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अमृत काल: क्या देश की आम जनता को सरकार के आमदनी-खर्च को समझने का अधिकार मिलेगा?

संदीप जोशी
Updated Sun, 19 Feb 2023 06:50 AM IST

सार

जिनका आम जनता से नाता नहीं रहा, वे ही आम आदमी का आमदनी-खर्च बनाते आ रहे हैं। अमृत काल में इस देश की आम जनता को क्या अपनी सरकार के आमदनी-खर्च को समझने का अधिकार भी मिलेगा?
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बजट देखते लोग (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला


केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने विगत एक फरवरी को अमृत काल को ध्यान में रखते हुए देश की आम जनता के लिए बजट पेश किया। संसद के अपने बजट भाषण में आम आदमी के मन की बात उन्होंने निर्भय निर्ममता से रख दी। बजट भाषण के दौरान वाहनों को बदलने या पुरानी गाड़ियों को बदलने की नीति के तहत वह प्रदूषित गाड़ियों को बदलने की बात कहना चाहती थीं। इसी प्रक्रिया में उनके मुंह से पॉल्यूटेड की जगह अचानक पॉलिटिकल निकल गया। उसका नतीजा यह हुआ कि संसद में उनके गंभीर बजट भाषण के बीच एकाएक ठहाके की सहजता पसर गई। इस बीच विपक्षी राजनीतिक पार्टियों की तरफ से जब विरोध और हो-हल्ला मचा, तब निर्मला सीतारमण ने कह दिया कि पॉलिटिकल पर भी यह लागू हो सकता है। क्या यह इस देश की जनता की आवाज नहीं थी, जो उसके ही सांसदों की संसद से निकली? क्या इस देश की जनता को भी पॉल्यूटेड पॉलिटिकल को रिप्लेस करने यानी उन्हें बदल देने का मन नहीं करता?


हम और आप यह तो जानते ही हैं कि केंद्र सरकार हर साल वित्तीय वर्ष के आमदनी और खर्च का ब्योरा देश की जनता के लिए संसद में पेश करती है। और इसका जिम्मा सरकार के वित्तमंत्री पर ही आता है। और यह भी सच है कि अमृत काल की ओर अग्रसर इस देश में अब भी आम जनता के आमदनी-खर्च का ब्योरा ऑक्सफोर्डियन अंग्रेजी और किताबी हिंदी में ही दिया जाता है। निर्मला सीतारमण के मनमुख से इसीलिए पॉल्यूटेड की जगह पॉलिटिकल शब्द निकल गया। आम जनता का इससे उतना ही लेना-देना है, जितना कि अपने लिए ऋषि सुनक का इंग्लैंड का प्रधानमंत्री होना है। इस देश के मध्यवर्ग को ध्यान में रखने के लिए बनाया बजट देश के मध्यवर्ग को कितना समझ में आया, इसका कोई ब्योरा ही नहीं मिला। क्या अमृत काल की ओर अग्रसर अपने देश की आर्थिक भाषा भी यही रहने वाली है? सरकार के आमदनी-खर्च का हिसाब-किताब क्या इतना मुश्किल होता है कि उसे इस देश की आम जनता समझ ही न पाए?


फिलहाल प्रासंगिक प्रश्न यह है कि इस देश की आम जनता के लिए उसकी आमदनी और खर्च का ब्योरा आम बोलचाल की भाषा में आखिर क्यों नहीं हो सकता है? क्या हमारे और आपके रोजमर्रा का आमदनी-खर्च इसी भाषा में होता है? इस पर अर्थशास्त्र के ज्ञानी कहने को यह भी कह सकते हैं कि दुनिया का बड़ा व्यापार चूंकि इसी भाषा यानी अंग्रेजी में चलता है, इसलिए वैश्विक होती दुनिया में हिंदुस्तान को भी वैश्विक होना पड़ेगा। यानी आर्थिक भाषा और अर्थ की बोली का मतभेद बना ही रहने वाला है। लेकिन फिर वैश्विक होते इंडिया में हिंदुस्तान की आम जनता का क्या होगा? क्या हिंदुस्तान की आम जनता विश्वगुरु बनने से वंचित रह जाएगी? तथ्य यह है कि पिछले पांच साल से वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण संसद में सरकार की आमदनी और खर्च का ब्योरा देती आ रही हैं। ऐसे में, इस बार ही उनके मनमुख से पॉलिटिकल का पॉल्यूटेड शब्द आखिर क्यों निकला? क्या ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि निर्मला सीतारमण इस देश की आम जनता को लगातार प्रदूषित होती राजनीति से आगाह करना चाहती हैं?


अमृत काल की प्रेरणा जगाने के लिए देश की आम जनता के सामने वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने सरकार द्वारा विचार किए जाने वाले कुल सात मुद्दे रखे। उन्हें सप्तऋषि नाम दिया गया। सुनने में बेहद प्रभावी लगने वाली यह शब्दावली अपने लक्ष्य में कितनी कारगर साबित होगी, यह तो खैर आने वाला साल ही बताएगा। विदेश में अर्थशास्त्र पढ़े वित्त मंत्रालय के अधिकारियों और सचिवालय के लोगों ने जो भाषा गढ़ी, या लिखी, आखिरकार वही भाषा निर्मला सीतारमण ने संसद में भाषित की। कटु सच्चाई यह है कि जिनका आम जनता से कभी कोई नाता नहीं रहा है, वे ही आम आदमी का आमदनी-खर्च बनाते आ रहे हैं। यही दरअसल अमीर देश के गरीब लोगों का दुर्भाग्य रहा है।


जिस हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था को दुनिया की अर्थव्यवस्था का चमकता सितारा लगातार कहा जा रहा है, उसमें क्या आम जनता के लिए ऐसा ही अंधेरा रहने वाला है? क्या यही पॉलिटिकल का प्रदर्शन है? या फिर अमृत काल में इस देश की आम जनता को अपनी सरकार के आमदनी-खर्च को समझने का अधिकार भी मिलेगा?     

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