कहानी मणिपुर में ईटानगर के एक कस्बे मालोम के बस स्टैंड से वर्ष 2000 के दो नवंबर को शुरू हुई थी, जहां बस का इंतजार करते 10 जिंदा लोगों को खून में तड़पता छोड़कर फौजी दल रवाना हो गया था और अट्ठाईस साल की एक साधारण-सी मणिपुरी लड़की हैरान यह पूछती ही रह गई थी कि यह क्या हुआ और क्यों हुआ? उस दिन से आज तक वह लड़की यही सवाल पूछती आई है। हमारे लोकतंत्र ने सोलह वर्षों तक उसके सवालों का कोई जवाब नहीं दिया! लोकतंत्र जब गूंगा और बहरा हो जाता है, तब वह इंसान की बनाई सबसे दुर्दांत व्यवस्था में बदल जाता है। तब उसका चेहरा उस आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर ऐक्ट जैसा हो जाता है। गुलाम भारत को काबू में रखने के लिए बनाए गए इस कानून को आजाद भारत के कई हिस्सों में लागू कर फौज और दूसरे सैन्य संगठनों को ऐसे अंधाधुंध अधिकार दे दिए गए हैं कि नागरिक एकदम असहाय रह गया है।
वह लड़की, इरोम चानू शर्मिला आज चवालीस साल की महिला है। वह चाहती बस इतना ही है कि हमारा लोकतंत्र अपने लोक की बात सुने और उसके सवालों के जवाब दे। वह इन सोलह वर्षों में सोलह बार भी बोली नहीं है, सोलह जगहों पर भी गई नहीं है और सोलह प्रेस बयान भी नहीं दिए हैं। मौन की ऐसी मुखरता कहां देखी थी हमने! सोलह वर्षों से वह अनशन पर है-इस दौरान अपने हाथ से, अपनी पसंद का कोई खाना उसने खाया नहीं है। सोलह वर्षों से उसे सरकारी खाना खिलाया जाता रहा है, जो नाक में डाली एक नली से उसके भीतर उड़ेल दिया जाता रहा है। सोलह साल पहले उस पर आरोप लगा कि वह आत्महत्या करना चाहती है, जबकि संविधान कहता है कि आत्महत्या अपराध है, इसलिए सोलह वर्षों से रोज-रोज उसकी हत्या की जाती रही है। सोलह साल पहले मणिपुर की राजधानी इंफाल के सरकारी अस्पताल के एक कमरे को जेल में तब्दील कर शर्मिला को वहां कैद कर दिया गया। लेकिन आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर ऐक्ट नहीं हटाया गया।
जब कहीं से कोई हाथ नहीं बढ़ा, तब सर्वोच्च न्यायालय की आवाज उठी। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के मुताबिक, मणिपुर समेत देश के किसी भी अशांत-असुरक्षित इलाके में कानून-व्यवस्था के नाम पर फौज-सुरक्षा बल मनमानी नहीं कर सकते, और वे जो भी करेंगे, उसकी अदालती जवाबदेही से वे नहीं बच सकते। शर्मिला ने इस फैसले के तुरंत बाद घोषणा कर दी कि वह अपना अनशन तोड़ रही है और लोकतंत्र के आंगन में पांव धरने जा रही है। उसने कहा है कि वह अब सामान्य जिंदगी जीएगी, अपने ब्रिटिश प्रेमी-सहयोगी डेसमांड काउटिन्हो से शादी करेगी और चुनाव लड़ेगी। लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया में उतरने की उसकी घोषणा में बड़ी संभावनाएं छिपी हैं। यह चुनावी-संसदीय तंत्र निष्प्राण और संभावनाहीन हो चुका है। पर शर्मिला, मेधा पाटकर जैसे लोग इसके भीतर जाते हैं, तो एक दूसरे तरह की संभावना आकार लेती है।
शर्मिला को लेकिन फूंक-फूंककर कदम उठाने चाहिए। उसे मणिपुर में अपना राजनीतिक दल बनाना चाहिए और उनकी अपनी कसौटी पर खरे उतरने वाले नए चेहरों को सामने लाना चाहिए। अपने मौन संघर्ष के लंबे काल में उन्होंने सत्ता के खोजी एक राजनीतिज्ञ से कहीं ज्यादा बड़ी विश्वसनीयता कमाई है। उनका कद आज चुनावी जीत-हार से कहीं बड़ा है। भारतीय लोकतंत्र को भी और मणिपुर को भी ऐसे कद की सख्त जरूरत है।