दुष्ट आत्माओं ने एक बार धर्मराज से शिकायत की कि वे खंडहरों में रहती हैं, जबकि अच्छी आत्माएं शानदार महल में। हम सभी परमात्मा की संतान हैं, तो फिर यह भेदभाव क्यों? धर्मराज ने कुछ देर सोचा और सभी आत्माओं को बुलाकर कहा, दुष्ट आत्माओं के अनुरोध पर यह व्यवस्था की गई है कि सभी तरह की आत्माओं को रहने के लिए जो महल या खंडहर दिए गए हैं, वे सब नष्ट किए जा रहे हैं, और अच्छी तथा दुष्ट, दोनों तरह की आत्माएं अपने-अपने लिए अलग शहरों का निर्माण करेंगी।
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उन्होंने आगे कहा, इस निर्माण कार्य के लिए संसाधन की व्यवस्था इस तरह की गई है कि जब भी पृथ्वी पर कोई इंसान सच या झूठ बोलेगा, तो यहां बदले में ईंटें तैयार हो जाएंगी। सभी ईंटें मजबूती में एक समान होंगी। इसलिए अब आत्माओं को यह तय करना है कि वे सच बोलने पर बनने वाली ईंटें लेंगी या झूठ बोलने पर।
दुष्ट आत्माओं ने सोचा, पृथ्वी पर झूठ बोलने वाले लोगों की संख्या ज्यादा है, इसलिए अगर उन्होंने झूठ बोलने पर बनने वाली ईंटें ले लीं, तो एक विशाल शहर बन सकता है। और उन्होंने धर्मराज से झूठ बोलने पर बनने वाली ईंटें मांग ली। दोनों शहर बनने शुरू हुए। दुष्ट आत्माओं का शहर तेजी से बनने लेने लगा, क्योंकि उन्हें लगातार ईंटों के ढेर मिलते थे। जबकि अच्छी आत्माओं का निर्माण कार्य धीरे-धीरे चल रहा था।
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कुछ दिन ऐसे ही बीते, फिर एक दिन दुष्ट आत्माओं के शहर से ईंटें अचानक गायब होने लगीं। ईंटें गायब होने के कारण कुछ ही समय में महल खंडहर-सा दिखने लगा। परेशान आत्माएं तुरंत धर्मराज के पास भागीं और इसका कारण पूछा। धर्मराज थोड़ी देर मुस्कराए और फिर बोले, जिन लोगों ने झूठ बोला था, उनका झूठ पकड़ा गया, इसीलिए उनके झूठ बोलने से बनी ईंटें भी गायब हो गईं।