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बजट और सरकारी बेताल का बोझ : सरकार के सामने एक दबंग बजट पेश करने का मौका था

शंकर अय्यर
Updated Tue, 09 Jul 2019 05:32 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : a

इस बजट की अच्छी बात यह है कि कोई नुकसान यह नहीं पहुंचाता-अर्थव्यवस्था को यह कोई नया दर्द नहीं देता। लेकिन निराश करने वाली बात यह है कि अर्थव्यवस्था में पहले से व्याप्त दर्द दूर करने का इसने कम ही प्रयास किया है। इस दर्द से, जो विरासत में प्राप्त किए गए और जो बाद में घनीभूत हुए, मुक्ति के लिए साहसी कदम की जरूरत थी। अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति के मद्देनजर पुनर्जागरण के लिए उड़ान भरने की आवश्यकता थी। दोबारा मिले जनमत को देखते हुए सरकार के सामने एक दबंग बजट पेश करने का मौका था। बजट अलबत्ता यथास्थितिवाद में ही जकड़ा हुआ दिखा।

सरकार का आकार और उसका खर्च प्रबंधन एक ऐसी स्पष्ट समस्या है, जिस पर कोईं चर्चा नहीं करना चाहता। मौजूदा वित्त वर्ष में सरकार प्रतिदिन 7,633 करोड़ रुपये खर्च करेगी। जबकि उसके रोज की आमदनी 5,705  करोड़ रुपये होगी और उसके प्रतिदिन का कर्ज 1,928 करोड़ होगा, जो कि प्रति घंटे के हिसाब से 80 करोड़ बैठता है। और सरकार के खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में जाएगा, जो 1,809 करोड़ रुपये प्रतिदिन होगा।



जो अर्थव्यवस्था अपने प्राप्त राजस्व का एक तिहाई हिस्सा ब्याज चुकाने में खर्च कर दे, वह भला किस तरह अपनी वृद्धि बरकरार रख सकती है? वर्ष 2014-15 के बजट में सरकार ने खर्च प्रबंधन को आधुनिक रूप देने का इरादा जताते हुए विमल जालान की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित करने की घोषणा की थी।

उस कमेटी की रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है और यह भी स्पष्ट नहीं है कि उसके किसी भी सुझाव को लागू किया गया है या नहीं। और विडंबना यह है कि 2018-19 में विमल जालान और राकेश मोहन को इस पर निर्णय करने के लिए अधिकृत किया गया कि रिजर्व बैंक के संचित कोष का कितना हिस्सा सरकार को स्थानांतरित किया जा सकता है। यहां तक कि उस लाभ की उम्मीद भी अब कितना और कैसे की बहस में लड़खड़ा गई है।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : a
इस बजट की अच्छी बात यह है कि कोई नुकसान यह नहीं पहुंचाता-अर्थव्यवस्था को यह कोई नया दर्द नहीं देता। लेकिन निराश करने वाली बात यह है कि अर्थव्यवस्था में पहले से व्याप्त दर्द दूर करने का इसने कम ही प्रयास किया है। इस दर्द से, जो विरासत में प्राप्त किए गए और जो बाद में घनीभूत हुए, मुक्ति के लिए साहसी कदम की जरूरत थी। अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति के मद्देनजर पुनर्जागरण के लिए उड़ान भरने की आवश्यकता थी। दोबारा मिले जनमत को देखते हुए सरकार के सामने एक दबंग बजट पेश करने का मौका था। बजट अलबत्ता यथास्थितिवाद में ही जकड़ा हुआ दिखा।

सरकार का आकार और उसका खर्च प्रबंधन एक ऐसी स्पष्ट समस्या है, जिस पर कोईं चर्चा नहीं करना चाहता। मौजूदा वित्त वर्ष में सरकार प्रतिदिन 7,633 करोड़ रुपये खर्च करेगी। जबकि उसके रोज की आमदनी 5,705  करोड़ रुपये होगी और उसके प्रतिदिन का कर्ज 1,928 करोड़ होगा, जो कि प्रति घंटे के हिसाब से 80 करोड़ बैठता है। और सरकार के खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में जाएगा, जो 1,809 करोड़ रुपये प्रतिदिन होगा।

जो अर्थव्यवस्था अपने प्राप्त राजस्व का एक तिहाई हिस्सा ब्याज चुकाने में खर्च कर दे, वह भला किस तरह अपनी वृद्धि बरकरार रख सकती है? वर्ष 2014-15 के बजट में सरकार ने खर्च प्रबंधन को आधुनिक रूप देने का इरादा जताते हुए विमल जालान की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित करने की घोषणा की थी।

उस कमेटी की रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है और यह भी स्पष्ट नहीं है कि उसके किसी भी सुझाव को लागू किया गया है या नहीं। और विडंबना यह है कि 2018-19 में विमल जालान और राकेश मोहन को इस पर निर्णय करने के लिए अधिकृत किया गया कि रिजर्व बैंक के संचित कोष का कितना हिस्सा सरकार को स्थानांतरित किया जा सकता है। यहां तक कि उस लाभ की उम्मीद भी अब कितना और कैसे की बहस में लड़खड़ा गई है।

जरूरी क्षेत्रों में कम फंडिंग संसाधनों के अभाव का ही नतीजा है। देश में सबसे अधिक रोजगार कृषि क्षेत्र देता है, पर जीडीपी में उसकी हिस्सेदारी 14 प्रतिशत से भी कम है। कृषि क्षेत्र का संकट नीतिगत सुधार और तकनीकी समाधानों में निवेश बढ़ाने की मांग करता है। हां, यह सच है कि कृषि क्षेत्र में आवंटन पिछले साल के 67,800 करोड़ से बढ़ाकर इस बार 1,30,450 करोड़ किया गया है-लेकिन इनमें से 75,000 करोड़ रुपये पीएम किसान योजना के तहत किसानों को आर्थिक मदद देने के लिए है।

जल अर्थव्यवस्था अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है। जल संसाधन विभाग का आवंटन बढ़ाकर 632.73 करोड़ किया गया है। पेयजल और स्वच्छता विभाग का आवंटन, जिसके पास ग्रामीण परिवारों तक पाइप से पानी पहुंचाने का लक्ष्य है, पिछले साल के 19,992.97 करोड़ से बढ़ाकर 20,106.34 करोड़ किया गया है-यानी इस बार आवंटन 23.37 करोड़ बढ़ा है। यह ठीक है कि पानी राज्यों का विषय है। लेकिन क्या इस योजना को मूर्त रूप दे पाने के लिए राज्यों के पास पर्याप्त संसाधन हैं?

विकास को गति मिलने पर ही जरूरी संसाधनों की गारंटी है। आर्थिक सर्वेक्षण में अंतरराष्ट्रीय अनुभव को सामने रखते हुए यह तर्क दिया गया कि विकास को बचत, निवेश और निर्यात के 'सटीक चक्र' के जरिये और जनसांख्यिकी के क्षेत्र में अपनी बेहतर स्थिति के कारण  बरकरार रखा जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि अपने नजरिये और आवंटन के आधार पर यह बजट भला नियम-कायदों का पालन करता हुआ कहां दिखाई देता है। भारी बचत और उच्च निवेश के 'सटीक चक्र' के लिए ऊंची मांग और उच्च उपभोग आवश्यक है।

मंदी जैसा यह माहौल धन के कारण है। जैसा कि नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री कैनेथ एरो प्रायः जोर देकर कहते हैं कि अर्थव्यवस्था को जंग लगने से बचाने के लिए धन और कर्ज रूपी तेल की जरूरत पड़ती है। किसी को रखने, कोई चीज खरीदने या उत्पादन करने के लिए खर्च करना पड़ता है। खर्च और आमदनी के बीच के अंतराल को कर्ज से पाटा जाता है। लेकिन बैंक-जो कर्ज को एकत्रित करते हैं, और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों-जो उपभोग के लिए कर्ज देने की नलिकाएं हैं, की गाड़ी तरलता और ऋण शोधन क्षमता के बीच रुकी पड़ी है।

ऐसा भी नहीं है कि वित्तीय क्षेत्र की बिगड़ी हुई स्थिति के बारे में जानकारी नहीं है। बल्कि बजट तो उस बदहाली का ही स्वीकार है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को एनबीएफसी से ऊंची दर वाली संपत्ति खरीदने की सरकारी गारंटी बजट में दी गई, जबकि कर्ज देने का मामला पहले से ही चिंताजनक स्थिति में है। बेशक बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 70,000 करोड़ रुपये का आवंटन है, जो अच्छा है, लेकिन पर्याप्त नहीं है।

बजट में सोवेरन बांड के विचार पर बहुत तालियां बजीं-जबकि तथ्य यह है कि विदेशी निवेशकों के पास पहले से ही इसका अवसर है और वे इससे मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। ठीक है कि यह निजी कर्ज के लिए अवसर मुहैया कराएगा, लेकिन सरकार के रुपये में होने वाले खर्च और घाटे की फंडिंग के लिए डॉलर जुटाने से समस्याएं पैदा होंगी।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पांड्य राजा (प्राचीन तमिल राजवंश) के सुकवि पिसिरंदय्यर द्वारा दी गई सलाह को उद्धृत करते हुए कहा,' जमीन के एक छोटे से टुकड़े में पैदा हुए चावल के कुछ ढेर एक हाथी के लिए पर्याप्त हैं, लेकिन जब वह हाथी खेत में घुसकर खुद ही धान खाने लगे, तो क्या होगा?' तथ्य यह है कि वह हाथी, जो कि मौजूदा परिप्रेक्ष्य में सरकार है,  यही कर रहा है। वर्ष 2024 तक पचास खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य भी आखिरकार सरकारी खर्च में कुशलता के आधार पर ही पूरा होगा।             
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