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चूर-चूर हो गया रामानुज का अहं

Fri, 26 Jul 2013 08:26 PM IST
शिवकुमार गोयल
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रामानुज शास्त्रों के परम ज्ञाता और भावुक भगवद्भक्त थे। युवावस्था में वह शास्त्रों का अध्ययन किया करते थे। वह प्रतिदिन मंदिर की परिक्रमा करते और भगवान की साधना में घंटों लीन रहते थे।
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पहले की तरह वह एक दिन मंदिर पहुंचे और तमिल में रचा गया भगवद्भजन गाते-गाते उसकी परिक्रमा में लग गए। अचानक मैले-कुचैले वस्त्र पहने एक महिला उनके सामने आ गई। न जाने कैसे, रामानुज का अहंकार उन पर हावी हो गया। उन्हें लगा कि यह महिला बिना नहाए-धोए आई होगी। स्नान करके आए एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण युवक के आगे-आगे उसे नहीं चलना चाहिए।


वह क्रोध में भरकर बोले, मार्ग को क्यों अपवित्र कर रही हो? दूर हटो यहां से।
रामानुज के शब्द सुनते ही महिला ठिठककर खड़ी हो गई। धीरे से उसने कहा, आप पवित्र हैं, भगवान का यह मंदिर पवित्र है, भक्तों के चरणों के कारण इस मार्ग की धूल भी पवित्र हो गई है, फिर मैं अपनी अपवित्रता लेकर कहां जाऊं, आप ही बताएं?
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महिला के शब्दों ने रामानुज को झकझोर डाला। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, मां तू ठीक कहती है। वास्तव में मैंने तुझ जैसी निश्छल स्त्री को अपवित्र कहकर घोर अधर्म किया है। मैं तेरी भक्ति की पवित्रता को नहीं पहचान पाया। तूने तो मेरे मन व हृदय की अपवित्रता ही दूर कर दी। मुझे माफ कर दो।
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