नवंबर 2000 में तत्कालीन राजग सरकार ने मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने का फैसला किया था, तब इस नए प्रदेश के निर्माण का सबसे बड़ा आधार इसका आदिवासी बहुल होना माना गया था। यह एक त्रासद सच्चाई है कि छत्तीसगढ़ का एक बड़ा भूभाग आज माओवादी हिंसा से जूझ रहा है।
चारू मजूमदार की मौत के बाद बिखरे नक्सलियों ने 1970 के दशक के अंतिम वर्षों में दंडकारण्य से ही नए सिरे से अभियान शुरू किया था। पीपुल्स वार के संस्थापक कोंडापल्ली ने 1980 में सात-सात लोगों के सात जत्थे इस क्षेत्र में भेजे थे, मगर आज वही नक्सली देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं।
वरिष्ठ पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी ने अंग्रेजी और हिंदी में एक साथ जारी हुई अपनी इस किताब में माओवादियों की दुनिया को भीतर से समझने की कोशिश की है। उनका अपना आकलन है कि नए राज्य के बनने और खासतौर से नक्सलियों के खिलाफ चलाए गए विवादास्पद सलवा जुड़ूम अभियान के बाद से बस्तर में माओवादियों की ताकत तीन गुना हो गई है।
पहले ही मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन, छत्तीसगढ़ के मंत्री विक्रम उसेंडी, दिवंगत श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी के पुत्र और पुत्री के माओवादियों से संबंधों को लेकर विवाद में आ चुकी इस किताब में माओवादियों के संघर्ष, उनकी जीवन शैली और उनके आर्थिक तंत्र को समझने में मदद मिलती है।
उनकी दुनिया को समझने के लिए शुभ्रांशु ने माओवादियों के साथ कई-कई बार लंबा वक्त गुजारा है, वह दुर्गम पहाड़ी रास्तों से होकर पैदल उनके शिविरों में पहुंचे। जैसा कि उन्होंने लिखा है, 'मैंने सोचा कि क्यों न कैमरा ही नक्सली कंधे पर रख दूं, वासु की आंखों से उसकी दुनिया देखी जाए।'
इस लिहाज से देखें तो यह माओवादियों के मोनोलॉग की तरह है, जिसमें लेखक ने वही लिखा जो उसे माओवादियों ने बताया। यह हैरत की बात है कि शुभ्रांशु के साथ माओवादी काफी दोस्ताना ढंग से पेश आ रहे थे और उन्हें वह सब जानकारी दे रहे थे, जो वह उनसे जानना चाहते थे, लेकिन उन्होंने उनसे दो टूक सवाल करने की जरूरत नहीं समझी।
या फिर उन ब्यौरों को परखने की कोशिश नहीं की, जिनके बारे में सहजता से पता किया जा सकता है। मसलन, नक्सल नेता कोसा ने उनसे कहा, हमारे सिखाने पर ही आदिवासियों ने दवाइयों का इस्तेमाल शुरू किया है। यह बात इसलिए गले नहीं उतरती क्योंकि 1970 के दशक में माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले ब्रह्मदेव शर्मा बस्तर के कलेक्टर रह चुके थे और आदिवासियों का जीवन स्तर उठाने के लिए उन्होंने काफी काम किया था, जबकि बस्तर में नक्सली 1980 के बाद आए।
बस्तर में आज जो हालात हैं, उसमें यह सवाल बहुत वाजिब है कि आखिर तीन दशकों में माओवादियों ने आदिवासियों को क्या दिया? इसका जवाब तलाशने के बजाय लेखक ने माओवादियों की कही बातों में हस्तक्षेप करना जरूरी नहीं समझा। माओवादी नेताओं से मुलाकात और बातचीत के ब्यौरे भी कई जगह काफी लंबे हैं, तो माओवादियों के शीर्ष नेता गणपति से उनकी मुलाकात का ब्यौरा महज दो पृष्ठों में सिमट गया है।
जहां तक माओवादियों और पत्रकारों के संपर्कों की बात, तो 1994-95 में रुचिर गर्ग हिंदी के पहले ऐसे पत्रकार थे, जिन्होंने उनके शिविर में पहली बार लंबा वक्त गुजारा था। उन्होंने उनकी रणनीतियों का खुलासा किया था। उसे आधार बनाकर सरकारों ने काम किया होता, तो काफी हद तक इस मसले को सुलझाया जा सकता था।
लेट्स कॉल हिम वासु (उसका नाम वासु नहीं)
लेखकः शुभ्रांशु चौधरी, प्रकाशक-पेंगुइन बुक्स