इस बजट की अच्छी बात यह है कि कोई नुकसान यह नहीं पहुंचाता-अर्थव्यवस्था को यह कोई नया दर्द नहीं देता। लेकिन निराश करने वाली बात यह है कि अर्थव्यवस्था में पहले से व्याप्त दर्द दूर करने का इसने कम ही प्रयास किया है। इस दर्द से, जो विरासत में प्राप्त किए गए और जो बाद में घनीभूत हुए, मुक्ति के लिए साहसी कदम की जरूरत थी। अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति के मद्देनजर पुनर्जागरण के लिए उड़ान भरने की आवश्यकता थी। दोबारा मिले जनमत को देखते हुए सरकार के सामने एक दबंग बजट पेश करने का मौका था। बजट अलबत्ता यथास्थितिवाद में ही जकड़ा हुआ दिखा।
सरकार का आकार और उसका खर्च प्रबंधन एक ऐसी स्पष्ट समस्या है, जिस पर कोईं चर्चा नहीं करना चाहता। मौजूदा वित्त वर्ष में सरकार प्रतिदिन 7,633 करोड़ रुपये खर्च करेगी। जबकि उसके रोज की आमदनी 5,705 करोड़ रुपये होगी और उसके प्रतिदिन का कर्ज 1,928 करोड़ होगा, जो कि प्रति घंटे के हिसाब से 80 करोड़ बैठता है। और सरकार के खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में जाएगा, जो 1,809 करोड़ रुपये प्रतिदिन होगा।