हमारी सामूहिक चेतना को झकझोर देने वाली यह घटना एक समाज के तौर पर हमारी नाकामी को भी दिखाती है और जवाबदेहियों से जुड़े सवाल भी खड़े करती है। बेशक, पति-पत्नी के बीच संबंध एक निजी मामला है, लेकिन क्या सब कुछ इतना यांत्रिक हो चुका है, जिसमें मानवीय संवेदना के लिए समाज और घर में कोई जगह ही नहीं बची है? अगर हत्या की नौबत आ गई, तो जाहिर है कि गुरुमूर्ति और माधवी में पहले भी लड़ाइयां होती रही होंगी। जहां ये लोग रह रहे थे, वहां आसपास के लोगों को भी अब तक कोई भनक नहीं लगी, आज तक किसी ने आवाज नहीं उठाई; आखिर हम किस तरह का एकाकी जीवन जी रहे हैं।
कारण चाहे जो हो, इस घटना से यही जाहिर होता है कि समाज को आत्मचिंतन करने की जरूरत है। घरेलू हिंसा और पारिवारिक तनाव के बढ़ते मामलों के बीच, हमें यह समझने की जरूरत है कि इनका समाधान केवल कड़े कानूनों से नहीं हो सकता। एक समाज के तौर पर हमें घरेलू हिंसा के मामलों को गंभीरता से लेना होगा, भले ही वह अपने नहीं, बल्कि पड़ोस के घर की बात हो। यह अत्यंत आवश्यक है कि माधवी की हत्या का मामला निर्णायक परिणति तक पहुंचे और हत्यारे को ऐसी सजा मिले, जो नजीर बन सके।