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जब आवंटन का बड़ा हिस्सा खर्च ही न हो: स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण में कम उपयोग, विकास मॉडल पर उठते सवाल

पत्रलेखा चटर्जी
Updated Tue, 17 Feb 2026 08:05 AM IST

सार

कई राज्यों में धन बांटने में नौकरशाही की देरी और विकेंद्रीकृत फैसले लेने की सीमित क्षमता की वजह से समय पर हस्तक्षेप करने में रुकावट आती है। कुशल श्रमिकों और बुनियादी ढांचों की कमी मिशन के लक्ष्यों को कमजोर करती है, जिससे सुधार की जरूरत पर बल पड़ता है।
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बजट 2026 - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


वर्ष 2026-27 के बजट में, पूंजीगत खर्च को विकास का मुख्य इंजन माना गया है, जबकि राजस्व में धीमी वृद्धि हो रही है और ब्याज भुगतान कुल खर्च का लगभग एक-चौथाई और राजस्व प्राप्ति का 40 फीसदी हिस्सा ले रहा है। सामाजिक क्षेत्र का खर्च एक दशक से ज्यादा समय में जीडीपी के दूसरे सबसे निचले हिस्से पर आ गया है (मात्र 2.5 प्रतिशत), जो मोदी सरकार के 2014-15 के पहले बजट से भी कम है। जैसा कि अवनी कपूर और शरद पांडे जैसे विश्लेषकों ने पाया कि मामूली बढ़ोतरी अक्सर लंबे समय से कम इस्तेमाल को छिपा देती है, जिसमें खास मंत्रालय अक्सर आवंटन का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं कर पाते हैं। कोई भी बुनियादी ढांचों में निवेश के खिलाफ नहीं है। पर यह समझना जरूरी है कि अचानक आने वाले झटकों (आर्थिक मंदी, जलवायु से जुड़ी घटनाएं, स्वास्थ्य संकट) के दौर में स्वास्थ्य, शिक्षा व सामाजिक क्षेत्र में लगातार निवेश से मजबूती आती है और झटकों का असर कम होता है।


मिशन पोषण 2.0 कई राज्यों में हुई तरक्की की झलक दिखाता है। पोषण ट्रैकर बच्चों के विकास और कुपोषण की रियल-टाइम निगरानी करता है, और डाटा के आधार पर बदलाव लाने में मदद करता है। फिर भी कमियां बनी हुई हैं। स्वीकृत कोष का कम इस्तेमाल होने का मतलब सिर्फ गरीब बच्चों को प्रोटीन की कमी वाला खाना देना ही नहीं है, बल्कि इसका मतलब है कि स्वास्थ्य क्लीनिक और बाल देखभाल केंद्र में बुनियादी सुविधाओं की कमी वाले पद खाली हैं। एक मार्च, 2025 के पोषण ट्रैकर डाटा के अनुसार, 13.99 लाख चालू आंगनवाड़ियों में से मात्र 12,47,334 केंद्रों में ही पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध है, और केवल 10,14,678 में शौचालय चालू हैं, जिससे लगभग 27.5 फीसदी केंद्र (3.85 लाख) में शौचालय काम नहीं करते। कई राज्यों में धन बांटने में नौकरशाही की देरी और विकेंद्रीकृत फैसले लेने की सीमित क्षमता की वजह से समय पर हस्तक्षेप करने में रुकावट आती है। कुशल श्रमिकों और बुनियादी ढांचों की कमी-जैसे कि ठीक से सुविधाएं नहीं मिलना, ठीक से काम न करने वाले शौचालय, और साफ पानी तक पहुंच न होना-मिशन के लक्ष्यों को कमजोर करते हैं, जिससे सुधार की जरूरत पड़ती है।


जन स्वास्थ्य अभियान (जेएसए) के कार्यकर्ता अमूल्य निधि एक कड़वी सच्चाई बताते हैं: ‘जो राशि मंजूर होती है और जो खर्च हो रही है, उसमें बहुत फर्क है।’ वह कहते हैं कि खराब पोषण से कुपोषण और टीबी जैसी बीमारियां बढ़ती हैं। जेएसए के एक बयान में कहा गया है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग व स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग द्वारा स्वीकृत प्रावधानों के इस्तेमाल पर ऑडिट की टिप्पणियों से पता चलता है कि कोई भी वित्त वर्ष ऐसा नहीं रहा, जिसमें पूरी राशि खर्च हुई हो। इस तरह लगातार कम खर्च सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को कमजोर करता है। वित्त वर्ष 2019-20 से वित्त वर्ष 2023-24 तक के पांच साल में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 1,32,749 करोड़ रुपये लौटा दिए। वर्ष 2026-27 के बजट में स्वास्थ्य आवंटन में बढ़ोतरी का अनुमान है, जो नई प्रतिबद्धता का संकेत देता है। फिर भी, जीडीपी के हिस्से के तौर पर स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च लगभग 0.29 फीसदी (2024-25 और 2025-26) से 0.31 फीसदी (2023-24) पर स्थिर है, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के 2.5 फीसदी के लक्ष्य से बहुत कम है। इसने देश के बड़े हिस्सों में सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचों, मानव संसाधन और जरूरी सेवाओं को खत्म कर दिया है।


अब विकास के दूसरे स्तंभ शिक्षा की बात करते हैं। ताजा आर्थिक सर्वे में साक्षरता दर में बढ़ोतरी, स्कूलों एवं उच्च शिक्षा में नामांकन में वृद्धि और व्यावसायिक मौके देने जैसी उपलब्धियों का जिक्र है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (एनईपी) ने अच्छी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच बढ़ाई है और समता एवं नवाचार को बढ़ावा दिया है। इसमें इस बात पर बल दिया गया है कि स्कूली शिक्षा को मजबूत करना भारत के भविष्य की खुशहाली, उत्पादकता और नेतृत्व में निवेश है। भारत को एक मजबूत जनसांख्यिकी का लाभ मिला हुआ है: वर्ष 2024 में, लगभग 27 फीसदी आबादी स्कूल जाने वाले आयु वर्ग (3-18 वर्ष) में, और 2047 तक यह समूह 20 फीसदी से भी अधिक होगा। पर इसके बावजूद, भारत का शिक्षा सूचकांक (संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक का हिस्सा) मामूली बना हुआ है, जिसका मुख्य कारण दुनिया भर के देशों की तुलना में भारत में कम समय तक स्कूली पढ़ाई होती है। हालांकि, शुरुआती स्तर पर नामांकन में सुधार हुआ है, लेकिन सेकंडरी एज-स्पेसिफिक नेट एनरोलमेंट रेट (एनईआर) 52.2 फीसदी पर बना हुआ है, जो कम है और आठवीं के बाद छात्रों को बनाए रखने की जरूरत को दर्शाता है। एक मुख्य मुद्दा स्कूलों का असमान वितरण है: 54 फीसदी स्कूल सिर्फ आधारभूत-प्रारंभिक शिक्षा देते हैं, जबकि सिर्फ 17.1 फीसदी ग्रामीण इलाकों में माध्यमिक शिक्षा देते हैं (शहरी इलाकों में 38.1 फीसदी की तुलना में)। यह असमानता ग्रामीण छात्रों की उच्च-स्तरीय कक्षाओं तक पहुंच को सीमित करती है, जिसके कारण, संक्रमण हानि, यात्रा समय में वृद्धि, और उच्चतर स्कूल छोड़ने की दर बढ़ती है।


भारत ने अपनी मातृत्व मृत्यु दर (एमएमआर) को 86 फीसदी तक कम किया है, जो दुनिया के औसत 48 फीसदी से कहीं अधिक है। इसी तरह, इसने पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में 78 फीसदी की कमी हासिल की, जो दुनिया के औसत 61 फीसदी से अधिक है, और नवजात मृत्यु दर में 70 फीसदी की कमी आई है, जबकि 1990-2023 के दौरान दुनिया भर में यह 54 फीसदी थी, जैसा कि इकनॉमिक सर्वे में बताया गया है। लेकिन मां और बच्चे की सेहत में इन फायदों को मजबूत करना, साथ ही बुजुर्गों और पुरानी बीमारियों की देखभाल के लिए कोशिशें बढ़ाना, जनसांख्यिकीय वास्तविकता से मेल खाने के लिए बहुत जरूरी होगा। दिल की बीमारियों का अधिक होना, लैंगिक जोखिम और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच पर ध्यान देते हुए, लक्षित रोकथाम व प्रबंधन की जरूरत को भी दर्शाता है।    
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