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पारिस्थितिकी : वानिकी क्षेत्र में हो सकती है 'भूरी क्रांति', घट जाएगी लकड़ी के आयात पर निर्भरता

रमेश चंद, सदस्य, नीति आयोग Published by: देव कश्यप Updated Sat, 01 Apr 2023 06:47 AM IST

सार

'परती भूमि, कृषि योग्य बंजर भूमि और खेत की सीमाओं पर पेड़ उगाने की अपार संभावनाएं हैं। इससे लकड़ी के आयात पर निर्भरता घटेगी।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay


बकि वानिकी के उत्पादन में प्रति वर्ष महज 0.54 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई। वानिकी क्षेत्र की यह वृद्धि जनसंख्या में होने वाली वृद्धि दर का एक तिहाई भी नहीं है। आर्थिक और पारिस्थितिकी की दृष्टि से इसके बेहद गंभीर नतीजे हुए। देश में उत्पादित लकड़ी एवं लकड़ी के उत्पादों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में भारी गिरावट आई और भारत को लकड़ी व लकड़ी के उत्पादों की घरेलू मांग के बड़े हिस्से को आयात के माध्यम से पूरा करना पड़ा। वानिकी में मामूली वृद्धि का सीधा अर्थ पर्यावरण और पारिस्थितिकी के अनुकूल उत्पादन में कम वृद्धि भी है। कार्बन प्रच्छादन, जल संतुलन और प्राकृतिक इकोसिस्टम की सेहत की दृष्टि से इसके दूरगामी प्रभाव हैं।


वानिकी का उत्पादन तीन स्रोतों पर निर्भर है। ये स्रोत हैं- सार्वजनिक वन, निजी स्वामित्व वाली भूमि और केंद्र एवं राज्यों, पंचायतों, समुदायों आदि के स्वामित्व वाली अन्य प्रकार की भूमि। विभिन्न कारणों से लकड़ी एवं लकड़ी आधारित उत्पादों के निष्कर्षण और लकड़ी आधारित उद्योग की स्थापना की प्रक्रिया वन संरक्षण अधिनियमों तथा विभिन्न विनियमों द्वारा कड़ाई से विनियमित की जाती है। भारत में वन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली कुल भूमि 234 लाख हेक्टेयर है। कुल कृषि योग्य भूमि में से 260 लाख हेक्टेयर भूमि परती पड़ी रहती है। यह देश में वन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली कुल भूमि से अधिक है। भारत में 120 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य बंजर भूमि भी उपलब्ध है। परती भूमि, कृषि योग्य बंजर भूमि और खेत की सीमाओं पर पेड़ उगाने की अपार संभावनाएं हैं।


कुछ वर्ष पहले तक वन क्षेत्र से बाहर निजी भूमि पर उगने वाले पेड़ों की कटाई पर सख्त प्रतिबंध था। एक राज्य से दूसरे राज्य में उन्हें ले जाने के लिए ट्रांजिट परमिट की आवश्यकता होती थी। इससे निजी भूमि पर प्राकृतिक रूप से उगने वाले पेड़ों का अस्तित्व जोखिम में पड़ गया। इस बीच देश में वृक्षारोपण को  बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय वन नीति, 1988 और राष्ट्रीय कृषि वानिकी नीति, 2014 लागू की गई। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 18 नवंबर, 2014 को राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को 'वन क्षेत्र से बाहर निजी भूमि पर उगाई जाने वाली वृक्ष प्रजातियों के लिए कटाई और पारगमन नियमन' के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए। इन दिशा-निर्देशों में पेड़ों की कटाई के लिए किसी भी प्रतिबंध से मुक्त प्रजातियों की सूची और निजी भूमि पर उगने वाले वृक्षों की प्रजातियों के लिए उदार पारगमन नियम का स्पष्ट उल्लेख किया गया।


फिर इस मामले को नीति आयोग द्वारा कृषि व संबद्ध क्षेत्रों से संबंधित सुधारों के एक भाग के रूप में उठाया गया। कुछ राज्यों ने केंद्र द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए अपनी ओर से अधिसूचनाएं जारी कीं। किंतु, अधिकांश राज्यों में इनका सक्रियतापूर्वक अनुपालन नहीं किया गया। निजी भूमि पर उगाए गए पेड़ों की कटाई और पारगमन पर प्रतिबंधों को सीमित तौर पर उदार बनाए जाने से वानिकी के उत्पादन में वृद्धि होने के साथ-साथ लकड़ी व लकड़ी के उत्पादों के आयात में काफी कमी हुई। निजी भूमि पर उगाई जाने वाली वृक्ष प्रजातियों की कटाई पर प्रतिबंध में छूट की अधिसूचना के एक साल बाद वन क्षेत्र का उत्पादन लगातार तीन वर्षों के लिए पांच फीसदी से अधिक वार्षिक वृद्धि दर्शाता है। 1950-51 से ऐसा कभी नहीं हुआ।


पेड़ों की विभिन्न प्रजातियों के त्वरित और बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पादन हेतु अब तकनीकी विकल्प उपलब्ध हैं। हालांकि, विभिन्न प्रकार के विनियामक प्रतिबंधों के कारण पेड़ों की विभिन्न प्रजातियों के बाजार बेहद अविकसित हैं। यदि इन बाधाओं को हटा दिया जाए, तो कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के अन्य तीन उप-क्षेत्रों की तरह ही वानिकी क्षेत्र में भी 'भूरी क्रांति' की अपार संभावनाएं हैं।

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