कबीर के संबंध में कुछ विवाद जरूर हैं, लेकिन वे इस तरह के नहीं है कि उन्हें किसी सोची-समझी साजिश के तहत छेड़ा गया कहा जा सके। उस तरह के विवाद शुरू से हैं। ज्यादातर विवाद जैसे कि कबीर को कुछ लोग हिंदू परिवार मे जन्मा मानते हैं और कुछ मुस्लिम परिवार में, उनके गुरु रामानंद ने शुरू में दीक्षा देने से मना कर दिया था, ब्राह्मणों ने उन्हें अंत तक मान्यता नहीं दी थी और यह भी कि उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति से नहीं करने दिया था आदि आदि। इस तरह के विवाद किंवदंतियों में हैं। कुछ उनके संबंध में ब्यौरों को लेकर भी हैं।
इस तरह के मतभेद या सवाल तो तुलसी, सूर, मीरा, नाभादास, कुंदन और सहजो आदि संत कवियों को लेकर भी हैं। समाज में जो भी ऊंचाई तक उठता है, उसे कोसने वाले लोग बहुतायत से मिल जाते हैं। लेकिन पिछले पच्चीस-तीस सालों में कबीर को अलग तरह से देखने की उग्र कोशिशें भी हुई हैं। इन कोशिशों में कबीर के संत और सुधारक स्वरूप को दलित चेतना के प्रतिनिधि तक ही समेट लेने वाली संकीर्ण स्थापनाएं ज्यादा हैं।
इन स्थापनाओं में कबीर से प्रेरणा और दिशा लेने या अपना मत स्वस्थ संतुलित ढंग से व्यक्त करने के बजाय दूसरी मान्यताओं की धज्जियां उड़ाने वाला रुख दिखाई देता है। डॉ. धर्मवीर की आलोच्य पुस्तक “कबीर खसम खुशी क्यों होय” करीब-करीब इसी सरणि पर चलती है। सवाल यह नहीं है कि डॉ.पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक ‘अकथ कहानी प्रेम की’ का कथ्य सही या स्वीकार्य है या नहीं और उसे ध्वस्त करती हुई स्थापनाएं आवश्यक हैं या व्यर्थ? सवाल यह है कि कबीर को निमित्त बना कर ‘अकथ कहानी प्रेम की’ पुस्तक के लेखक और उस परंपरा के लेखकों पर आपत्तियां उठाने या कटु आलोचना करने का क्या औचित्य है?
यह बात शालीन ढंग से भी कही जा सकती है कि कबीर अपने समय में और उसके बाद भी ब्राह्मणवादी या सवर्ण मानसिकता के शिकार होते रहे, उन्हें जानबूझ कर इस तरह प्रस्तुत किया जाता रहा कि उन्हेंे अपने वर्ग समाज से जोड़ कर न देखा जा सके। लेकिन यह सब कहने के लिए अध्ययन और लेखन में गहन उदात्त भाव चाहिए। लिखने का उद्देश्य प्रतिपक्षी लेखक की विसंगतियां उजागर करना हो तो अध्ययन के साथ प्रतिपादन में और भी उदात्तता चाहिए। लेकिन लेखक ने करीब साढ़े तीन सौ से ज्यादा पृष्ठों में निशाना साध कर दूसरे लेखक को सतही ढंग से बुरा-भला कहा है।
कबीर को सबद, साखी, बीजक, रमैनी से जिन पाठकों ने कुछ पाया है, उन्हें प्रस्तुत पुस्तक से निराशा ही होगी। दलित चेतना से लगाव रखने वालों को भी शायद ही कोई उम्मीद बंधे। प्रतिपक्षी को सवर्ण मानसिकता का साबित करने के लिए पुनर्जन्म का फार्म पेश करने के बजाय लेखक ने कबीर की सहज ऊंचाइयों को रेखांकित करने की कोशिश की होती, तो पुस्तक पढ़ने मे बेहद आनंद आता।