इसकी निगरानी एक नए अंतरराष्ट्रीय निकाय ‘शांति समिति’ द्वारा होनी थी। उस वक्त शांति योजना और शांति समिति को संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी भी मिल गई थी। लेकिन, अब 60 से अधिक देशों के नेताओं को इसमें शामिल होने का जो आमंत्रण भेजा गया है, उसके चार्टर में गाजा का जिक्र तक नहीं है, जिससे यह आशंका मजबूत होती है कि बोर्ड का दायरा गाजा से कहीं आगे तक फैल सकता है। ट्रंप खुद इसे जीवन भर अपनी अध्यक्षता में चलाने की योजना भी बना रहे हैं। इतना ही नहीं, इसकी स्थायी सदस्यता के लिए एक अरब डॉलर की नकद राशि मांगी जा रही है, जिससे एक ऐसे मॉडल की झलक मिलती है, जो संयुक्त राष्ट्र से बिल्कुल अलग और व्यावसायिक अधिक लगता है।
दरअसल, यह कदम ट्रंप की विदेश नीति का हिस्सा मालूम होता है, जो ‘अमेरिका-फर्स्ट’ के नाम पर बहुपक्षीय संस्थाओं को कमजोर करने पर केंद्रित है। जहां तक बात भारत की है, तो इसमें संदेह नहीं कि वह स्वाभाविक रूप से वैश्विक सुरक्षा पर चर्चा करने वाले अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का हकदार है और वह ऐसा करना भी चाहेगा। ऐसे वक्त में, जब नई शक्ति संरचनाएं सक्रियता से स्थापित की जा रही हों, तब वह मूकदर्शक के रूप में बिल्कुल भी नहीं बैठना चाहेगा। लेकिन ट्रंप की अध्यक्षता वाले ऐसे मंच से जुड़ने के अपने जोखिम भी हो सकते हैं। हम संयुक्त राष्ट्र को मजबूत बनाने की वकालत और सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करते आए हैं। इसके अलावा, शांति समिति में शामिल होने का आमंत्रण पाकिस्तान को भी मिला है, जिसके साथ जुड़ना एक अलग कूटनीतिक चुनौती है।
लिहाजा, ट्रंप की शांति समिति पर कोई भी निर्णय लेते समय भारत को अपनी वैश्विक प्रतिष्ठा, बहुपक्षवाद को समर्थन की नीति और संयुक्त राष्ट्र के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। अभूतपूर्व उथल-पुथल के दौर में नई दिल्ली को पुरानी रूढ़ियों से परे जाकर अपनी बहुपक्षीय रणनीतियों पर नए सिरे से पुनर्विचार करने की भी जरूरत है।