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नरगिस की वे आंखें!

Sat, 16 Mar 2013 10:25 PM IST
कैलाश वाजपेयी, वरिष्ठ साहित्यकार
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मुंबई की कारमाइकेल रोड, यहां उनतीस नंबर पर तब एक बंगला था। थोड़ी ऊंचाई पर स्थित होने के कारण इस बंगले को 'शिखर कुंज' नाम से जाना जाता था। यहां घांग्घ्रा केमिकल के मालिक श्रेयांस प्रसाद जैन रहते थे। हमारे लिए मुंबई नया शहर था।
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शाम को राममनोहर त्रिपाठी ने कार्यालय से लौटकर सूचना दी कि कल शिखर कुंज में कोई उत्सव है। शायद श्रेयांस जी के सुपुत्र का विवाह होना तय हुआ है, इसलिए वहां साहित्य संगीत का एक कार्यक्रम होना है। इसी संदर्भ में वहां कुछ लोगों को चाय पर बुलाया गया है। समयानुसार हम राममनोहर के साथ शिखर कुंज गए।

बाहरी प्रकोष्ट में जिन लोगों से परिचय हुआ उनमें जहांगीर आर्ट गैलरी के डॉ. मोताचिंद, टाइम्स ऑफ इंडिया के मैनेजर जे.सी.जैन और सरस्वती कुमार दीपक के अतिरिक्त श्रेयांस जी के कनिष्ट भ्राता शांति प्रसाद जैन और उनकी पत्नी श्रीमती रमारानी जैन भी थी। जिनसे हम बीते वर्षों में कोलकाता में उनके आवास अलीपुर पार्क प्लेस में मिल चुके थे।
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रमाजी हमें इसलिए भी जानती थी क्योंकि 'ज्ञानोदय' में हमारे एक-दो आलेख विदेशी साहित्यकार माला के अंतर्गत छप चुके थे। जब हम वहां पहुंचे तो कोई एक बहस भारत नाम की व्युत्पति को लेकर चल रही थी, साथ ही भीतर के आंगन से किसी स्त्री स्वर के गाने की आवाज भी आ रही थी।

डॉ. मोतीचंद्र का कहना था कि भारत नाम दुष्यंत के पुत्र भरत के नाम पर पड़ा। उनके अनुसार भारत में तीन प्रसिद्ध भरत हुए हैं। पहले ऋषभदेव  के पुत्र भरत, दूसरे दुष्यंत के पुत्र भरत और तीसरे भरत राम के छोटे भाई थे। दुष्यंत के पुत्र भरत से भारत का नाम लोकप्रिय इसलिए हुआ, क्योंकि कालिदास की विश्व प्रसिद्ध कृति 'शाकुंतलम' के भरत का नाम जनमानस में अटककर रह गया।

एक कोई मराठी के विद्वान के.सी.पोद्दार भी वहां तभी पधारे। उन्होंने बहस को नया मोड़ देते हुए अग्निपुराण का संदर्भ दिया और कहा 'आग्नेय हि पुराणेस्मिन सर्वा विद्या: प्रदर्शिता:' के आधार पर भरत नाम शाकुंतलम से पहले का है।
 
यह बात खासी दिलचस्प है कि ऋषभदेव का नाम वैष्णव और जैन दोनों तरह के ग्रंथों में आता है। यह तथ्य रेखांकन करने योग्य है कि ऋषभ शायद पहले राजा थे, जिन्होंने अपने राज्य में प्रजातंत्र की शुरुआत की और बड़े प्यार से अपनी राजधानी का नाम रखा 'विनीता'।

नामकरण के बाद उन्होंने यह घोषणा भी की कि विनीता की भूमि पर युद्ध नहीं होंगे। युद्ध के लिए निषिद्ध होने के कारण इस राजधानी का नाम विनीता होने के साथ ही विशेषण के रूप में इस क्षेत्र को अयोध्या कहा जाने लगा। ऋषभदेव राजा नामि की संतान थे। वर्षों राज्य करने के बाद ऋषभ ने अपना राज-पाट अपने पुत्र भरत को सौंपकर जंगल की राह ली। इन्हीं भरत चक्रवर्ती के नाम पर भारतवर्ष का नाम पड़ा।

पोद्दार जी के कथन से हमारे मन का भ्रम भी टूटा। स्वयं शांतिप्रसाद जी की जानकारी का क्षेत्र भी विशाल था। उन्होंने भी भारतवर्ष को लेकर कई नई बातें बताईं। तभी श्रीमति रमा रानी जैन बाहर आईं और हम सभी को सुझाव दिया कि सभी लोग भीतर के आंगन में आएं। भीतर परिवार और कुछ विशिष्ट घरों की महिलाएं थी, जिनका संगीत कार्यक्रम  समाप्त हो गया था। बारी थी अब हम लोगों की।

सबसे पहले सरस्वती कुमार दीपक ने एक रचना पढ़ी। राममनोहर त्रिपाठी ने अपना एक गीत गाया। फिर हमारी बारी थी। हमने एक रचना पढ़ी 'ऊबो और उदास रहो'। रचना उत्सवप्रिय माहौल में एक मायूसी की रेखा खींच गई, तो भी रमा जी ने एक और रचना का आग्रह किया। तब हमने अपनी दूसरी रचना 'धरती तेरी है' पढ़ी। जब हम वहां रचना पाठ कर रहे थे, तभी वहां हमें पहचाना चेहरा दिखा नरगिस का।

रचनापाठ के बाद स्वल्पाहार की बारी थी। हम सब अब अपनी पसंद के व्यंजनों को चुन रहे थे, तभी नरगिस ने पास आकर कहा, 'माफ कीजिएगा आपकी शायरी सुकून देती है।' हमने झिझकते हुए कहा, 'गुस्ताखी के लिए माफ नहीं करेंगी?' नरगिस उम्र में हमसे छह साल तो बड़ी रही होंगी। हंसकर बोली, 'चलिए माफ किया, मगर यह तो बताएं हैं कहां के? मुंबई में तो नए लगते हैं।' हमने लखनऊ का नाम लिया।

बोलीं, 'लगता है कोई हादसा हुआ है', मगर हमने कहा, 'आपने ठीक भांपा।' निहायत भोले अंदाज में नरगिस ने कहा, 'मेरा ताल्लुक भी यू.पी से रहा है। आपको पता है मेरी मां पंडित जी (जवाहर लाल नेहरू) को राखी बांधा करती थीं।' इसी बीच श्रीमति रमारानी जैन जी ने बड़े स्नेह भरे शब्दों में कहा, 'कैलाश जी हम लोग टाइम्स ऑफ इंडिया से एक हिंदी मासिक पत्रिका निकालना चाहते हैं, जो 'ज्ञानोदय' से अलग है।'

हमने कहा, 'अपने हिसाब से तो एक गंभीर दार्शनिक पत्रिका की कमी सभी को खलती है।' तभी हमें टोककर रमाजी ने कहा, 'हमारा मन कहानी पत्रिका के लिए ज्यादा है। आप क्या सोचकर बताएंगे।' हमें एकाएक बीड़ी बाबा के शब्द याद आए और हमने तत्काल उनका संकेत और सुझाव स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने जे.सी.जैन को आदेश दिया कि सप्ताह प्रारंभ होते ही कैलाश जी को टाइम्स ऑफ इंडिया में नियुक्त कर लिया जाए। र

मा जी जब हटीं, तो नरगिस फिर पास आईं, बोलीं, 'शायर साहब आपकी हिंदी के अल्फाज खासे कठिन हैं, फिर भी डूबी आवाज में बड़ी कशिश है।' हमने झेंपते हुए कहा, 'आपकी हौसला अफजाई के लिए शुक्रगुजार हूं।' नरगिस की आंखें दमक उठीं, बोलीं, 'अरे आप तो इतनी बढ़िया उर्दू बोलते हैं।' फिर कुछ रुककर, 'मगर आप तो लखनऊ के हैं, माफ कीजिएगा।'

हमने कहा, 'क्यों शर्मिंदा कर रही हैं, अपने इस नाचीज फैन को।' नरगिस ने ठंडी सी सांस ली। फिर एक शेर पढ़ा (अगर हमारी याददाश्त धोखा नहीं दे रही तो वह शेर शायद कुछ यों था)
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इक जमाना था कि जीने के लिए मरते थे हम ।
हाल अब यह है कि मरने की भी हसरत मर गई।
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