फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जड़ों से टूटता समाज

Tue, 04 Jun 2013 10:49 PM IST
अनुपम मिश्र
विज्ञापन
विज्ञापन
हमारे आसपास कुछ शब्द ऐसे हैं कि वे हमारा पीछा ही नहीं छोड़ते। क्या-क्या नहीं किया हमने उन शब्दों से पीछा छुड़ाने के लिए। आजाद होने के बाद तो इस कोशिश में हमने पंख ही लगा दिए थे। हमने पंख खोले, पर शायद आंखें मूंद लीं।
विज्ञापन


अब एक लंबी उड़ान शायद पूरी हो चली है और हमें वे सब शब्द याद आने लगे हैं, जिनसे हम पीछा छुड़ाकर उड़ चले थे। अभी हम जमीन पर उतरे भी नहीं हैं, लेकिन हम तड़पने लगे हैं, अपनी जड़ों को तलाशने।

विकसित होता जा रहा हमारा समाज तो अपनी जड़ों से कटकर खुद को पहले से भी ज्यादा हरा मानने लगा है। और फिर वह अपने इस नए हरेपन पर इतना ज्यादा इतराता है कि आज के अलावा अपने कल को, सभी चीजों को उसने एकदम पिछड़ा, दकियानूस मान लिया है। कल की यह सूची बहुत लंबी है। इसमें भाषा है, विचार है, परंपराएं हैं, पोशाक है, धर्म है, कर्म भी है।
विज्ञापन


सबसे पहले भाषा को ही देखें। भाषा में अगर हम किसी तरह की असावधानी दिखाते हैं, तो हम व्यवहार में भी असावधान होने लगते हैं।

उदाहरण देखें- हिंदी में उदार शब्द बड़े ही उदात्त अर्थ लिए है। शुभ शब्द है। लेकिन इस नई व्यवस्था ने इस इतने बड़े शब्द को एक बेहद घटिया काम में झोंक दिया है। इसे आर्थिक व्यवस्था से जोड़कर अंग्रेजी के अनुवाद से एक नया शब्द बनाया गया है - उदारीकरण। जब मन उदार बन रहा है, सरकार उदार बन रही है, अर्थ-व्यवस्था उदार हो चली है तब काहे का डर भाई। मन में कैसा संशय?

उदार का विपरीत है, कंजूस, कृपण, झंझटी, संकीर्ण। तो क्या इस उदारीकरण से पहले की व्यवस्था कंजूसी की थी? संकीर्णता की थी? वह दौर किनका था? वह तो अच्छे माने गए नेतृत्व का दौर था- नेहरूजी, सरदार पटेल जैसे लोगों का था।

आधुनिक दौर में, अपनी जड़ों से कट कर हमने जो विकास किया, उसके बुरे नतीजे तो चारों तरफ बिखरे पड़े हैं। ढका हुआ भूजल, खुले बहते नदियों-तालाबों का पानी और समुद्र तक बुरी तरह गंदा हो चुका है। विशाल समुद्रों में हमारी नई सभ्यता ने इतना कचरा फेंका है कि अब अंतरिक्ष से टोह लेने वाले कैमरों ने अमेरिका के नक्शे बराबर प्लास्टिक के कचरे के एक बड़े ढेर के चित्र लिए हैं। सूक्ष्म संकेतों को यहीं छोड़ वापस उदारीकरण की तरफ लौटें।

हमारे बीच जो भी नई व्यवस्था या विचार आते हैं, वे हर पंद्रह-बीस वर्षों में अपना मुंह किसी और दिशा में मोड़ लेते हैं। अभी कुछ ही बरस पहले दुनिया के किसी एक पक्ष ने हमें यह पाठ पढ़ाया कि राष्ट्रीयकरण बहुत ऊंची चीज है। हमने वह पाठ तोते की तरह पढ़ा, फिर रट लिया उसे।

आगे-पीछे नहीं सोचा और देश में सब चीजों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। राष्ट्रीयकरण में ऐसा कुछ नहीं था कि उसके नीचे जो कुछ भी डाला जाएगा, वह सब ठीक हो जाएगा। खूब प्रशंसा हुई, तालियां बजीं। कुछ नेता एकाध चुनाव भी जीत गए होंगे।

फिर इससे काम चला नहीं। समस्याएं तो हल हुई नहीं, तो फिर एक नई दिशा पकड़ ली। सरकार की सब चीजें निजी हाथों में सौंप देने का दौर आ गया। पर इसे बाजारीकरण नहीं कहा गया। नाम रखा उदारीकरण। किसी ने भी यह नहीं कहा कि यह तो उधार में लिया गया हल है।

अपनी जड़ों से कटे इस नए विकास ने बहुत से चमत्कार कर दिखाए हैं। निस्संदेह आज कुछ करोड़ हाथों में मोबाइल फोन हैं, लाखों कंप्यूटर हैं, लोगों की टेबलों पर और गोद में भी। अब तो हाथ में भी टैबलेट हैं। इन माध्यमों से पूरी दुनिया में तो बातें हो सकती है, पर बगल में बैठे व्यक्ति से संवाद टूट गया है। इस विकास ने महाराष्ट्र में आधुनिक सिंचाई की योजनाओं पर सबसे ज्यादा राशि खर्च की है। आज उसी महाराष्ट्र में सबसे बुरा अकाल पड़ रहा है।

ऐसी विचित्र भगदड़ में फंसा समाज अपनी जड़ों को खोज पाएगा, उनसे जुड़ पाएगा, ऐसी उम्मीद रखना बड़ा कठिन काम है। लेकिन ये शब्द हमारा पीछा आसानी से नहीं छोड़ने वाले। जड़ें शायद छूटेंगी नहीं। दबी रहेंगी मिट्टी के भीतर। ठीक हवा-पानी मिलने पर वे फिर से हरी हो सकेंगी और उनमें नई कोंपलें भी फूट सकेंगी। हमें अपने को उस क्षण के लिए बचाकर रखना होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें