छोटे से फ्लैट में न जाने कितनी पुरानी यादों के साक्षी सामान जमा हैं, जिन्हें फेंकने का मन नहीं होता। छोटी-सी पेंशन के सहारे महंगाई से लगातार चलती लड़ाई है। शॉपिंग मेरे लिए मजबूरी है, शौक नहीं। अकबर इलाहाबादी के शब्दों में कहें, तो दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं, बाजार से निकला हूं, खरीदार नहीं हूं।
फिर भी जब बाजार दुकानों से बाहर निकल कर फुटपाथों पर हावी हो जाए, तो उन पर सजाए हुए बिकाऊ माल से टकराने और गिरने के डर से ही सही, आंखें खोलकर तो चलना ही पड़ता है। तब दीखते हैं, कंबलों के ढेर, जिनके बेहद सस्ते दामों के साथ घोषणा लगी रहती है, दान देने के लिए कंबल।
उन रंग-बिरंगे कंबलों पर उंगलियां फेरने से पता चलता है कि सर्दी दूर करने वाला कोई गुण उनमें नहीं है। ऊन से उनका दूर का संबंध तो है, पर उनका सूती स्पर्श कोहरे का लबादा ओढ़े हुए इस सर्दी से बस इतनी ही बहादुरी से लड़ सकता है, जितना चारों तरफ फैली हुई बेहिसाब गंदगी से अकेले ‘स्वच्छ भारत’ का नारा। कौतूहल के साथ दुकानदार से पूछता हूं, भाई, ऐसे कंबल से क्या फायदा, जिन्हें देखकर सर्दी ठठाकर हंसने लगे।
वह मुस्कराकर कहता है, बाऊजी, ये कंबल ओढ़ने वाले के शरीर में नहीं, बल्कि दान देने वाले के दिल में गर्माहट महसूस कराते हैं। मंदिर के बाहर बंटते प्रसाद के लड्डू जैसे भिखारियों की भूख नहीं मिटाते, केवल उसे बांटने वाले के लिए स्वर्ग में किसी सीट पर रुमाल बिछा देते हैं, वैसे ही ये कंबल भी हैं।
वाकई दान में देने के लिए बने ये कंबल बांटने वालों को जितनी गर्मी देते हैं, उसे पाने वालों के शरीर को उतनी गर्मी नहीं पहुंचाते। यह बहुत कुछ फुलपेज विज्ञापनों में उद्घोषित उस सरकारी योजनाओं की तरह है, जो केवल योजना बनाने वालों का तो भला करती हैं, मगर उनका नहीं, जिनके लिए बनाई जाती हैं।