भारत-पाकिस्तान के बीच संस्कृति के साथ ही दो और चीजें भी साझा हैं- प्यार और घृणा। सीमा के दोनों तरफ बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो एक-दूसरे के साथ अमन चैन के साथ रहना चाहते हैं, वहीं ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है, जो दूसरी तरफ के नागरिकों को दुश्मन मानते हैं। ऐसे लोग प्रशासन में भी हैं और सेना में भी। दोनों देशों के बीच हुई तीन-तीन लड़ाइयों और विवादों ने अविश्वास का ऐसा कुहरा बढ़ा दिया है कि नागरिकों का एक वर्ग दूसरी तरफ के अपने जैसे ही लोगों को दुश्मन और कई बार जासूस तक मानने लगता है।
पाकिस्तान की जेल में बंद बहुचर्चित सरबजीत सिंह की कैद की जिंदगी पर पाकिस्तानी वकील अवैस शेख की पुस्तक 'सरबजीत सिंह की अजीब दास्तान' दोनों तरफ जारी इस अविश्वास के कुहरे की तरफ इशारा ही नहीं करती, बल्कि सरबजीत सिंह की बेकसूरी और उनके साथ पाकिस्तान में हुई नाइंसाफी की कहानी को परत-दर-परत खोलती है। जब दोनों तरफ अविश्वास के घने कोहरे के बीच पाकिस्तानी नागरिकों के बीच, वहां के प्रशासन और पुलिस की सरबजीत को खतरनाक और चालबाज जासूस साबित करने की कोशिश कामयाब रही हो, ऐसे हालात में सरबजीत का मुकदमा लड़ने की हिम्मत वाकई कोई जिगर वाला पाकिस्तानी नागरिक ही उठा सकता है।
लेकिन अवैस शेख ने यह जिगर दिखाया, इसके लिए उन्हें देशद्रोही तक माना जाने लगा। लेकिन वे सरबजीत को निर्दोष साबित करने की अपनी लड़ाई में जुटे रहे। लेकिन सरबजीत की जगह पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने सुरजीत को रिहा कर दिया। अवैस शेख को उम्मीद है कि मार्च तक सरबजीत को पाकिस्तान सरकार रिहा कर देगी। उनका मानना है कि इस बेगुनाह नागरिक की रिहाई के बाद दोनों देशों के रिश्ते और बेहतर होंगे। इसी किताब से पता चलता है कि जिस मामले में सरबजीत को फांसी की सजा हुई है, उसकी एफआईआर में सरबजीत का नाम ही नहीं है, बल्कि मंजीत सिंह का नाम है। सबसे बड़ी बात यह है कि खालिस्तानी आतंकवाद के दौर में भारत से फरार मंजीत सिंह के बारे में पाकिस्तान में किसी को पता नहीं है।
लेकिन जब अवैस शेख ने यह मामला अपने हाथ में लिया, तो उन्हें पता चला कि सरबजीत दरअसल गलती से नशे में सीमा पार कर गया था। जबकि लाहौर के जिस बम धमाके में उसे अभियुक्त बनाया गया, उसमें पंजाब के ही निवासी मंजीत का हाथ था। मंजीत भारत से फरार है और वह कनाडा और ब्रिटेन तक की यात्रा कर चुका है। मंजीत को लेकर कनाडा के अखबारों में खबरें तक प्रकाशित हो चुकी हैं। अवैस शेख ने अपनी किताब में इसका तफसील से जिक्र किया है। इस किताब के मुताबिक 19 साल तक सरबजीत का केस वकील राणा अब्दुल हमीद देखते रहे। उस दौरान पाकिस्तान में सरबजीत की छवि एक भारतीय दहशतगर्द की ही थी। आज भी अधिकतर लोगों को सरबजीत की सच्चाई के बारे में पता नहीं है। सरबजीत के पिछले वकील सुप्रीम कोर्ट में कभी पेश ही नहीं हुए। यह किताब साबित करती है कि राणा अब्दुल हमीद ने अपने पेशे से इंसाफ नहीं किया।
सरबजीत सिंह-ए केस ऑफ मिसटेकन आईडेंटिटी (हिंदी में-सरबजीत सिंह की अजीब दास्तान) लेखकः अवैस शेख (पाकिस्तान), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली