब खमेर रूज दौर जैसा खौफ नहीं है। आज आप चाहें, तो कंबोडिया को फ्रांस की औपनिवेशिक दासता से मुक्ति के लिए प्रेरित करने वाले किंग नोरोडोम सिंहानूक की स्मृति में स्थापित स्मारक के नजदीक स्थित प्रधानमंत्री हुन सेन के आवास के सामने खड़े होकर तस्वीर खिंचवा सकते हैं। कोई सुरक्षाकर्मी आपको नहीं रोकेगा।

हुन सेन पिछले तीन दशक से कंबोडिया के प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने देश को राजनीतिक स्थिरता भले दी हो, लेकिन सात फीसदी की विकास दर के बावजूद कंबोडिया आज तक अपनी मुद्रा को नहीं संभाल सका है। आज भी इसकी कीमत एक डॉलर के मुकाबले 4,100 रियाल है। और दिलचस्प यह है कि यहां हर कोई रियाल के बजाय डॉलर में ही सौदा करना चाहता है।

मोटरसाइकिल या स्कूटर से जुगाड़ करके बनाए गए टुकटुक से यदि आप कंबोडिया की सत्ता का केंद्र माने जाने वाले 'पीस पैलेस' से कुछ किमी दूर स्थित तुओल स्लेंग जेनोसाइड म्यूजियम जाना चाहें, तो आपको पांच डॉलर यानी 20,500 रियाल तक खर्च करने पड़ सकते हैं! इस अंतर को कम करना हुन सेन की सबसे बड़ी चुनौती है।
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