जनवरी की कड़कड़ाती ठंड के बीच राजधानी दिल्ली में हर साल आयोजित होने वाला विश्व पुस्तक मेला भले ही अपनी पहचान बना चुका हो, लेकिन वह अपनी रंगत खोता भी नजर आ रहा है। मेले के आयोजन को 48 साल हो चुके हैं। अर्धशती के करीब पहुंचे इस मेले के आयोजन की समीक्षा तो होनी ही चाहिए।
वर्ष 1972 में पहले विश्व पुस्तक मेले का आयोजन 18 मार्च से चार अप्रैल के बीच किया गया था। बाद में यह मेला फरवरी में आयोजित होने लगा था। दिल्ली में जिस तरह की ठंड पड़ती है, उस लिहाज से फरवरी का महीना विश्व पुस्तक मेले के लिहाज से बेहतर रहा। लेकिन साल 2016 से इसका आयोजन जनवरी में होने लगा है। चूंकि इन दिनों दिल्ली में जबरदस्त ठंड पड़ती है, लिहाजा पाठकों का बड़ा रेला इस वक्त आने से कतराने लगा है। मेले की आयोजक संस्था राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, साल 2016 में मेले का अतिथि देश चीन था। चीन में फरवरी में सरकारी दफ्तर, स्कूल आदि बंद रहते हैं। चीन ने तब जनवरी महीने में इस आयोजन की मांग रखी थी। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने इसके लिए प्रगति मैदान की व्यवस्था संभालने वाली संस्था भारतीय अंतरराष्ट्रीय व्यापार संवर्धन संगठन यानी आईटीपीओ से उस साल जनवरी में मेले के लिए जगह और वक्त मांगा। जो मिल गया, उसके बाद से आईटीपीओ ने विश्व पुस्तक मेले के लिए जनवरी का महीना ही राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के लिए निर्धारित कर दिया। इसका असर यह हो रहा है कि इस मेले में सिर्फ अरब देशों की ही भागीदारी हो पा रही है। कहने को तो चीन, ब्रिटेन, अमेरिका आदि समेत करीब बीस देशों के प्रकाशक मेले में इस बार भी आए हैं, पर उनकी मौजूदगी पाठकीय और कारोबारी नजरिए से अहम नहीं रह गई है।
आज के दौर में भारतीय ज्ञान परंपरा की चर्चा छिड़ते ही उसे दकियानूसी साबित करने की कथित प्रगतिशील चेतना हावी हो जाती है। लेकिन इस पुस्तक मेले के आयोजन में अपनी परंपरा का ध्यान रखा गया था। पुस्तक न्यास में हिंदी के संपादक पंकज चतुर्वेदी कहते हैं कि भारतीय परंपरा में शिशिर ऋतु देवों के आराम का वक्त होती है। बद्रीनाथ, केदारनाथ आदि के कपाट बंद रहने का वास्तविक मतलब यही है। दरअसल इन दिनों उत्तर भारत में ठंड अपने शबाब पर होती है, लिहाजा इन दिनों कामकाज की परंपरा नहीं रही। पुस्तक मेले का आयोजन भी हेमंत और बसंत ऋतु में इसीलिए किया जाता था। चूंकि अब आयोजन की तारीख पहले कर दी गई है, लिहाजा दिल्ली और उसके चार-पांच सौ किलोमीटर के दायरे वाले शहरों लुधियाना, अमृतसर, चंड़ीगढ़, लखनऊ, मुरादाबाद, बरेली, अलीगढ़, ग्वालियर, आगरा, जयपुर, आदि से आने वाले पुस्तक प्रेमियों की संख्या घटी है।
विश्व पुस्तक मेला जिस प्रगति मैदान में आयोजित होता है, वहां विगत कई वर्षों से जारी पुनर्निर्माण कार्यों की वजह से सहूलियतें कम हुई हैं। रास्ते जगह-जगह बंद हैं। प्रगति मैदान के तीन गेट को छोड़ दिया, तो बाकी सारे गेट बंद हैं। मेले में पार्किंग की सहूलियत एकदम नहीं है। प्रगति मैदान प्रशासन फेरी सर्विस चलाता तो है, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। इसलिए बुजुर्ग पुस्तक प्रेमियों की संख्या मेले में आने से हिचकती है। एक प्रकाशक का कहना है कि इस वजह से गंभीर पुस्तकों की बिक्री पर भी असर पड़ा है।
बेशक पाठक हर बार आते हैं और उनमें युवाओं की संख्या ज्यादा होती है। लेकिन जिन कठिनाइयों को गिनाया गया है, उनकी तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए। तभी बेहतर पुस्तक और पाठक संस्कृति को बढ़ावा देने में यह मेला कामयाब हो पाएगा।